प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
७४ प्राचीनलिपिमला.
पहिले शारदालिपि के लेख बहुत ही कम प्रसिद्धि में आये थे और ई. स. १८०४ तक तो एक भी लेख
की प्रतिकृति प्रसिद्ध नहीं हुई थी, परंतु सुप्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. फोजल ने ई. स. १६११ में बड़े
श्रम के साथ चंबा राज्य के शिलालेख और दानपत्रों का बड़ा संग्रह कर 'ऐंटिक्विटीज़ ऑफ़ चंबा
स्टेट' नामक अपूर्व ग्रंथ प्रकाशित किया जिसमें प्राचीन लिपियों के अभ्यासियों के लिये शारदा
लिपि की अमूल्य सामग्री है.
लिपिपत्र २८ वां.
यह लिपिपत्र सराहां की प्रशस्ति¹ से तय्यार किया गया है. इसमें 'ए' के लिखोण की सिर
के स्थान की आड़ी लकीर की बाईं ओर चिन्ह और जोड़ा है जो वास्तव में 'ए' की मात्रा का
एक प्रकार का चिह्न है और कुटिल तथा नागरी लिपि के लेखों में ए, ऐ, ओ और औ की मात्राओं
में भी कभी कभी मिलता² है. पीछे से यही चिह्न लंबा होकर खड़ी लकीर³ के रूप में परिणत
होगया (देखो, लिपिपत्र ३१ में बहादुरसिंह के दानपत्र का 'ए' ). वर्तमान शारदा 'ए' में इस
खड़ी लकीर के अतिरिक्त 'ए' के ऊपर भी नागरी की 'ए' की मात्रा सी मात्रा और लगाई जाती है
(देखो, लिपिपत्र ७७). 'द्' के मध्य में ग्रंथि लगाई है. 'श' और 'स' में इतना ही भेद है कि
पहिले का सिर पूरे अक्षर पर है और दूसरे का दो अंशो में विभक्त है. 'त्' तथा 'म्' में मूल अक्षरों
के चिह्न स्पष्ट नहीं रहे. 'ओ' की मात्रा का चिह्न कहीं ~ भी है (देखो, 'यो'), 'औ' की मात्रा
कहीं उक्त चिह्न के अतिरिक्त व्यंजन के सिर के अंत में ^ चिह्न और जोड़ कर बनाई है (देखो,
'मौ' ) और रेफ पंक्ति से ऊपर नहीं किंतु सीध में लगाया है.
लिपिपत्र २८ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
किष्किन्धाकाधौशकुले प्रसूता सोमप्रभा नाम बभूव तस्य ।
देवी जगद्भूषणभूतमूर्तिस्त्रिलोचनस्येव गिरौशपुत्री ॥ अपूर्व-
मिन्दुम्प्रविधाय वेधास्सदा स्फुरत्कान्तिकलकमुक्तं ... संपूर्णबिम्बं (बिम्बं)
के राजा जयचंद्र ( जयचंद्र ) के समय की दो प्रशस्तियां लगी हैं. जनरल कनिंगहाम ने बाबू ( राजा ) शिवप्रसाद के पठना-
नुसार उनका समय क्रमशः लौकिक ( सप्तर्षि ) संवत् ८० और गत शककाल ७२६ ( ई. स. ८०४ ) माना था ( क; आ. स. रि;
जि. ४, पृ. १८०-८२ ; प्लेट ४२). फिर डॉ. बूलर ने ये प्रशस्तियां छापीं (ऐं. इं ; जि. १, पृ. १०४-७ ; ११२-५) और पहिली का संवत्
[लौकिक] संवत्सर ८० ज्येष्ठ शुक्ल १ रविवार और दूसरी का गत शककाल ७[२६] होना स्थिर किया. फिर उसी आधार
पर इन प्रशस्तियों को शारदा लिपि के सब से पुराने लेख, एवं उक्त लिपि का प्रचार ई. स. ८०० के आस पास से होना, मान
लिया ( वू ; इं. पे; पृ. ५७ ) परंतु ई. स. १८८८ में डॉ. कीलहॉर्न ने गणित कर देखा तो शक संवत् ६२६ से १४२६ तक की आठ
शताब्दियों के गत २६ वें वर्षों में से केवल शक संवत् ११२६ ही एक ऐसा वर्ष पाया जिसमें ज्येष्ठ शुक्ल १ को रविवार था. इस
आधार पर उक्त विद्वान् ने इन प्रशस्तियों का ठीक समय शक संवत् ११२६ = लौकिक संवत् ८० होना स्थिर किया ( इं. ऐं ;
जि. २०, पृ. १५४ ) और डॉ. फोजल ने मूल प्रशस्तियों को देखकर डॉ. कीलहॉर्न का कथन ही ठीक बतलाया ( फो; ऐँ. चं.
स्टेट् ; पृ. ४३-४ ). ऐसी दशा में ये प्रशस्तियां न तो ई. स. ८०४ की मानी जा सकती है और न शारदा लिपि का प्रचार ई. स.
८०० के आस पास होना स्वीकार किया जा सकता है. दूसरी बात यह भी है कि जनरल कनिंगहाम ने जयचंद्र से पांचवें
राजा जयचंद्रसिंह की गद्दीनशीनी ई. स. १३९५ में और ८ वें राजा रूपचंद्र की गद्दीनशीनी ई. स. १३६० में होना और उस
(रूपचंद्र ) का फ़ीरोज़ तुगलक ( ई. स. १३६०-७० ) के अधीन होना लिखा है ( क; कॉ. मि. इं; पृ. १०४). ऐसी दशा में
भी जयचंद्र का ई. स. ८०४ में नहीं किंतु १२०४ में विद्यमान होना ही स्थिर होता है.
१ फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट १५.
२ देखो, लिपिपत्र १८वें की मूल पंक्तियों में से दूसरी पंक्ति में 'विधत्ते' का 'ते', उसी पंक्ति में 'शत्रुसैन्यं' का 'सै',
और उसी लिपिपत्र में 'श्रो' और 'श्रो'.
३ यही खड़ी लकीर नागरी में 'पर्द्धीमात्रा' (पृष्ठमात्रा) होकर ए, ऐ, ओ और औ की मात्रावाले व्यंजनों के पूर्व
शारदा लिपि. ७५
वदनं यदीयमनुत्तराङ्ककृताङ्गयष्टिः ॥ नानाविधालङ्कृतिसन्नि-
वेशविशेषरम्या गुणशालिनी या । मनोहरत्वं सुतरा मवाप स-
चेतसां सत्कविभारतीव ॥ शृङ्गारसिन्धो X किमियन्नु वेला किं वा
मनोभ्रूतसुमञ्जरी स्यात् वसन्तराजस्य नु राज्यलक्ष्मीस्त्रैलोक्यसौन्दर्य-
लिपिपत्र २६ वां.
यह लिपिपत्र राजा विदग्ध के सुंगल गांव के दानपत्र२ से तय्यार किया गया है. इसमें 'ड' वि-
लक्षण है, कहीं कहीं 'प' और 'म' में स्पष्ट अंतर नहीं है, 'व' तथा 'ब' में भेद नहीं है, 'ए' की
मात्रा तीन प्रकार से लगी है जिनमें से एक आड़ी लकीर है (देखो, 'ऐ') और 'र्थ', 'थै', 'स्थ'
और 'स्थि' में 'थ' का रूप विकृत मिलता है.
लिपिपत्र २६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति ॥।१ श्रीचणप(म्प)कावासकात्परमभट्टारकमहाराजाधिराज-
परमेश्वरश्रीमद्युगाकरवर्मदेवपादानुध्यात[:] परमब्र(ह्म)ह्मण्यो निखि-
लसच्छासनाभिप्रवृत्तगुरुवृत्तदेवतानुवृत्तसमधिगतशास्तुकुशल-
तया समाराधितविद्वज्जनहृदयो नथानुगतपौरुषप्रयोगा-
वाप्तत्रिवर्गसिद्धिः सम्यगर्जिताभिकामिकगुणसहिततया फ-
लित इव मार्गतरु [:] । सर्वसत्वा(त्त्वा)अयनौ(णौ)यो मोषनाम्नाय३
आदित्यवङशो(वंशो)द्भव [:] परममाहेश्वरो (रः) श्रीभोगमतीदेव्या (व्यां) समुत्पन्न [:]
लिपिपत्र ३० वां.
