सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 117

५८ प्राचीनलिपिमाला.
को कहीं अक्षर की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ और कहीं अक्षर के सामने मध्य में धरा है. इस
दानपत्र से दिये हुए अक्षरों के अंत में जो अ, आ, ख, र, ऊ, खा और उ अक्षर दिये हैं वे इस ताम्र-
पत्र से नहीं है. उनमें से अ, आ, ख और र ये चार अक्षर जान्हवी (गंगा) वंशी राजा अरिवर्मन्
के जाली दानपत्र¹ से लिये गये हैं. इस पुस्तक में जाली दानपत्रों से कोई लिपिपत्र नहीं बनाया
गया परंतु उक्त अक्षरों के ऐसे रूप अन्यत्र नहीं मिलते और उनका जानना भी आवश्यक होने से ये यहां
दिये गये हैं. बाकी के तीन अक्षरों में से 'ऊ' और 'खा' पूर्वी चालुक्य राजा विष्णुवर्द्धन पांचवें
(कलिंविष्णुवर्द्धन) के दानपत्र से² और अंतिम 'उ'³ एहोल के नारायण के मंदिर के शिलालेख⁴ से
लिया गया है.
लिपिपत्र ४६वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
श्रीधाम्नः पुरुषोत्तमस्य महतो नारा-
यणस्य प्रभोर्नाभीपंकरुहाद्बभूव जगतस्स्रष्टा
स्वयंभूस्ततः जज्ञे मानससूनुरत्रिरिति य[:]
तस्मान्मुनेरभूत्सोमो वंशकर्त्तामृतांशुर्द्दिशा[:] श्रीक-
ण्ट(ण्ठ)चूडामणिः। तस्मादासीत्सुधामूतेर्बुधो बुध-
नुतस्ततः ज(जा)तः पुरूरवा नाम चक्रवत्तो[त्तौ] स-

लिपिपत्र ५० वां.
यह लिपिपत्र काकतीयवंशी राजा रुद्रदेव के शक सं. १०८४ (ई. स. ११६२) के अनंकोंड के
शिलालेख⁶ और उसी वंश के राजा गणपति के समय के शक सं. ११३५ (ई. स. १२१३) के चेब्रोलू के
शिलालेख⁷ से तय्यार किया गया है. अनंकोंड के लेख से मुख्य मुख्य अक्षर ही दिये गये हैं.
इस लिपिपत्र में दिये हुए अक्षरों में से अ, आ, इ, ई, उ, ओ, औ, ख, ग, च, छ, ज, झ, ट, ठ, ड,
ढ, ण, त, थ, ध, न, ब, भ, म, य, र, ल, श और स वर्तमान कनड़ी या तेलुगु के उक्त अक्षरों से बहुत
कुछ मिलते जुलते हैं. चेब्रोलू के लेख के 'श्री' में 'शी' बना कर उसके चौतरफ़ चतुरस्र सा बना
कर उस के अंत में ग्रंथि लगाई है. यह सारा चतुरस्रवाला अंश 'र' का ही विलक्षण रूप है. 'ष्टा'
और 'स्थ' में 'ठ' और 'थ' का केवल नीचे का आधा हिस्सा ही बनाया है. चेब्रोलू के लेख के
अक्षरों के अंत में ऋ के तीन रूप और ए अक्षर अलग दिये हैं. उनमें से पहिला 'ऋ' चालुक्य-
वंशी राजा कीर्तिवर्मन् (दूसरे) के वक्कलेरी से मिले हुए शक सं. ६७६ (ई. सं. ७५७) के दानपत्र ⁸
से, दूसरा वनपल्ली से मिले हुए अण्णवेम के शक सं. १३०० (? १३०१) के दानपत्र ⁹ से, और
तीसरा 'ऋ' तथा 'ऐ' दोनों चालुक्यवंशी राजा पुलुकेशिन् [प्रथम] के जाली दानपत्र ¹⁰ से लिये
गये हैं.

१. इं. ऐं; जि. ८, पृ. २१२ और २१३ के बीच के प्लेटों से.
२. इं. ऎं; जि. १३, पृ. १८६ और १८७ के बीच के प्लेटों से.
३. लिपिपत्र ४६ में दिये हुए अक्षरों के अंतिम अक्षर के ऊपर गलती से नागरी का 'ऊ' छप गया है जो अशुद्ध है.
उसके स्थान में पाठक 'उ' पढ़ें.
४. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ७५ के पास के प्लेट से. ५. ये मूल पंक्तियां राजराज (दूसरे) के दानपत्र से हैं.
६. इं. ऐं; जि. ११ पृ. १२ और १७ के बीच के प्लेटों से. ७. ऎ. इं; जि. ५, पृ. १४६ और १४७ के बीच के प्लेटों से.
८. ऍ इं; जि. ५, पृ. २०२ के पास के प्लेट ४ B, पंक्ति ६५ से.
९. ऍ. इं; जि. ३, पृ. ६३ के पास के प्लेट ३ A, पंक्ति ५०.
१०. इं. ऐं; जि. ८ पृ. ३४० के पास की प्लेट, क्रमशः पंक्ति ४५ और ३६.