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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 318 में से

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पृष्ठ 183

१५४ प्राचीनलिपिमाला०
गोल या चतुरस्र पत्तों पर खुदे हुए मिलते हैं. तांबे आदि के बरतनों पर उनके मालिकों के नाम खुदवाये
जाने की प्रथा भी प्राचीन है. कभी कभी तांबे के पत्रों पर पुस्तकें १ भी खुदवाई जाती थीं.
पीतल.
जैन मंदिरों में पीतल की बनी हुई बड़ी बड़ी कई मूर्तियां मिलती हैं जिनके आसनों २ पर
और छोटी मूर्तियों की पीठ पर लेख खुदे रहते हैं. ऐसे लेखोंवाली १००० से अधिक जैन मूर्तियां
मेरे देखने में आई हैं जिनपर के लेख ई. स. की ७ वीं से १६ वीं शताब्दि तक के हैं. जैन मंदिरों में
पीतल के गोल गट्टे रक्खे हुए मिलते हैं जिनपर 'नमोकार' मंत्र और यंत्र खुदे रहते हैं.
कांसा.
कई मंदिरों में लटकते हुए कांसे के घंटों पर भी उनके भेट करनेवालों के नाम और भेट
करने का संवत् आदि खुदा हुआ मिलता है.
लोहा.
लोहे पर भी लेख खोदे जाने के कुछ उदाहरण मिल आते हैं. देहली (मिहरोली) के
कुतुब मीनार के पास के लोह के स्तंभ पर राजा चंद्र का लेख खुदा है जो ई. स. की ५ वीं शताब्दी
का है. आबू पर अचलेश्वर के मंदिर में खड़े हुए लोहे के विशाल त्रिशूल पर वि. सं. १४६८
फाल्गुन सुदि १५ का लेख खुदा हुआ है. चित्तौड़ आदि कई स्थानों में लोहे की तोपों पर भी
लेख खुदे हुए मिलते हैं. सोने, चांदी, तांबे और सीसे के सिक्कों के ठप्पे लोहे के ही बनते थे
और उनपर अक्षर उलटे खोदे जाते थे.
काली स्याही.
कागज़ पर लिखने की काली स्याही (मसी) दो तरह की होती है पक्की और कच्ची. पक्की स्याही से
पुस्तकें लिखी जाती हैं और कच्ची स्याही से व्यापारी लोग अपनी बही आदि लिखते हैं. पक्की स्याही बनाने
में आये. मंगल का त्रिकोण यंत्र कई लोगों के यहां मिलता है. अजमेर के संभवनाथ के जैन (श्वेताम्बर) मंदिर में छोटी
ढाल जैसा बड़ा एक गोल यंत्र रक्खा हुआ है, जिसको 'वीसस्थानक' का यंत्र कहते हैं.
१ त्रिपती (मद्रास इहाते में) में तांबे के पत्रों पर खुदे हुए तेलुगु पुस्तक मिले हैं (बी; सा. इं. पे; पृ. ८६). हुए-
न्संग के लेख से पाया जाता है कि 'राजा कनिष्क ने प्रसिद्ध विद्वान् पार्श्व की प्रेरणा से कश्मीर में बौद्धसंघ एकत्रित किया
जिसने सूत्रपिटक पर 'उपदेशशास्त्र', विनयपिटक पर 'विनयविभाषाशास्त्र' और अभिधर्मपिटक पर 'अभिधर्मविभाषा-
शास्त्र' नामक लाख लाख श्लोकों की टीकाएं तय्यार कीं. कनिष्क ने इन तीनों टीकाओं को ताम्रफलकों पर खुदवाया और
उनको पत्थर की पेटियों में रख कर उनपर स्तूप बनवाया' (बी; बु. रे. वे. व; जि. १, पृ. १५४. हुएन्त्संग की भारतीय यात्रा
पर थॉमस वॉटर्स का पुस्तक, जि. १, पृ. २७१). ऐसी भी प्रसिद्धि है कि सायण के वेदभाष्य भी तांबे के पत्रों पर खुदवाये
गये थे (मॅक्समूलर संपादित ऋग्वेद, जि. १, पृ. XVII).
२ आबू पर अचलगढ़ के जैन मंदिर में पीतल की बनी हुई ४ विशाल और ८ कुछ छोटी मूर्तियें स्थापित हैं जिनके
आसनों पर ई. स. की १५ वीं और १६ वीं शताब्दी के लेख खुदे हुए हैं. अन्यत्र भी ऐसी मूर्तियां देखने में आती हैं परंतु
इतनी एक साथ नहीं.