यह लिपिपत्र सोमवर्मा के कुलैत के दानपत्र४, चंबा से मिले हुए सोमवर्मा और आसट के दान-
पत्र५, राजानक नागपाल के देवीरीकोठी (देब्रिकोटी) के शिलालेख६, आरिगांव के शिलालेख७ तथा
जालंधर के राजा जयच्चंद्र के समय की शक संवत् ११२६८=लौकिक संवत् ८० (ई. स. १२०४) की
कांगडा ज़िले के कीरग्राम के बैजनाथ (वैद्यनाथ) के मंदिर की दो प्रशस्तियों९ से तय्यार किया गया
है और इसमें मुख्य मुख्य अक्षर ही दिये गये हैं. कुलैत के दानपत्र में 'च' के बाईं तरफ के अंश के नीचे
के भाग में गांठ सी लगाई है और 'छ' की खड़ी लकीर के मध्य में ग्रंथि बनाकर उसके और 'क' के
बीच के अंतर को स्पष्ट किया है. बैजनाथ की प्रशस्तियों के 'ई' को, उक्त अक्षर के प्राचीन रूप में खड़ी
कभी कभी लगने लगी और बंगला, मैथिल तथा उड़िया लिपियों में दाहिनी तरफ नीचे गांठवाली वक्र रेखा के रूप में उसका
अब तक प्रयोग होता है (देखो, लिपिपत्र ७८ और ७६ में उक्त लिपियों की वर्णमालाओं में के, कै, को और कौ).
१. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट १७ से.
२. इन तीन लकीरों में से पहिली की आकृति ) ऐसी है और दूसरी व तीसरी खड़ी लकीरें हैं जिनमें स एक अनावश्यक है.
३. शुद्ध पाठ 'मोषणान्वयः' होना चाहिये.
४. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट २४ से.
५. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट २५ से.
६. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट ३० से.
७. ऐँ. इं; जि. ६, पृ. ३०१ के पास के प्लेट से.
८. इन प्रशस्तियों के समय के लिये देखो ऊपर पृ. ७३ टिप्पणी ७.
९. बु; इं. पे; प्लेट ४, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति प्रथम से.
७६ प्राचीनलिपिमाला.
लकीर के दोनों पार्श्व में लगनेवाली बिंदियों को उक्त लकीर के परिवर्तित रूप के ऊपर लगा कर, बनाया
है और उसीसे वर्तमान शारदा का 'ई' बना है. 'ते' और 'थै' में 'ए' और 'ऐ' की मात्राएं
क्रमशः एक और दो आड़ी लकीरें व्यंजन के ऊपर लगा कर बनाई हैं. टाकरी लिपि में 'ए' और 'ऐ'
की मात्राएं अब तक ऐसी ही लगाई जाती है (देखो लिपिपत्र ७७).
लिपिपत्र ३० वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
ओं नमश्शिवाय ॥ जयति भुवनकारणं स्वयंभुज्जयति पुर-
न्दरनन्दनो सुरारिः [।] जयति गिरिसुतानिरुद्धदेहो...रितभयाप-
हरो हरश्च देवः ॥ श्रीचष्प(म्प)कावासकात्यसमब्रह्मग्यो लला-
तटघटितविकटभुकुटिपटककुटि(द्वि)तकट कसमटिककृतसाना-
लिपिपत्र ३१ वां.
यह लिपिपत्र कुलू के राजा बहादुरसिंह के दानपत्र², अथर्ववेद³ (पिप्पलादशाखा) और शाकु-
न्तल नाटक⁴ की हस्तलिखित पुस्तकों से तय्यार किया गया है. अथर्ववेद की पुस्तक के अक्षरों का
'इ' प्राचीन 'इ' के '७°' इस रूप को नीचे के अंश से प्रारंभ कर चलती कलम से पूरा लिखने से ही
ऐसा बना है. उसीसे वर्तमान शारदा का 'इ' बना है. शाकुंतल नाटक से उद्धृत किये हुए अक्षरों
में से अधिकतर अर्थात् अ, आँ, ई, ऊ, ऋ, ओ, औ, क, ख, ग, च, छ, झ, ञ, ड, ढ, ण, त, थ, द,
ध, न, प, फ, ब, म, य, र, श, ष, स और ह अक्षर वर्तमान कश्मीरी से मिलते जुलते ही हैं (उक्त
अक्षरों को लिपिपत्र ७० में दी हुई वर्तमान शारदालिपि से मिला कर देखो).
लिपिपत्र ३१ वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति ॥ रामरामरामपराक्रमपराक्रमण्डदक्षदक्षजा-
कांतनितांतचरणशरणकृतांतःकरणरणविशारद शारदद्वि-
मकरानुकारियशःपूरपूरितदिगंतरपरमभट्टारकमहाराजाधिरा-
जश्रीबहादुरसिंहदेवपादाः ॥ ॥ महाश्रीयुवराजप्रतापसिं-
हः महामंचिवर नारायणसिंहः ॥ श्रीचंपकपुरस्थमहापं-
१. ये मूल पंक्तियां राजा सोमवर्मा के कुलैत के दानपत्र से हैं.
२. आ. स. रि; ई. स. १९०३-४, प्लेट ७१ से. ३. हार्वर्ड ओरियंटल सिरीज में छपे हुए अथर्ववेद के अंग्रेज़ी
अनुवाद के साथ दी हुई उक्त पुस्तक के एक पत्रे की प्रतिकृति से.
४. बु; इं. पे; सेट ६, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति ६ से.
५. ये मूल पंक्तियां कुलू के राजा बहादुरसिंह के दान पत्र से हैं.
१०—बंगला लिपि.
ई. स. की ११ वीं शताब्दी के आस पास से (लिपिपत्र ३२ से ३५).
बंगला लिपि भारतवर्ष के पूर्वी विभाग अर्थात् मगध की तरफ़ की नागरी लिपि से निकली है
और बिहार, बंगाल, मिथिला, नेपाल, आसाम तथा उड़ीसा से मिलनेवाले कितने एक शिलालेख,
दानपत्र, सिक्कों या हस्तलिखित पुस्तकों में पाई जाती है. बंगाल के राजा नारायणपाल के समय,
अर्थात् ई. स. की दसवीं शताब्दी तक तो उधर भी नागरी लिपि का ही प्रचार रहा. उक्त राजा के
लेखों में केवल 'ए'१, 'ख'२ आदि कुछ अक्षरों में बंगला की ओर झुकाव नज़र आता है. ई. स. की
ग्यारहवीं शताब्दी के पालवंशी राजा विजयपाल के देवपारा के लेख३ में ए, ख, ञ, त, म, र, ल और
स में नागरी से थोड़ी सी भिन्नता है और कामरूप के वैद्यदेव के दानपत्र४, आसाम से मिले हुए
वल्लभेंद्र के दानपत्र५ और हस्त्राकोल के लेख६ की लिपियों में से प्रत्येक को नागरी (लिपिपत्र २४-२७) से
मिलाया जावे तो अ, इ, ई, ऋ, ए, ऐ, ख, घ, झ, ञ, ट, थ, प, फ, र, श और ष में अंतर पाया जाता
है. इस प्रकार लेखनशैली में क्रमशः परिवर्तन होते होते वर्तमान बंगला लिपि बनी.
लिपिपत्र ३२ वां.
यह लिपिपत्र बंगाल के राजा नारायणपाल के समय के बदाल के स्तंभ के लेख७ और विजय-
सेन के देवपारा के लेख८ से तय्यार किया गया है. बदाल के लेख से तो मुख्य मुख्य अक्षर ही लिये
गये हैं. उनमें 'अ' और 'आ' की प्रारंभ की छोटीसी खड़ी लकीर न लगने से उनके रूप नागरी
के 'ञ' से बन गये हैं. संभव है कि यह भिन्नता दानपत्र खोदनेवाले की ग़लती से हुई हो.
देवपारा के लेख में अवग्रह की आकृति वर्तमान नागरी के 'इ' सी है, विसर्ग के ऊपर भी
सिर की आड़ी लकीर लगाई है, 'प' तथा 'य' में विशेष अंतर नहीं है और 'व' और 'ब' में
कोई भेद नहीं है.
लिपिपत्र ३२वें की मूल पंक्तियों९ का नागरी अक्षरांतर—
तस्मिन् सेनान्ववाये प्रतिसुभटशतोत्सादनव्र(ब्र)ह्मवादौ
स व्र(ब्र)ह्मक्षत्रियाणामजनि कुलशिरोदाम सामन्तसे-
नः। उन्नीयन्ते यदीयाः स्खलदुदधिजलोल्लोलश्री-
तेषु सेतोः कच्छान्तेष्वप्सरोभिर्भृशम यतनथस्पर्द्धया
युद्धगाथाः ॥ यस्मिन् सङ्गरचत्वरे पटुरटत्तूर्योप-
१. देखो लिपिपत्र ३२.
२. मेमॉयर्स ऑफ़ एशियाटिक् सोसाइटी ऑफ़ बंगाल, जिल्द ५, प्लेट २४ की अंतिम पंक्ति में 'वैशाख्यां' का 'ख'.
३. ऍ. इं; जि. १, पृ. ३०८ के पास का प्लेट. ४. ऍ. इं; जि. २, पृ. ३५२ और ३५३ के बीच के ४ प्लेट.
