प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 116, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेलगु-कन्नड़ी लिपि. ८७
घसीट है. ‘ई’ की दो बिंदियों के बीच की कड़ी लकीर को नीचे से बाईं ओर घुमा कर सिर तक
ऊपर बढ़ाने से ही उक्त अक्षर का यह रूप बना है. ‘ळ’ (ऋग्वेद के ‘ळ्ह’ का स्थानापन्न)
पहिले पहिल इसी दानपत्र में मिलता है जिसके मध्य भाग में एक आड़ी लकीर जोड़ने से दक्षिण की
लिपियों का ‘र’ बना हो ऐसा प्रतीत होता है. इस दानपत्र से दिये हुए अक्षरों के अंत में ‘ळ’, ‘ळ्ह’
और ‘ऴ’ अक्षर दिये हैं वे इस दानपत्र से नहीं हैं. ‘ळ’ और ‘ळ्ह’ पूर्वी चालुक्य राजा विजया-
दित्य दूसरे के एडुरु के दानपत्र^१ से और ‘ऴ’ उसी वंश के राजा अम्म (प्रथम) के मडुलपिटन (मसु-
लिपटन, मद्रास इहाते के कृष्णा जिले में) के दानपत्र^२ से है.
लिपिपत्र ४७वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
राष्ट्रकूटकुलमलगगनमृगलांञ्छन: बुधजनमुखक-
मलांशुमाली मनोहरगुणगणांलंकारभार: ककराज-
नामधेयः तस्य पुत्रः स्ववंशानकन्दपसंघातपरंप-
राभ्युदयकारणः परमशिष(षि)ब्राह्मणभक्तितत्पय्यंकुश-
लः समस्तगुणगणाध्वितोनो (?ष्टानं) विख्यातसर्व्वलोकनिरुप-
मस्थिरभावनि(वि) जितारिमण्डनः यस्यैम(?व) मासीत् ॥ जित्वा भू-
परिवर्गेण(र्ग्वं न) यकुशलतया येन राज्यं कृतं यः
लिपिपत्र ४८ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी चालुक्यवंशी राजा भीम दूसरे (ई. स. ६३४ से ६३५ तक) के पागनवरम्
के दानपत्र^३ से और उसी वंश के अम्म दूसरे (ई. स. ६४५ से ६७० तक) के एक दानपत्र^४ से
तय्यार किया गया है. इन दोनों दानपत्रों की लिपि स्थिरहस्त और सुंदर है.
लिपिपत्र ४८वें की मूल पंक्तियों^५ का नागरी अक्षरांतर-
स्वस्ति श्रीमर्ता सकलभुवनसंस्तूया(य)मान-
मानव्यसगो(गो)त्राणा(णां) हारोतिपुत्राणां कौशिकवप्र-
सादलव्धराज्यानां मातृ(तृ)गणपरिपालितानां स्वा-
मि[म]हासेनपादानुध्यातानां भगवन्नारायणप्रसा-
दसमासादितवरवराहलांच्छ(छ) नेक्षणक्षणशोल्क-
लिपिपत्र ४६ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी चालुक्यवंशी राजा राजराज के कोरुमेल्लि से मिले हुए शक सं. ६४४ (ई.
स. १०२२) के दानपत्र^६ से तय्यार किया गया है. इसकी लिपि घसीट है और इसके अ, आ, इ,
ई, उ, ऌ, ग, च, ज, ठ, ड, ढ, त, थ, ध, न, ब, य, र, ल और स वर्तमान कन्नड़ी या तेलुगु
लिपि के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते ही हैं. अक्षरों के सिर बहुधा V ऐसे बनाये हैं और अनुस्वार
१. ऍ. इं; जि. ५, पृ. १२० और १२१ के बीच के प्लेट की क्रमशः पंक्ति १२ और २० से.
२. ऍ. इं; जि. ५. पृ. १३२ के पास के प्लेट की पंक्ति ३२. ३. इं. पँ; जि. १३, पृ. २१४ और २१५ के बीच के प्लेटों से.
४. इं. पँ; जि. १३, पृ. २४८ और २४६ के बीच के प्लेटों से.
५. ये मूल पंक्तियां भीम (दूसरे) के दानपत्र से. हैं. ६. इं. पँ; जि. १४, पृ. ५० और ५३ के बीच के प्लेटों से.