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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 318 में से

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पृष्ठ 181

१५२ प्राचीनलिपिमाला.
के लेखवाला एक सुवर्ण का पत्रा १ जनरल कनिंगहाम को मिला था. बर्मा के प्रोम ज़िले के
ह्ल्डवा नामक गांव के पास से दो सोने के पत्रे २ खुदे हुए मिले हैं. उनमें से प्रत्येक के प्रारंभ
में 'ये धर्महेतुप्रभवा०' श्लोक और उसके पीछे पाली भाषा का गद्य है. उनकी लिपि ई. स. की
चौथी या पांचवीं शताब्दी के आस पास की है और उसमें कई अक्षर दक्षिणी शैली के हैं.
चांदी.
सुवर्ण की नांई कभी कभी चांदी के पत्रों पर भी लेख खुदवाये जाते थे. ऐसा एक पन्ना
भट्टिप्रोलु के स्तूप से ३ और दूसरा तत्तशिला ४ से मिला है. जैन मंदिरों में चांदी के गट्टे ५ और यंत्र ५
मिलते हैं.
तांबा.
लेखन सामग्री के संबंध में धातुओं में तांबा सब से अधिक काम में आता था. राजाओं तथा
सामंतों की तरफ़ से मंदिर, मठ, ब्राह्मण, साधु आदि को दान में दिये हुए गांव, खेत, कुए आदि
की सनदें तांबे पर प्राचीन काल से ही खुदवा कर दी जाती थीं और अब तक दी जाती हैं जिनको
'दानपत्र', 'ताम्रपत्र', 'ताम्रशासन' या 'शासनपत्र' कहते हैं. दानपत्रों की रचना अमात्य (मंत्री),
सांधिविग्रहिक ६, बलाधिकृत (सेनापति) या अक्षपटलिक ७ आदि अधिकारियों में से कोई स्वयं
करता या किसी विद्वान् से कराता था. कहीं उस काम के लिये एक अधिकारी ८ भी रहता था.
फिर उसको सुंदर अक्षर लिखनेवाला लेखक तांबे के पत्रे पर स्याही से लिखता और सुनार, ठठेरा,
लुहार या कोई शिल्पी उसे खोदता था. कभी कभी ताम्रलेख रेखारूप में नहीं किंतु बिंदियों ९ से
खुदे हुए भी मिलते हैं. जिस पुरुष की मारफ़त भूमिदान की सनद तय्यार करने की राजाज्ञा पहुं-
चती उसको 'दूतक १०' कहते थे. दूतक का नाम बहुधा दानपत्रों में लिखा रहता है. दक्षिण से मिले
१. क; आ. स. रि; जि. २, पृ. १३० और प्लेट ५६.
२. ए. इं; जि. ५, पृ. १०१ और उसी के पास का प्लेट.
३. बु; इं; पे; पृ. ६५.
४. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९१४, पृ. ६७५-७६ और ई. स. १९१५, पृ. १६२ के सामने का प्लेट.
५. जैन मंदिर में मूर्तियों के साथ पूजन में रक्खे हुए चांदी के गट्टे गोल आकृति के होते हैं जिनपर 'नमोकार मंत्र'
(नमो अरिहंताणं०) आठ दल के कमल और मध्य के वृत्त, इन नव स्थानों में मिल कर पूरा खुदा हुआ होने से उसको
'नवपदजी का गट्टा' कहते हैं. ऐसे ही चांदी के गट्टों पर यंत्र भी खुदे रहते हैं. अजमेर में श्वेताम्बर संप्रदाय के मूंतां के
मंदिर में चांदी के ४ नवपद के गट्टे और करीब एक फुट लंबे और उतने ही चौड़े चांदी के पत्रे पर 'ऋषिमंडलयंत्र' खुदा
है. वहीं के बड़े मंदिर (श्वेतांबरी) में 'ह्रीं बीज' तथा 'सिद्धचक्र' यंत्रों के गट्टे भी रक्खे हुए हैं.
६. 'सांधिविग्रहिक' उस राजमंत्री को कहते थे जिसको 'संधि' (सुलह) और 'विग्रह' (युद्ध) का अधि-
कार होता था.
७. 'अक्षपटलिक' राज्य के उस अधिकारी को कहते थे जिसके अधीन हिसाबसंबंधी काम रहता था परंतु
कभी इस शब्द का प्रयोग राज्य के दफ़्तर के अध्यक्ष के लिये भी होता था. अतएव संभव है कि दफ़्तर और हिसाब दोनों ही
कहीं कहीं एक ही अधिकारी के अधीन रहते हों.
८. कश्मीर के राजा ताम्रपत्र तय्यार करने के लिये 'पट्टोपाध्याय' नामक अधिकारी रखते थे. यह अधिकारी अक्ष-
पटलिक के अधीन रहता था (कल्हणकृत राजतरंगिणी, तरंग ४, श्लो. ३६७-६८).
९. देखो, ऊपर पृ. १००, टिप्पण ३.
१०. दूतक कभी कभी राजकुमार, राजा का भाई, कोई राज्याधिकारी आदि होते थे. कभी राजा स्वयं आज्ञा देता
था. राजपूताने में ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आस पास से ताम्रपत्र राजस्थानी हिंदी में लिखे जाने लगे तो भी दूतक
का नाम रहता था (प्रत दुप).