५. ऍ. इं; जि. २, पृ. १८४ और १८५ के बीच के २ प्लेट. ६. ज. बंगा. ए. सो; ई. स. १८०८, पृ. ४६२.
७. ऍ. इं; जि. २, पृ. १६१ के सामने का प्लेट. ८. ऍ. इं; जि. १, पृ. ३०८ के पास का प्लेट.
९. ये मूल पंक्तियां देवपारा के लेख से हैं.
७८
प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र ३३ वां.
यह लिपिपत्र बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के तर्पणडिघी के दानपत्र १ से और कामरूप के
वैद्यदेव के दानपत्र २ से तय्यार किया गया है. उन दोनों में 'इ' और 'ई' में विशेष अंतर नहीं है.
वैद्यदेव के दानपत्र का 'ऐ', 'ए' से नहीं, किंतु 'इ' में कुछ परिवर्तन करके बनाया है, अनु-
स्वार को अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा है और उसके नीचे हलंत की सी तिरछी लकीर
और लगाई है, 'ऊ' और 'ऋ' की मात्राओं में स्पष्ट अंतर नहीं है, 'व' और 'ब' में भेद नहीं है
और सिर सीधी लकीर से नहीं किंतु ⊂ ऐसी लकीर से बनाये हैं, जिसका अधिक विकास उड़िया
लिपि के सिरों में पाया जाता है.
लिपिपत्र ३३ वें की मूल पंक्तियों ३ का नागरी अक्षरांतर—
ओं ओं नमो भगवते वासुदेवाय ॥ स्वस्ति ॥ अम्व(म्ब)र-
मानस्तम्भः कुम्भः संसारवी(बी)जरक्षायाः । हरिदन्तरमि-
तमूर्त्तिः क्रीडा
पश्चिमी लिपि. ७६
दानपत्र के अक्षरों में से अधिकतर के सिर ⌒ ऐसे हैं जिनकी उत्पत्ति वैद्यदेव के उपर्युक्त दानपत्र के
अक्षरों के सिरों से हुई हो. वर्तमान उड़िया लिपि के अक्षरों के सिर पुरुषोत्तमदेव के दानपत्र के
सिरों से अधिक घुमाववाले हैं और उनका अंतिम भाग अधिक नीचा होता है परंतु वे सिरे उक्त
दानपत्र के अक्षरों के सिरों ही के विकसित रूप हैं.
लिपिपत्र ३५ वें की मूल पंक्तियों¹ का अक्षरांतर—
श्री जय दुर्गायै नमः । वीर श्रीगजपति
गउड़ेश्वर नवकोटिकर्नाटककलवर्गेश्वर
श्रीपुरुषोत्तमदेव महाराजाङ्कर । पोते-
श्वरभटकु दान शासन पटा । ए ५
अङ्क मेष दि १० अं सोमवार ग्रहण-
११—पश्चिमी लिपि.
ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी तक (लिपिपत्र ३६ से ४०).
पश्चिमी लिपि का प्रचार गुजरात, काठियावाड़, नासिक, खानदेश तथा सतारा ज़िलों में,
हैदराबाद राज्य के कुछ अंशों और कोंकण आदि में ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी तक रहा
[L1
८० प्राचीनलिपिमाला.
ओर मुड़ कर नीचे को झुकी हुई रहती है ( देखो, लिपिपत्र ३६-४८, ५२-५७ ) और अ, आ, ई, क, ञ
और र अक्षरों की खड़ी लकीरों तथा बहुधा उ, ऊ और ऋ की मात्राओं के नीचे के अंश बाईं तरफ
मुड़ कर घुमाव के साथ ऊपर की ओर बढ़े हुए रहते हैं ( देखो, लिपिपत्र ३६-४८, ५२-५८ ). यही
ऊपर की ओर बढ़ा हुआ अंश समय के साथ और ऊपर बढ़ कर सिर तक भी पहुंचने लगा जिससे
तेलुगु-कनडी तथा ग्रंथ लिपियों में अ, आ, ई, क, झ और र की आकृतियां मूल अक्षरों से बिलकुल
विलक्षण हो गई. इसके अतिरिक्त दक्षिण के लेखक अपने अक्षरों में सुंदरता लाने के विचार से खड़ी
और आड़ी लकीरों को वक्र या खमदार बनाने लगे जिससे ऊपर की सीधी आड़ी लकीर की आकृति
बहुधा ⌒ , नीचे की सीधी आड़ी लकीर की ‿ और सीधी खड़ी लकीर की आकृति { ऐसी
बनने लगी तथा इन लकीरों के प्रारंभ, मध्य या अंत में कहीं कहीं ग्रंथियां भी बनाई जाने लगी. इन्हीं
कारणों, तथा कितने एक अक्षरों को चलती कलम से पूरा लिखने, से दक्षिण की लिपियों के वर्तमान
अक्षर उनके मूल ब्राह्मी अक्षरों से बहुत ही विलक्षण बन गये.
लिपिपत्र ३६ वां.
यह लिपिपत्र मंदसोर से मिले हुए राजा नरवर्मन् १ के समय के मालव ( विक्रम ) संवत् ४६१
( ई. स. ४०४ ) और वहीं से मिले हुए कुमारगुप्त २ के समय के मालव ( विक्रम ) संवत् ५२६ ( ई.
स. ४७२ ) के लेखों से तय्यार किया गया है. नरवर्मन् के समय के लेख में 'य' प्राचीन और नवीन
( नागरी का सा ) दोनों तरह का मिलता है. दक्षिणी शैली के अन्य लेखों में 'य' का दूसरा
( नागरी का सा ) रूप केवल संयुक्ताक्षर में, जहां 'य' दूसरा अक्षर होता है, प्रयुक्त होता है
परंतु यह लेख उत्तरी भारत का है, इसलिए इसमें वैसे रूप का भी केवल 'य' के स्थान में प्रयोग हुआ है.
'रु' का दूसरा रूप 'उ' की मात्रा सहित 'र' को चलती कलम से लिखने से बना है, शुद्ध
रीति से लिखा हुआ रूप तो पहिला ही है. 'इ' में दो बिंदियों के ऊपर की सीधी आड़ी
लकीर को वक्र रेखा बना दिया है.
लिपिपत्र ३६ वें की मूल पंक्तियों ३ का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धम् सहस्रशिरसे तस्मै पुरुषायामितात्मने च-
तुस्समुद्रपर्य्यङ्कतोयनिद्रालवे नमः श्रीर्माल्वगणाम्नाते
प्रशस्ते कृतसंज्ञिते एकषष्ठ्यधिके प्राप्ते समाशतचतुष्ट-
य(ये) प्रावृक(ट्का)ले शुभे प्राप्ते मनस्तुष्टिकरे नृणाम् मधो(हे)
˙प्रवृत्ते शक्रस्य कृष्णास्यानुमते तदा निष्पन्नव्रीहियवसा
लिपिपत्र ३७ वां.
यह दानपत्र वलभी के राजा ध्रुवसेन ४ के गुप्त सं. २१० ( ई. स. ५३६ ) के और
धरसेन ५ ( दूसरे ) के गुप्त सं. २५२ ( ई. स. ५७१ ) के दानपत्रों से तय्यार किया गया है.
धरसेन ( दूसरे ) के दानपत्र में अनुस्वार और विसर्ग की बिंदियों के स्थान में आड़ी लकीरें बनाई
१. मेरे विद्वान् मित्र देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर की भेजी हुई उक्त लेख की छाप से.
२. फ्ली; गु. इं; प्लेट ११ से. ३. ये मूल पंक्तियां नरवर्मन् के मंदसोर के लेख से हैं.
४. एं. इं; जि. ११, पृ. ११० के पास के सेट से. ५. एं. इं; जि. ८, पृ. ३०२ और ३०३ के बीच के सेटों से.
पश्चिमी लिपि. ८१
हैं (देखो 'णां' और 'दृः') और हलंत अक्षर को उसके पहिले अक्षर के नीचे लिखा है (देखो
'पत्' 'शत्' और 'सेत्').
लिपिपत्र ३७वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
स्वस्ति वलभि(भी)तः प्रसभप्रणतामित्राणां मैत्रकाणामतु-
लबलसपत्नमण्डलाभोगरुंसक्तसंप्रहारशतलब्धप्रतापः
प्रतापः² प्रतापोपनतदानमानाज्र्ज्जवोपार्जितानुरागेानुरक्तमौ-
लभृतमित्रश्रेणीबलावाप्तराज्यश्रिः (श्रीः) परमम(मा)हेश्वरः श्रि(श्री)सेना-
पतिभटाकंस्तस्य सुतस्तत्पादरजोरुणावनतपविचि(त्री)कृतशिराः
लिपिपत्र ३८ वां.
