प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 187, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ प्राचीनलिपिमाला.
से हाशिये की दो दो लकीरें बनाई जाती हैं. ताड़पत्रों पर लिखी हुई पुस्तकों में पंक्तियां सीधी
लाने के लिये पहिले उनपर काली या रंगीन स्याही की बहुत बारीक लकीरें१ खींच ली जाती थीं
अथवा लोहे की बारीक तीखे गोल मुंह की कलम से उनके निशान कर लिये जाते थे. भूर्जपत्रों पर भी
ऐसा ही करते होंगे.
कांबी ( रूल ).
इस समय स्याही की लकीरें खींचने के लिये गोल रूल का प्रचार हो गया है परंतु पहिले
उसके लिये लकड़ी की गज़ (कंबा) जैसी चपटी पट्टी काम में आती थी जिसके ऊपर और नीचे का
एक तरफ़ का किनारा बाहर निकला हुआ रहता था. उसके सहारे लकीरें खींची जाती थीं. ऐसी
पट्टी को राजपूताने के लेखक 'कांबी' (कंबा) कहते हैं. वह रूल की अपेक्षा अच्छी होती है क्यों
कि रूल पर जब स्याही लग जाती है तब यदि उसे पोंछ न लिया जावे तो घूमता हुआ रूल नीचे के
कागज़ को बिगाड़ देता है परंतु कांबी का वह अंश जिसके साथ कलम सटी रहती है बाहर निकला
हुआ होने से कागज़ को स्पर्श ही नहीं करता जिससे उसपर लगी हुई स्याही का दाग़ कागज़ पर
कभी नहीं लगता. पुस्तकलेखक तथा ज्योतिषी लोग लकीरें खींचने के लिये पुरानी शैली से अब
तक कांबी काम में लाते हैं.
१ ताड़पत्रों पर पंक्तियां सीधी और समानांतर लाने के लिये खींची हुई लकीरों के लिये देखो, मेमॉयर्स ऑफ़ दी
एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल, जि. ५, प्लेट ३६.