प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्द १ मिलते हैं. वर्तमान लेखनशैली के अनुसार उनमें पदच्छेद अर्थात् प्रत्येक शब्द का अलग
अलग लिखना नहीं मिलता परंतु पंक्ति की पंक्ति बिना स्थान छोड़े लिखी जाती थी. कभी कभी
शब्द अलग अलग भी लिखे मिलते हैं २ परंतु किसी नियम से नहीं. विराम के चिह्नों के लिये
केवल एक और दो खड़ी लकीरों (दंड) का बहुधा प्रयोग होता था ३. श्लोकार्ध बतलाने अथवा
शब्दों या वाक्यों को अलग करने के लिये एक, और श्लोकांत या विषय की समाप्ति के लिये दो खड़ी
लकीरें बहुधा बनाई जाती थीं ४. कहीं कहीं प्रत्येक पंक्ति में आधा या एक श्लोक ही लिखा हुआ
मिलता ५ है और कभी कविताबद्ध लेखों में श्लोकांक भी पाये जाते हैं ६. कभी अंत में अथवा एक
विषय की समाप्ति पर कमल ७, फूल ८, वृत्त ९ या कोई अन्य चिह्न १० भी खोदा जाता था. लेखक जब
मूलपंक्तियों के प्रारंभ में), 'स्वस्ति' (लिपिपत्र १७ की मूलपंक्तियों के प्रारंभ में 'ओँ' के सांकेतिक चिह्न के बाद), 'हरिः ओम्
स्वस्ति श्रीः' (ऍ. ई; जि. ३, पृ. १४ के पास का सेट) आदि.
१. 'ओँ (सांकेतिक चिह्न से) नमः शिवाय' (लिपिपत्र २१ की मूल पंक्तियों के प्रारंभ में), 'ओँ (सांकेतिक चिह्न से)
नमो विष्णवे' (लिपिपत्र २३ की मूल पंक्तियों के प्रारंभ में), 'नमो अरहतो वर्धमानस्य' (लिपिपत्र ५ की मूल पंक्तियों के
प्रारंभ में), 'ओँ (सांकेतिक चिह्न से) ओं नमो वीतरागाय' (राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खे हुए परमार राजा विजय-
राज के समय के वि. सं. ११६६ के शिलालेख के प्रारंभ में), 'ओँ (सांकेतिक चिह्न से) नमो बुद्धाय' (ऍ. ई; जि. १२,
पृ. २८ के पास का सेट), 'ओं नमो रत्नत्रयाय' (शेरगढ का लेख; इं. पँ; जि. १४, पृ. ४५) आदि. लेखों के अंत में कभी कभी
'श्रीः', 'शुभं भवतु', 'श्रीरस्तु' आदि शब्द मिलते हैं और कभी कभी '॥ छ ॥' लिखा हुआ मिलता है. यह 'छ' प्राचीन 'थ'
अक्षर का रूपांतर प्रतीत होता है जो वास्तव में धर्मचक्र या सूर्य का सूचक होना चाहिये.
२. अशोक के देहली (इं. पँ; जि. १३, पृ. ३०६ से ३१० के बीच के सेट; जि. १६, पृ. १२२ और १२४ के बीच के सेट),
रधिया, मथिया, रामपुरवा (ऍ. ई; जि. २, पृ. २४८ से २५२ के बीच के सेट), पंदेरिया, निग्लिवा (ऍ. ई; जि ५, पृ. ४ के
पास का सेट) और सारनाथ (ऍ. ई; जि. ८, पृ. १६८ के पास का सेट) के स्तंभों के लेखों; खालसी के चट्टान की १ से ६
तक की धर्मज्ञाओं (ऍ. ई; जि. २, पृ. ४५० और ४५६ के बीच के दो सेट), एवं कितने एक अन्य लेखों में (आ. स. वे. इं; जि.
४, सेट ५२, लेखसंख्या ५, १०, १८, १६; सेट ५३, लेखसंख्या १३, १४; सेट ५४, लेखसंख्या ११; सेट ५६, लेखसंख्या ४; ऍ.
ई; जि. ८, पृ. १७६ के पास का सेट, लेख e) शब्दों या समासवाले शब्दों के बीच स्थान छोड़ा हुआ मिलता है.
३. इन विरामचिह्नसूचक लकीरों के लिये कोई निश्चित नियम नहीं था. कहीं बिना आवश्यकता के लगाई जाती थीं
और कहीं आवश्यकता होने पर भी छोड़ दी जाती थीं. कहीं लेख की प्रत्येक पंक्ति के प्रारंभ में (वेरावल से मिले हुए वलभी
संवत् ९२७ के लेख में प्रत्येक पंक्ति के प्रारंभ में दो दो खड़ी लकीरें हैं; ऍ. ई; जि. ३, पृ. ३०६ के पास का सेट) और कहीं
अंत में भी (अजमेर म्यूज़िअम में रक्खी हुई चौहानों के किसी ऐतिहासिक काव्य की शिलाओं में से पहिली शिला की बहुधा
प्रत्येक पंक्ति के अंत में एक या दो खड़ी लकीरें हैं) ऐसी लकीरें बिना आवश्यकता के मिलती हैं.
४. इन विरामसूचक लकीरों में भी अक्षरों की नांई सुंदरता लाने का यत्न करना पाया जाता है. कहीं खड़ी लकीर के
स्थान में अर्धवृत्त, कहीं उनके ऊपर के भाग में गोलाई या सिर की सी आड़ी लकीर और कहीं मध्य में आड़ी लकीर लगी
हुई मिलती है.
५. मौखरी अनंतवर्मन् के नागार्जुनी गुफा के लेख की प्रत्येक पंक्ति में आधा (फ्ली; गु. इं; सेट ३१ A) और अजंटा
की गुफा के एक लेख (आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ५६, लेखसंख्या ४) तथा गुलवाड़ा के पास की गुफा के घटोत्कच के लेख
(आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ६०) में एक एक श्लोक ही खुदा है.
६. समुद्रगुप्त के अलाहाबाद के अशोक के लेखवाले स्तंभ पर खुदे हुए लेख के श्लोकबद्व अंश में (फ्ली; गु. इं; सेट १)
तथा ग्वालियर से मिले हुए प्रतिहार राजा भोजदेव के शिलालेख (आ. स. ई; ई. स. १९०३-४, प्लेट ७२) में श्लोकांक दिये हैं.
७. जोधपुर से मिले हुए प्रतिहार राजा बाउक के लेख में, जो राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) में रक्खा हुआ है,
संवत् के पूर्व कमल खुदा है.
८. चाहमान विग्रहराज के हर्षनाथ के लेख की ३३ वीं पंक्ति में विषय की समाप्ति पर फूल खुदा है (ऍ. ई; जि. २,
पृ. १२० के पास का सेट).
९. परताबगढ़ (राजपूताने में) से मिले हुए कन्नौज के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल (दूसरे) के समय के वि. सं. १००३
(ई. स. ९४६) के शिलालेख में, जो राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खा हुआ है, १४ वीं और ३० वीं पंक्तियों में
वृत्त (O) बने हुए हैं.
१०. वसंतगढ़ (सिरोही राज्य में) से मिले हुए परमार राजा पूर्णपाल के समय के वि. सं. १०६६ (ई. स. १०४२)
के शिलालेख के अंत में, तथा ऊपर दो जगह भिन्न भिन्न प्रकार के चिह्न बने हुए हैं. कितने एक लेखों के ऊपर के खाली
हिस्सों में शिवलिंग, नंदी, वत्ससहित गौ, सूर्य या चंद्र आदि के चित्र भी खुदे मिलते हैं.