यह लिपिपत्र पालीताना से मिले हुए गारुलक सिंहादित्य के गुप्त सं. २५५ (ई. स. ५७४)
के दानपत्र³ और वलभी के राजा शीलादित्य (पांचवें) के गुप्त सं. ४०३ (ई. स. ७२२) के दान-
पत्र⁴ से तय्यार किया गया है. शीलादित्य के दानपत्र में 'इ' के चार टुकड़े किये हैं, जिनमें से
नीचे की दो रेखाएं तो दो बिंदियों के स्थानापन्न हैं और ऊपर की दो तिरछी रेखाएं, सीधी आड़ी
लकीर के खमदार रूप के ही हिस्से हैं जो जुड़े हुए होने चाहिये थे. 'ए' का रूप विलक्षण बना
है परंतु वह लिपिपत्र ३७वें में दिये हुए 'ए' का त्वरा से लिखा हुआ विकृत रूप ही है. 'ऐ'
में ऊपर की खमदार आड़ी रेखा का खम के पूर्व का हिस्सा 'ए' के अग्रभाग की बाईं ओर
जुड़नेवाली रेखा का गोलाईदार रूप ही है और बाकी का भाग 'ए' का है. 'ल्ल' में ऊपर
का आधा भाग 'ल' (दूसरे) का रूप है और नीचे का आधा भाग 'ल' (तीसरे) का कुछ
विकृत रूप है. इस तरह दो प्रकार के 'ल' मिलकर यह रूप बना है.
लिपिपत्र ३८ वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति फङ्गप्रसवणात्प्रकृष्टकर्म्माम्भोङ्गताभ्युदया-
न्निभूताशेषदिषामनेकस मरशतसं पातात्यन्त विजयिना (नां)
प्रभृतयश कौत्यों लङ्कारालङ्कतान्यवयभुवां गारुलकानां
वंश्या(वंशा)नुक्रमेणाविर्भूतो दीनानाथाश्रितार्त्तिबान्धवजनो-
पजीव्यमानविभवविस्तरः तरुरिवाक्षीणफलच्छायातयैका-
लिपिपत्र ३६ वां.
यह लिपिपत्र त्रैकूटकवंशी राज दह्रसेन⁶ के कलचुरि संवत् २०७ (ई. स. ४५६) के, गुर्जर-
वंशी रणग्रह⁷ के कलचुरि सं. ३६१ (ई. स. ६४०) के और दह्र⁸ (दूसरे) के कलचुरि सं. ३६२
१. ये मूल पंक्तियां धरसेन (दूसरे) के दानपत्र से हैं. २. 'प्रतापः' शब्द यहां पर अनावश्यक है.
३. ऍ. इं; जि. ११, पृ. १८ और १६ के बीच के प्लेटों से. ४. ज. बंब. ए. सो; जि. ११, पृ. ३६३ के पास के प्लेट १ A. B. से.
५. ये मूल पंक्तियां गारुलक सिंहादित्य के दानपत्र से हैं.
६. ऍ. इं; जि. १०, पृ. ५३ के पास के सेट से. ७. ऍ. इं; जि. २, पृ. २१ के पास के सेट से.
८. ऍ. इं; जि. ५, पृ. ४० और ४१ के बीच के सेटों से.
८२ प्राचीनलिपिशाला.
(ई. स. ६४१) के दानपत्रों से तय्यार किया गया है. रणग्रह के दानपत्र का 'ए' लिपिपत्र ३८
में दिये हुए वलभी के राजा शीलादित्य के दानपत्र के 'ए' से मिलता हुआ है.
लिपिपत्र ३९वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
इत्युक्तञ्च भगवता वेदव्यासेन व्यासेन षष्टिवरिष(वर्ष)-
सहस्राणि स्वर्गे मोदति भूमिद (दः) आच्छेत्ता चानुमन्ता
च तान्येव नरके वसे [त्] विन्ध्याटवीष्वतोयासु शुष्ककोटरवा-
सिन [:] क्रि(कृ)ष्णाहयो हि जायन्ते भूमिदानापहारका [:]
लिपिपत्र ४० वां.
यह लिपिपत्र नवसारी से मिले हुए चालुक्य युवराज श्रयाश्रय (शीलादित्य) के कलचुरि सं.
४२१ (ई. स. ६७०) के दानपत्र² और गुजरात के राष्ट्रकूट (राठौड़) राजा कर्कराज (सुवर्णवर्ष)
के शक सं. ७३४ (ई. स. ८१२) के दानपत्र³ से तय्यार किया गया है. कर्कराज के दानपत्र के
'ड' की आकृति नागरी के 'द' की सी है जिसमें, संभव है कि, ग्रंथि से नीचे निकला हुआ अंश 'ढ'
से उक्त अक्षर को भिन्न बतलाने के लिये ही हो. 'ड' का ऐसा ही या इससे मिलता हुआ रूप
लिपिपत्र ३७ और ३८ में भी मिलता है.
लिपिपत्र ४०वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स वोव्याद्वेधसा येन(धाम) यन्नाभिकमलङ्कृतं । हरश्च
यस्य कान्तेन्दुकलया स(क)मलङ्कृतं ॥ स्वस्ति स्वकीया-
न्वयवङ्श(वंश)कर्त्ता श्रीराष्ट्रकूटामलवङ्श(वंश)जन्मा । प्रदानशूरः
समरेकवीरो गोविन्दराजः क्षितिपो बभूव ॥ यस्या-
⸱⸱⸱मात्तजयिनः प्रियसाहसस्य क्षमापालवेशफलमेव
१२—मध्यप्रदेशी लिपि.
ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी के आस पास तक (लिपिपत्र ४१-४२).
मध्यप्रदेशी लिपि का प्रचार मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड, हैदराबाद राज्य के उत्तरी विभाग तथा
मईसोर राज्य के कुछ हिस्सों में ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी के आस पास तक रहा. यह
लिपि गुप्तों⁵, वाकाटकवंशियों⁶, शरभपुर के
मध्यप्रदेशी लिपि. ८३
राजाओं¹ तथा कुछ कंदबों² के दानपत्रों या शिलालेखों में मिलती है. इस लिपि के दानपत्र अधिक
और विस्तृत रूप में मिलते हैं, शिलालेख कम और बहुधा छोटे छोटे. इसके अक्षर लंबाई में
अधिक और चौड़ाई में कम होते हैं, उनके सिर चौकूंटे या संदूक की आकृति के बहुधा भीतर से
खाली, परंतु कभी कभी भरे हुए भी, मिलते हैं और अक्षरों की आकृति बहुधा समकोणवाली
होती है (देखो, ऊपर पृ. ४३). इससे इस लिपि के अक्षर साधारण पाठक को विलक्षण प्रतीत
होते हैं परंतु इन दो बातों को छोड़ कर देखा जावे तो इस लिपि में और पश्चिमी लिपि में बहुत
कुछ समता है. इस लिपि पर भी पश्चिमी लिपि की नांई उत्तरी शैली का प्रभाव पड़ा है.
लिपिपत्र ४१ वां.
यह लिपिपत्र वाकाटकवंशी राजा प्रवरसेन (दूसरे) के दूदिया³ सिवनी⁴ और चम्मक५
के दानपत्रों से तय्यार किया गया है. दूदिया तथा सिवनी के दानपत्रों के अक्षरों के सिर
चौकूंटे और भीतर से खाली हैं तथा अधिकतर अक्षर समकोणवाले हैं, परंतु चम्मक के दानपत्र
के अक्षरों के चौकूंटे सिर भीतर से भरे हुए हैं और समकोणवाले अक्षरों की संख्या कम है.
दूदिया के दानपत्र से उद्धृत किये हुए अक्षरों के अंत में जो 'इ', 'ऊ' और 'औ' अक्षर दिये हैं
वे उक्त दानपत्र से नहीं हैं. 'ऊ' अजंटा की गुफा के लेखसंख्या ३ की पंक्ति १७ से⁶ और 'औ' महासु-
देवराज के रायपुर के दानपत्र की १० वीं पंक्ति७ से लिया है. उक्त तीनों दानपत्रों में कोई प्रचलित
संवत् नहीं दिया परंतु यह निश्चित है कि प्रवरसेन (दूसरा) गुप्तवंशी राजा चंद्रगुप्त दूसरे (देवगुप्त)
की पुत्री प्रभावतीगुप्ता का पुत्र था और चंद्रगुप्त दूसरे के समय के लेख गुप्त संवत् ८२ से ९३
(ई. स. ४०१-१२) तक के मिले हैं. ऐसी दशा में प्रवरसेन (दूसरे) का ई. स. की पांचवीं शताब्दी
के प्रारंभ के आस पास विद्यमान होना निश्चित है.
