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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 318 में से

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पृष्ठ 115

८६ प्राचीनलिपिमाला.
के लेख की लिपि स्थिरहस्त से लिखी गई है. पुलकेशिन् के दानपत्र की लिपि में 'अ' और 'आ'
की खड़ी लकीर को बाईं ओर मोड़ कर उक्त अक्षरों के सिरों तक ऊपर बढ़ा दिया है जिससे ये अक्षर
मंगलेश्वर के लेख के उक्त अक्षरों से कुछ कुछ भिन्न प्रतीत होने लगे हैं और इन्हीं के रूपांतर से वर्त-
मान कनड़ी और तेलुगु के 'अ' और 'आ' बने हैं (देखो, लिपिपत्र ८३ में कनड़ी लिपि की उत्पत्ति).
'र' अक्षर, जिसका प्रचार दक्षिण की भाषाओं. में मिलता है, पहिले पहिल इसी दानपत्र में मिलता
है. सर्वलोकाश्रय के दानपत्र की लिपि में 'इ' की दो बिंदियों के ऊपर की लकीर के प्रारंभ में ग्रंथि
बनाई है और उसका घुमाव बढ़ा दिया है. इसीको चलती कलम से पूरा लिखने से वर्तमान कनड़ी
और तेलुगु लिपियों का 'इ' बनता है (देखो, लिपिपत्र ८३). 'क' की खड़ी लकीर को मोड़ कर
मध्य तक और 'र' की को सिरे तक ऊपर बढ़ा दिया है. इन्हीं रूपों में थोड़ा सा और परिवर्तन
होने पर वर्तमान कनड़ी और तेलुगु के 'क' और 'र' बने हैं.
लिपि