लिपिपत्र ४१वें की मूल पंक्तियों८ का नागरी अक्षरांतर—
दृष्टम् प्रवरपुरात् अग्निष्टोम(मा)प्तोर्यामोक्थ्यषोडश्यतिरा(रा)त्रवाज-
पेयबृहस्पतिसवसाद्यश्क्रचतुरश्वमेधयाजिनः विष्णुवृद्धसगो-
त्रस्य सम्राटः(ज्ञो) वाकाटकानाममहाराजश्रोप्रवरसेनस्य सूनोः
सूनोः अत्यन्तस्वामिमहाभैरवभक्तस्य अंसभारसन्निवेशितशि···लि-
लिपिपत्र ४२ वां.
यह लिपिपत्र बालाघाट से मिले हुए वाकाटकवंशी राजा पृथिवीसेन (दूसरे) के९, खरिअर से
मिले हुए राजा महासुदेव१० के और राजीम से मिले हुए राजा तीवरदेव के११ दानपत्रों से तय्यार किया
गया है. तीवरदेव के दानपत्र में 'इ' की दो बिंदियों के ऊपर की आड़ी लकीर में विलक्षण मोड़ डाला है.
खरिअर और राजीम के दानपत्रों का समय अनुमान से लगाया है क्योंकि उनका निश्चित
समय स्थिर करने के लिये अब तक ठीक साधन उपलब्ध नहीं हुए.
१. ऍ. इं; जि. ७, पृ. १०४-६. जि. ६, पृ. १७२-३. फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ८१.
२. इं. ऍ; जि. २१, पृ. ६३. रा; ऍ. क; जि. ७, पृ. २०० के पास का सेट.
३. ऍ. इं; जि. ३, पृ. २६० और २६१ के बीच के सेट ४. फ्ली; गु इं; सेट ३५ वां.
५. फ्ली; गु. इं; सेट ३४.
६. आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५७. ७. फ्ली; गु. इं; प्लेट २७.
८. ये मूल पंक्तियां प्रवरसेन (दूसरे) के दूदिया के दानपत्र से हैं.
९. ऍ. इं; जि. ६, पृ. २७० और २७१ के बीच के प्लेटों से.
१०. ऍ. इं; जि. पृ. १७२ और १७३ के बीच के प्लेटों से. ११. फ्ली; गु. इं; प्लेट ४५ से.
८४ प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र ४२ वें की मूल पंक्तियों १ का नागरी अक्षरांतर—
स्वस्ति शरभपुराद्विक्रमोपनतसामन्तमकुटचूडामणिप्रभाप्रसे-
काम्बुधौतपादयुगलो रिपुविलासिनोसीमन्तोद्धरणहेतुर्व्वसुवसु-
धागोप्रद परमभागवतो मातापितृ(तृ)पादानुध्यातश्रीमहासुदेवराजः
क्षितिमण्डाहारौयनवन्दकएतत्प्रावेश्यश्रा[म्बिल्कयो]२( प्रतिवासिकुटु-
म्बिनस्समाज्ञापयति ॥ विदितमस्तु वो यथास्माभिरेतद्ग्रामद-
र्यं तृ(त्रि)दशपतिसदनसुखप्रतिष्ठाकरो(रं) यावद्रविशशितार[किरणप्र-
१३—तेलुगु-कनड़ी लिपि.
ई. स. की पांचवीं शताब्दी से (लिपिपत्र ४३ से ५१).
तेलुगु-कनड़ी लिपि का प्रचार बंबई इहाते के दक्षिणी विभाग में, हैदराबाद राज्य के दक्षिणी हिस्सों
में, माईसोर राज्य में तथा मद्रास इहाते के उत्तर-पूर्वी विभाग में ई. स. की पांचवीं शताब्दी के आस-
पास से पाया जाता है (देखो, ऊपर पृष्ठ ४३). इसमें समय के साथ परिवर्तन होते होते अक्षरों की
गोलाई बढ़ने लगी और त्वरासे लिखने के कारण ई. स. की ११ वीं शताब्दी के आसपास
इसके कितने एक अक्षर और १४ वीं शताब्दी के आसपास अधिकतर अक्षर वर्तमान तेलुगु और कनड़ी
लिपियों से मिलते जुलते बन गये. फिर उनमें थोड़ासा और परिवर्तन होकर वर्तमान तेलुगु और
कनड़ी लिपियां, जो परस्पर बहुत ही मिलती हुई हैं, बनीं; इसलिये इस लिपि का नाम तेलुगु-कनड़ी
कल्पना किया गया है. यह लिपि पल्लवों, कदंबों, पश्चिमी तथा पूर्वी चालुक्यों, राष्ट्रकूटों, गंगावंशियों,
काकतीयों आदि कई राजवंशों तथा कई सामंतवंशों के शिलालेख तथा दानपत्रों में एवं कितने ही
साधारण पुरुषों के लेखों में मिलती है. उक्त लेखादि की संख्या सैकड़ों नहीं किंतु हजारों को पहुंच
चुकी है, और वे ऐपिग्राफिआ इंडिका, ऐपिग्राफिआ कर्नाटिका, इंडियन ऐंटिक्वेरी आदि प्राचीन शोध-
संबंधी अनेक पुस्तकों में छप चुके हैं.
लिपिपत्र ४३ वां.
यह लिपिपत्र पल्लववंशी राजा विष्णुगोपवर्मन् के उरुवुपल्लि ३ के, तथा उसी वंश के राजा
सिंहवर्मन् के पिकिर २ और मंगळूर ४ गांवों से मिले हुए दानपत्रों से तय्यार किया गया है. विष्णु-
गोपवर्मन् के दानपत्रों के अक्षरों के सिर मध्यप्रदेशी लिपि की नांई बहुधा चौकूंटे और भीतर से
खाली हैं और समकोणवाले अक्षरों की संख्या कम और गोलाईदार या खमदार लकीरवालों की
अधिक है, तोभी इसकी लिपि मध्यप्रदेशी और पश्चिमी लिपि से बहुत कुछ मिलती हुई है. सिंहवर्मन्
१. ये मूल पंक्तियां महासुदेव के खरिआर के दानपत्र से हैं.
२. इं. ऐं.; जि. ५, पृ. ५० और ५१ के बीच के प्लेटों से.
३. इं. ऐं.; जि. ८, पृ. १६० और १६१ के बीच के प्लेटों से.
४. इं. ऐं; जि. ५, पृ. १५४ और १५६ के बीच के प्लेटों से.
के दानपत्रों के अक्षरों के सिर चौकूंटे नहीं किंतु छोटी सी आड़ी लकीर से बने हुए हैं. इस
लिपिपत्र की लिपियों का समय केवल अनुमान से ही लिखा है.
लिपिपत्र ४३वें की मूल पंक्तियों का१ नागरी अक्षरांतर—
जितं भगवता श्रीविजयपलक्कडस्थानात् परम्ब्रह्म-
ण्यस्य स्वबाहुबलाज्जितोर्जितक्षात्रतपोनिधेः विहि-
तसर्व्वमर्यादस्य स्थितिस्थितस्यामितात्मनो महाराज-
स्य श्रीस्कन्दवर्म्मणः प्रपौत्रस्यार्जितशक्तिसिद्धिसम्पन्न-
स्य प्रतापोनतराजमण्डलस्य महाराजस्य वसु-
धातलैकवीरस्य श्रीवीरवर्म्मणः पौत्रस्य देवद्विज-
लिपिपत्र ४४ वां.
यह लिपिपत्र देवगिरि से मिले हुए कदंबवंशी राजा मृगेशवर्मन्२ और काकुस्थवर्मन्३ के दान-
पत्रों से तय्यार किया गया है. इनके अक्षरों के सिर चौकूंटे परंतु भीतर से भरे हुए हैं और कितने
ही अक्षरों की आड़ी लकीरें विशेष कर खमदार बनती गई हैं (देखो, मृगेशवर्मन् के दानपत्रों में इ, ख,
ज, ट, ड, घ, ब, भ, म, व और ह, और काकुस्थवर्मन् के दानपत्र में इ, ख, च, ढ, द, ल आदि).
लिपिपत्र ४४वें की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धम् ॥ जयत्यहं [स्तलोकेशः सर्व्वभूतहिते रतः रागा-
द्यैरहरोनन्तोऽनन्त[नन्द]गौश्वरः ॥ स्वस्ति विजयवैज[य]न्त्या [:] स्वामिम-
हासेनेनमातृगणानुद्ध्या (ध्या) ताभिषिक्तानां५ मानव्यसगोत्राणां६ हारितिपू-
त्राणां (णां) तां (आं) गिरसां प्रतेहृतस्वाद्ध्या (ध्या) यचर्चकाना (नां) सद्द्धर्म्मसंदर्बाना (नां)
कदंबानां अनेकजन्मान्तरोपाज्जितविपुलपुण्यस्कन्धः वाहवाज्जित-
लिपिपत्र ४५ वां.
यह लिपिपत्र चालुक्यवंशी राजा मंगलेश्वर के समय के शक सं. ५०० (ई. स. ५७८) के
शिलालेख७, उसी वंश के राजा पुलकेशिन् (दूसरे) के हैदराबाद (निज़ाम राज्य में) से मिले हुए
शक सं. ५३४ (ई. स. ६१२) के दानपत्र८ और पूर्वी चालुक्य राजा सर्वलोकाश्रय (विजयसिद्धि,
मंगियुवराज) के राज्यवर्ष दूसरे (ई. स. ६७३) के दानपत्र९ से तय्यार किया गया है. मंगलेश्वर
१. ये मूल पंक्तियां उरुवुपल्लि के दानपत्र से हैं.
२. इं. ऐं; जि. ७, पृ. ३५ के सामने के प्लेट से. ३. इं. ऐं; जि. ६, पृ. २४ और २५ के बीच के प्लेटों से.
४. ये मूल पंक्तियां मृगेशवर्मन् के दानपत्र से हैं.
५. "भिषिक्तानां' के 'ना' के पीछे ठीक वैसा ही चिह्न है जैसा कि मृगेशवर्मन् के दानपत्र से दिये हुए अक्षरों में
'हिः' के विसर्ग के नीचे की बिंदी के स्थान में पाया जाता है. संभव है कि यह अनुस्वार का चिह्न हो (न कि 'म्' का)
जो अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा हो. इस प्रकार का चिह्न उक्त दानपत्र में तीन जगह मिलता है, अन्यत्र अनुस्वार
का नियत चिह्न सर्वत्र अक्षर के ऊपर ही धरा है.
६. यहां भी ठीक वही चिह्न है जिसका विवेचन टिप्पण ५ में किया गया है.
७. इं; ऐं; जि. १०, पृ. ५८ के पास के प्लेट से. ८. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ७२ और ७३ के बीच के प्लेटों से.
९. ऐं. इं; जि. ८, पृ. २६८ और २६९ के बीच के प्लेटों से.
८६ प्राचीनलिपिमाला.
के लेख की लिपि स्थिरहस्त से लिखी गई है. पुलकेशिन् के दानपत्र की लिपि में 'अ' और 'आ'
की खड़ी लकीर को बाईं ओर मोड़ कर उक्त अक्षरों के सिरों तक ऊपर बढ़ा दिया है जिससे ये अक्षर
मंगलेश्वर के लेख के उक्त अक्षरों से कुछ कुछ भिन्न प्रतीत होने लगे हैं और इन्हीं के रूपांतर से वर्त-
मान कनड़ी और तेलुगु के 'अ' और 'आ' बने हैं (देखो, लिपिपत्र ८३ में कनड़ी लिपि की उत्पत्ति).
'र' अक्षर, जिसका प्रचार दक्षिण की भाषाओं. में मिलता है, पहिले पहिल इसी दानपत्र में मिलता
है. सर्वलोकाश्रय के दानपत्र की लिपि में 'इ' की दो बिंदियों के ऊपर की लकीर के प्रारंभ में ग्रंथि
बनाई है और उसका घुमाव बढ़ा दिया है. इसीको चलती कलम से पूरा लिखने से वर्तमान कनड़ी
और तेलुगु लिपियों का 'इ' बनता है (देखो, लिपिपत्र ८३). 'क' की खड़ी लकीर को मोड़ कर
मध्य तक और 'र' की को सिरे तक ऊपर बढ़ा दिया है. इन्हीं रूपों में थोड़ा सा और परिवर्तन
होने पर वर्तमान कनड़ी और तेलुगु के 'क' और 'र' बने हैं.
लिपि
तेलगु-कन्नड़ी लिपि. ८७
घसीट है. ‘ई’ की दो बिंदियों के बीच की कड़ी लकीर को नीचे से बाईं ओर घुमा कर सिर तक
ऊपर बढ़ाने से ही उक्त अक्षर का यह रूप बना है. ‘ळ’ (ऋग्वेद के ‘ळ्ह’ का स्थानापन्न)
पहिले पहिल इसी दानपत्र में मिलता है जिसके मध्य भाग में एक आड़ी लकीर जोड़ने से दक्षिण की
लिपियों का ‘र’ बना हो ऐसा प्रतीत होता है. इस दानपत्र से दिये हुए अक्षरों के अंत में ‘ळ’, ‘ळ्ह’
और ‘ऴ’ अक्षर दिये हैं वे इस दानपत्र से नहीं हैं. ‘ळ’ और ‘ळ्ह’ पूर्वी चालुक्य राजा विजया-
दित्य दूसरे के एडुरु के दानपत्र^१ से और ‘ऴ’ उसी वंश के राजा अम्म (प्रथम) के मडुलपिटन (मसु-
लिपटन, मद्रास इहाते के कृष्णा जिले में) के दानपत्र^२ से है.
लिपिपत्र ४७वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
राष्ट्रकूटकुलमलगगनमृगलांञ्छन: बुधजनमुखक-
मलांशुमाली मनोहरगुणगणांलंकारभार: ककराज-
नामधेयः तस्य पुत्रः स्ववंशानकन्दपसंघातपरंप-
राभ्युदयकारणः परमशिष(षि)ब्राह्मणभक्तितत्पय्यंकुश-
लः समस्तगुणगणाध्वितोनो (?ष्टानं) विख्यातसर्व्वलोकनिरुप-
मस्थिरभावनि(वि) जितारिमण्डनः यस्यैम(?व) मासीत् ॥ जित्वा भू-
परिवर्गेण(र्ग्वं न) यकुशलतया येन राज्यं कृतं यः
लिपिपत्र ४८ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी चालुक्यवंशी राजा भीम दूसरे (ई. स. ६३४ से ६३५ तक) के पागनवरम्
के दानपत्र^३ से और उसी वंश के अम्म दूसरे (ई. स. ६४५ से ६७० तक) के एक दानपत्र^४ से
तय्यार किया गया है. इन दोनों दानपत्रों की लिपि स्थिरहस्त और सुंदर है.
लिपिपत्र ४८वें की मूल पंक्तियों^५ का नागरी अक्षरांतर-
स्वस्ति श्रीमर्ता सकलभुवनसंस्तूया(य)मान-
मानव्यसगो(गो)त्राणा(णां) हारोतिपुत्राणां कौशिकवप्र-
सादलव्धराज्यानां मातृ(तृ)गणपरिपालितानां स्वा-
मि[म]हासेनपादानुध्यातानां भगवन्नारायणप्रसा-
दसमासादितवरवराहलांच्छ(छ) नेक्षणक्षणशोल्क-
लिपिपत्र ४६ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी चालुक्यवंशी राजा राजराज के कोरुमेल्लि से मिले हुए शक सं. ६४४ (ई.
स. १०२२) के दानपत्र^६ से तय्यार किया गया है. इसकी लिपि घसीट है और इसके अ, आ, इ,
ई, उ, ऌ, ग, च, ज, ठ, ड, ढ, त, थ, ध, न, ब, य, र, ल और स वर्तमान कन्नड़ी या तेलुगु
लिपि के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते ही हैं. अक्षरों के सिर बहुधा V ऐसे बनाये हैं और अनुस्वार
१. ऍ. इं; जि. ५, पृ. १२० और १२१ के बीच के प्लेट की क्रमशः पंक्ति १२ और २० से.
२. ऍ. इं; जि. ५. पृ. १३२ के पास के प्लेट की पंक्ति ३२. ३. इं. पँ; जि. १३, पृ. २१४ और २१५ के बीच के प्लेटों से.
४. इं. पँ; जि. १३, पृ. २४८ और २४६ के बीच के प्लेटों से.
५. ये मूल पंक्तियां भीम (दूसरे) के दानपत्र से. हैं. ६. इं. पँ; जि. १४, पृ. ५० और ५३ के बीच के प्लेटों से.
५८ प्राचीनलिपिमाला.
को कहीं अक्षर की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ और कहीं अक्षर के सामने मध्य में धरा है. इस
दानपत्र से दिये हुए अक्षरों के अंत में जो अ, आ, ख, र, ऊ, खा और उ अक्षर दिये हैं वे इस ताम्र-
पत्र से नहीं है. उनमें से अ, आ, ख और र ये चार अक्षर जान्हवी (गंगा) वंशी राजा अरिवर्मन्
के जाली दानपत्र¹ से लिये गये हैं. इस पुस्तक में जाली दानपत्रों से कोई लिपिपत्र नहीं बनाया
गया परंतु उक्त अक्षरों के ऐसे रूप अन्यत्र नहीं मिलते और उनका जानना भी आवश्यक होने से ये यहां
दिये गये हैं. बाकी के तीन अक्षरों में से 'ऊ' और 'खा' पूर्वी चालुक्य राजा विष्णुवर्द्धन पांचवें
(कलिंविष्णुवर्द्धन) के दानपत्र से² और अंतिम 'उ'³ एहोल के नारायण के मंदिर के शिलालेख⁴ से
लिया गया है.
लिपिपत्र ४६वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
श्रीधाम्नः पुरुषोत्तमस्य महतो नारा-
यणस्य प्रभोर्नाभीपंकरुहाद्बभूव जगतस्स्रष्टा
स्वयंभूस्ततः जज्ञे मानससूनुरत्रिरिति य[:]
तस्मान्मुनेरभूत्सोमो वंशकर्त्तामृतांशुर्द्दिशा[:] श्रीक-
ण्ट(ण्ठ)चूडामणिः। तस्मादासीत्सुधामूतेर्बुधो बुध-
नुतस्ततः ज(जा)तः पुरूरवा नाम चक्रवत्तो[त्तौ] स-
लिपिपत्र ५० वां.
यह लिपिपत्र काकतीयवंशी राजा रुद्रदेव के शक सं. १०८४ (ई. स. ११६२) के अनंकोंड के
शिलालेख⁶ और उसी वंश के राजा गणपति के समय के शक सं. ११३५ (ई. स. १२१३) के चेब्रोलू के
शिलालेख⁷ से तय्यार किया गया है. अनंकोंड के लेख से मुख्य मुख्य अक्षर ही दिये गये हैं.
इस लिपिपत्र में दिये हुए अक्षरों में से अ, आ, इ, ई, उ, ओ, औ, ख, ग, च, छ, ज, झ, ट, ठ, ड,
ढ, ण, त, थ, ध, न, ब, भ, म, य, र, ल, श और स वर्तमान कनड़ी या तेलुगु के उक्त अक्षरों से बहुत
कुछ मिलते जुलते हैं. चेब्रोलू के लेख के 'श्री' में 'शी' बना कर उसके चौतरफ़ चतुरस्र सा बना
कर उस के अंत में ग्रंथि लगाई है. यह सारा चतुरस्रवाला अंश 'र' का ही विलक्षण रूप है. 'ष्टा'
और 'स्थ' में 'ठ' और 'थ' का केवल नीचे का आधा हिस्सा ही बनाया है. चेब्रोलू के लेख के
अक्षरों के अंत में ऋ के तीन रूप और ए अक्षर अलग दिये हैं. उनमें से पहिला 'ऋ' चालुक्य-
वंशी राजा कीर्तिवर्मन् (दूसरे) के वक्कलेरी से मिले हुए शक सं. ६७६ (ई. सं. ७५७) के दानपत्र ⁸
से, दूसरा वनपल्ली से मिले हुए अण्णवेम के शक सं. १३०० (? १३०१) के दानपत्र ⁹ से, और
तीसरा 'ऋ' तथा 'ऐ' दोनों चालुक्यवंशी राजा पुलुकेशिन् [प्रथम] के जाली दानपत्र ¹⁰ से लिये
गये हैं.
१. इं. ऐं; जि. ८, पृ. २१२ और २१३ के बीच के प्लेटों से.
२. इं. ऎं; जि. १३, पृ. १८६ और १८७ के बीच के प्लेटों से.
३. लिपिपत्र ४६ में दिये हुए अक्षरों के अंतिम अक्षर के ऊपर गलती से नागरी का 'ऊ' छप गया है जो अशुद्ध है.
उसके स्थान में पाठक 'उ' पढ़ें.
४. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ७५ के पास के प्लेट से. ५. ये मूल पंक्तियां राजराज (दूसरे) के दानपत्र से हैं.
६. इं. ऐं; जि. ११ पृ. १२ और १७ के बीच के प्लेटों से. ७. ऎ. इं; जि. ५, पृ. १४६ और १४७ के बीच के प्लेटों से.
८. ऍ इं; जि. ५, पृ. २०२ के पास के प्लेट ४ B, पंक्ति ६५ से.
९. ऍ. इं; जि. ३, पृ. ६३ के पास के प्लेट ३ A, पंक्ति ५०.
१०. इं. ऐं; जि. ८ पृ. ३४० के पास की प्लेट, क्रमशः पंक्ति ४५ और ३६.
ग्रंथ लिपि ८६
लिपिपत्र ५०वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
एषां वंशे रघूणां क्षितिपतिरभवद्दुर्जयश्चौ-
र्थ्यकेळि(खि)स्फूर्जद्भूमा ततोभूत्प्रतिकरटघटाशात-
नो बेतराजः । चक्रे विक्रांतबाहुस्तदनु व-
सुमतीपालनं प्रोत्नभूपस्तत्पुत्रो रुद्रदेवस्त-
दुपरि च नृपोत्तंसरत्नं बभूव ॥ ततस्तत्सोद्-
लिपिपत्र ५१ वां.
यह लिपिपत्र दोनेपूंर्डि से मिले हुए पीठापुरी के नामयनायक के शक सं. १२५६ (ई. स.
१३३७) के दानपत्र², वनपल्ली से मिले हुए अन्नवेम के दानपत्र³ तथा कोंडवीडु से मिले हुए
गणदेव के शक सं. १३७७ के दानपत्र⁴ से तय्यार किया गया है. वनपल्ली और कोंडवीडु के
दानपत्रों से मुख्य मुख्य अक्षर दिये गये हैं. दोनेपूंर्डि के दानपत्र के क, ञ (‘ज्ञ’ में), द, प, फ,
व और ह में थोड़ा सा परिवर्तन होने से वर्तमान कनड़ी और तेलुगु लिपियों के वे ही अक्षर बने हैं.
‘फ’ के नीचे जो उलटे अर्धवृत्त का सा चिह्न लगा है वह ‘फ’ और ‘प’ का अंतर बतलाने के लिये
ही है. पहिले उसका स्थानापन्न चिह्न ‘फ’ के भीतर दाहिनी ओर की खड़ी लकीर के साथ
सटा रहता था (देखो, लिपिपत्र ४८, ४६, ५०) और वर्तमान कनड़ी तथा तेलुगु लिपियों में
उसका रूप शंकु जसी आकृति की खड़ी लकीर में बदल कर अक्षर के नीचे लगाया जाता है.
अनुस्वार अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे लगाया है. ई. स. की १४ वीं शताब्दि के पीछे भी इस
लिपि में और थोड़ा सा अंतर पड़ कर वर्तमान कनड़ी और तेलुगु लिपियां बनी हैं. यह अंतर लिपि-
पत्र ८० में दी हुई लिपियों का लिपिपत्र ५१ से मिलान करने पर स्पष्ट होगा.
लिपिपत्र ५१वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
श्रौउ(भ्यु)मामहेश्वराभ्यां न(न)मः । पायादः
करिवदनः कु(कु)तनिजदानस्तुताविवालिगणे ।
निनदति मुहुरपिधत्ते कर्णौ(णौ) यः कर्ण(र्ण)-
तालाभ्यां ॥ औविष्णुरस्तु भवदिष्टफलप्रदा-
१४—ग्रंथ लिपि.
ई. स. की ७ वीं शताब्द्दी से (लिपिपत्र ५२ से ५६).
इस लिपि का प्रचार मद्रास इहाते के उत्तरी व दक्षिणी आर्कट, सलेम, त्रिचिनापली, मदुरा
और तिन्नेवेल्लि जिलों में तथा त्रावनकोर राज्य में ई. स. की सातवीं शताब्दी के आस पास से
१. ये मूल पंक्तियां चेब्रोलू के लेख से हैं. २. पँ. इं; जि. ५, पृ. २६४ और २६७ के बीच के प्लेटों से.
३. पं. इं; जि. ३, पृ. ६२ और ६३ के बीच के प्लेटों से. ४. इं. पं; जि. २०, पृ. ३६२ और ३६३ के बीच के प्लेटों से.
५. ये मूल पंक्तियां नामयनायक के दोनेपूंर्डि के दानपत्र से हैं.
६० प्राचीनलिपिशाला. मिलता है और इसीमें क्रमशः परिवर्तन होते होते वर्तमान ग्रंथ लिपि बनी (देखो, ऊपर पृ. ४३-४४).
मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में तामिळ लिपि का, जिसमें वर्गों की अपूर्णता के कारण संस्कृत ग्रंथ लिखे नहीं जा सकते, प्रचार है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इसी लिपि में लिखे जाते हैं इसीसे इसका नाम
'ग्रंथ लिपि' (संस्कृत ग्रंथों की लिपि) पड़ा हो. यह पल्लव, पांड्य, और चोल राजाओं, तथा चोल- वंशियों का राज्य छीननेवाले वेंगी के पूर्वी चालुक्य राजा राजेंद्रचोड़ के वंशजों, गंगवंशियों, बाणवंशियों,
विजयनगर के यादवों आदि के शिलालेखों या ताम्रपत्रों में मिलती है. यह लिपि प्रारंभ में तेलुगु- कनड़ी से बहुत कुछ मिलती हुई थी (लिपिपत्र ५२ में दी हुई राजा राजसिंह के कांचीपुरम् के लेख की
लिपि को लिपिपत्र ४३ में दी हुई पल्लववंशी विष्णुगोपवर्मन् के उरुपुवूलि के दानपत्र की लिपि से मिला कर देखो), परंतु पीछे से चलती कलम से लिखने तथा खड़ी और आड़ी लकीरों को वक्र या
`` रामदार रूप
"उद्भूतभ्रूकुटि[मु]खसंक्षयधूमकेतुः"!
"mukha-kṣaya-dhūmakētuḥ"!
Wait, where is कुल?
Is कुल even there?
LOOK AT THE WORD:
[मु]ख
Wait, does it say कु ल or मु ख?
LOOK AT:
[मु]खसंक्षयधूम-!
Wait! The letters are:
(मु) then ख then सं then क्ष then य then धू then म -!
Look at what I thought was कु ल:
It's NOT कु ल!
Wait, look at the letter after (मु):
It is ख!
Wait, is there a कुल?
Let's look at line L8 again:
Wait! Before संक्षय:
There is:
... (मु) ख सं क्ष य धू म -
Wait, where did णुकुल come from in my first reading?
Ah! टि looked like णि?
No! भ्रूक़ुटि(मु)खसंक्षयधूम-!
Let's trace every letter:
भ्रूकुटि(मु)ख
६२
प्राचीनलिपिमला.
लिपिपत्र ५५ वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
क्षि(क्षो)रोदम् मथितम् मनोभिरतुलम्(लं) देवासुरैर्मंदरं
हित्वाक्षिप्त इवाञ्जनाद्रिरिव यत्तक्षाधिकम्(कं) राज-
ते यो भोगि(गौ)न्द्रनिविष्टमूत्ति(र्त्ति)रनिशम् भूयोमृतस्या-
शये रक्षो[द्]वः सुरदृ(वृ)न्दवन्दितपत(द)द्वन्द्वः स्स(न्दस्स)
लिपिपत्र ५६ वां.
यह लिपिपत्र पांड्यवंशी राजा सुंदरपांड्य के श्रीरंगम् के लेख², आलंपूंडि से मिले हुए विजय-
नगर के यादव राजा विरूपाक्ष के शक सं. १३०५ (ई. स. १३८३) के दानपत्र³ और वहीं के श्रीगिरि-
भूपाल के शक सं. १३४६ (ई. स. १४२४) के दानपत्र⁴ से तय्यार किया गया है. इस लिपिपत्र में
दिये हुए अक्षरों में से अ, आ, इ, उ, ऊ, ऋ, ए, ओ, क, ख, ग, घ, ङ, च, ज, ठ, ड, ण, त, थ, द, ध, न,
प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह और ळ वर्तमान ग्रंथ लिपि के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते
ही हैं. ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पीछे थोड़ा सा और अंतर पड़ने पर वर्तमान ग्रंथ लिपि बनी.
लिपिपत्र ५६ वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
हरिः ओम् स्वस्ति श्रौः येनासौ
करुणामनीयत दशां श्रीरंगपत्मा(द्मा)करः
कृत्वा तम् भुवनान्तरप्रणयिनं करुणा-
१५—कलिंग लिपि.
ई. स. की ७ वीं से ११ वीं शताब्दी तक (लिपिपत्र ५७ से ५६).
कलिंग लिपि मद्रास इहाते के चिकाकोल और गंजाम के बीच के प्रदेश में कलिंगनगर के गंगा-
वंशी राजाओं के दानपत्रों में ई. स. की ७ वीं शताब्दी के आस पास से ११ वीं शताब्दी के आस पास
तक मिलती है. इसका सब से पहिला दानपत्र, जो अब तक मिला है, पूर्वी गंगावंशी राजा देवेंद्र-
वर्मन् का गांगेय संवत् ८७ का है. उसकी लिपि में मध्यप्रदेशी लिपि का अनुकरण पाया जाता है
क्योंकि अक्षरों के सिर संदूक की आकृति के, भीतर से भरे हुए, हैं और कई अक्षर समकोण वाले हैं
(देखो, ऊपर पृ. ४४). पिछले दानपत्रों में अक्षर समकोणवाले नहीं किंतु पश्चिमी एवं तेलुगु-कनड़ी
लिपि की नांई गोलाईदार मिलते हैं और उनमें तेलुगु-कनड़ी के साथ साथ कुछ ग्रंथ तथा नागरी
लिपि का मिश्रण भी पाया जाता है.
१. ये मूल पंक्तियां उदयेंदिरम् के दानपत्र से हैं.
२. ऍ. इं; जि. ३, पृ. १४ के पास के प्लेट से.
३. ए. इं; जि. ३, पृ. २२८ के पास के प्लेट से.
४. ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३१२ और ३१३ के बीच के प्लेटों से.
५. ये मूल पंक्तियां श्रीरंगम् के लेख से हैं.
कलिंग लिपि. ६३
लिपिपत्र ५७ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी गंगावंशी राजा इंद्रवर्म्मन् के अच्युतपुरम् के दानपत्र¹, राजा इंद्रवर्म्मन् (दूसरे)
के चिकाकोल के दानपत्र² और राजा देवेंद्रवर्म्मन् के दानपत्र³ से तय्यार किया गया है. अच्युतपुरम्
के दानपत्र के अक्षरों के सिर मध्यदेशी लिपि की नांई संदूक की आकृति के, भीतर से भरे हुए, हैं
और अ, आ, क, र आदि अक्षर समकोणवाले हैं. 'न' नागरी का सा है और बाकी के अक्षर
तेलुगु-कनड़ी से मिलते हुए हैं. चिकाकोल के दानपत्र के अक्षरों के भी सिर चौकूंटे, भीतर से भरे
हुए हैं, और 'म्' ग्रंथ लिपि की शैली का है.
लिपिपत्र ५७वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति सर्व्वतुरमणीयाद्विजयकलिङ्गनगरात्सकलभुवन-
निर्म्माणैकसूत्रधारस्य भगवतो गोकर्णस्वामिनश्चरणकम-
लयुगलप्रणामादपगतकलिकलङ्को विनयनयसम्पदा-
माधारः स्वासिधारापरिस्पन्दाधिगतसकलकलिङ्गाधिराज्यश्चतु-
रुदधितरङ्गमेखलावनितलप्रविततामलयशः अनेकसम-
लिपिपत्र ५८ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी गंगावंशी राजा देवेंद्रवर्म्मन् दूसरे (अनंतवर्मन् के पुत्र) के गांगेय संवत्
[२]५१⁵ और २५४⁶ के दो दानपत्रों से तय्यार किया गया है. पहिले दानपत्र के अक्षरों में 'अ'
तीन प्रकार का है जिनमें से पहिले दो रूप नागरी हैं और तीसरा रूप तेलुगु-कनड़ी की शैली का है और
लिपिपत्र ४६ में दिये हुए 'अ' के दूसरे रूप से मिलता हुआ है. उ, ए, ग (पहिला), ज (दूसरा),
त (दूसरा), द और न (पहिला और दूसरा) नागरी से मिलते हुए ही हैं. दूसरे ताम्रपत्र के
अक्षरों में से अ, आ, इ, ट, ध और ष नागरी के ही हैं.
लिपिपत्रं ५८वें की मूल पंक्तियों⁷ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति अमरपुरानुकारिण [:] सर्व्वर्तु (तुं) सुखरम-
णीयाद्विजयवत [:] कलिङ्गा (ङ्ग) नगराधिवासका [त्] महेन्द्राच-
लामलशिखरप्रतिष्ठितस्य सचराचरगुरो [:] सक-
लभुवननिर्माणैकसूत्रधारस्य शशाङ्कचूडामणि (णे)-
१. ऐं. इं; जि. ३, पृ. १२८ और १२६ के बीच के प्लेटों से.
२. इं. ऐं; जि. १३, पृ. १२२ और १२३ के बीच के प्लेटों से. इस लिपिपत्र में चिकाकोल के दानपत्र का संवत् गांगेय
सं. १४६ छुपा है जिसको शुद्ध कर पाठक १४८ पढें.
३. ऐं. इं; जि. ३, पृ. १३२ और १३३ के बीच के प्लेटों से.
४. ये मूल पंक्तियां राजा इंद्रवर्म्मन् के अच्युतपुरम् के दानपत्र से हैं.
५. इं. ऐं; जि. १३, पृ. २७४ और २७५ के बीच के सेटों से. ६. इं. ऐं; जि. १८, पृ. १४४ और १४५ के बीच के सेटों से.
७. ये मूल पंक्तियां देवेंद्रवर्म्मन् के गांगेय संवत् [२]५१ के दानपत्र से हैं.