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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

वाराहीक्रमः १८७
अन्यासां धातुनाथानामप्येवं बीजे नामनि धातौ त्वाराधनकर्मणि मन्त्रः
सन्नाम। रमरयूं राकिणि रक्तधातुं पिब पिब लमरयूं लाकिनि
मांसधातुं भक्षय भक्षय डमरयूं डाकिनि मेदोधातुं ग्रस ग्रस कमरयूं
काकिनि अस्थिधातुं जम्भय जम्भय समरयूं साकिनि मज्जाधातुं गृह्ल
गृह्ल हमरयूं हाकिनि शुक्रधातुं पिब पिब अणिमादिवशं कुरु कुरु
स्वाहा-इति धातुनाथयजनम् ।।२८।।
षट्कोणे कोणाग्रेषु आक्षाईं. इत्यादि षण्मन्त्रैः षड्देवताः पूजयेत्। 'ऐं
ग्लौं' आक्षाईं ब्रह्माणी श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नम, इति मन्त्रस्वरूपम्।
एवमग्रेऽपि। मध्ये (षट्कोणमध्ये) स्वाहान्तमेकं मन्त्रं दर्शयित्वा एतन्मन्त्र-
वर्णानन्यत्र काँश्चिदतिदिशति—एवमिति। एवम् (उक्तमन्त्रवदित्यर्थः)। एवमति-
देशमुक्त्वा अतिदिष्टमन्त्रवर्णेषु बाधकमूह्यम्। तत्रैव क्वचित्स्थलविशेषे
दर्शयति—बीजेत्यादिना। बीजे इत्येकवचनं जात्याख्यायाम्। 'इति रीत्या
बीजस्थाने वक्ष्यमाणबीजानां सन्नाम ऊहः कार्यः।
एवं धातौ त्वग्धातुस्थाने तत्तद्धातूनां नामनि याकिनीति नामस्थाने
तत्तन्नाम्नामूहश्च कार्यः। शिष्टा मन्त्रवर्णा मम सर्वशत्रूणाम् इत्यादयः समाना
इति भावः। अथ द्वितीयादिमन्त्रेषु विशेषमाह—रमरयूमित्यादिना ।।२८।।
तीसरे आवरण की पूजा का सर्वाधिक विशिष्ट महत्त्व है। षट्कोण के
छः कोणों के कोण-मूलों में क्रमशः पाँच बीज-मन्त्र लगते हैं। ऐं ग्लौं आ क्षाईं
उनके बाद ब्रह्माणी देवी का उल्लेख कर श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः।
यह प्रथम अग्रकोण का मूल मन्त्र बनता है। पूरे मन्त्र इस प्रकार बनेंगे—
१. ब्रह्माणी—ऐं ग्लौं आक्षाईं ब्रह्माणी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
२. माहेश्वरी—ऐं ग्लौं ईलाईं माहेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
३. कौमारी—ऐं ग्लौं ऊहाईं कौमारी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
४. वैष्णवी—ऐं ग्लौं ऋसाईं वैष्णवी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
५. इन्द्राणी—ऐं ग्लौं ऐशाईं इन्द्राणी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
६. चामुण्डा—ऐं ग्लौं औवाईं चामुण्डा श्रीपादुकां पूजयामि नमः।

१८८ परशुरामकल्पसूत्रम्
इन्हीं कोणों में कोण-मध्य में क्रमशः १. याकिनी, २. राकिणी,
३. लाकिनी, ४. डाकिनी, ५. काकिनी, ६. साकिनी और ७. हाकिनी देवियों
की पूजा होती है। ये देवियाँ धातुओं की स्वामिनी मानी जाती है। इनके क्रमिक
मन्त्र इस प्रकार हैं—
१. याकिनी—ऐं ग्लौं यमरयूं यां यीं यूं यैं यौं यः याकिनि जम्भय जम्भय मम
शत्रूणां त्वग्धातुं गृह्ण गृह्ण अणिमादिवशं कुरु कुरु स्वाहा श्रीपादुकां पूजयामि
नमः।
२. राकिणी—ऐं ग्लौं रमरयूं राकिणि रक्तधातुं पिब पिब इतना मूल उल्लेख है;
किन्तु इस अन्य धातु स्वामिनियों के मन्त्रों में भी पहले की तरह योजना
होनी चाहिये, यह निर्देश सूत्र में अन्यासां धातुनाथानां वाक्य में दिया हुआ
है। अतः पूरा मन्त्र इस प्रकार होता है—
ऐं ग्लौं रमरयूं रां रीं रूं रैं रौं रः राकिनि जम्भय जम्भय मम सर्वशत्रूणां रक्तधातुं
पिब पिब अणिमादिवशं कुरु कुरु स्वाहा राकिणी श्रीपादुकां पूजयामि
(तर्पयामि) नमः।
३. लाकिनी—ऐं ग्लौं लमरयूं लां लीं लूं लैं लौं लः लाकिनि जम्भय जम्भय
मम सर्वशत्रूणां मांसधातुं भक्षय भक्षय अणिमादि वशं कुरु कुरु स्वाहा
लाकिनी श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः।
४. डाकिनी—ऐं ग्लौं डमरयूं डां डीं डं डैं डौं डः डाकिनि जम्भय जम्भय मम
सर्वशत्रूणां मेदोधातुं ग्रस ग्रस अणिमादि वशं कुरु कुरु स्वाहा डाकिनी
श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः।
५. काकिनी—ऐं ग्लौं कां कीं कं कैं कौं कः काकिनि जम्भय जम्भय मम सर्व-
शत्रूणाम् अस्थिधातुं भञ्जय भञ्जय अणिमादि वशं कुरु कुरु स्वाहा काकिनी
श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः।
६. साकिनी—ऐं ग्लौं समरयूं सां सीं सूं सैं सौं सः साकिनि जम्भय जम्भय
मम सर्वशत्रूणां मज्जाधातुं गृह्ण गृह्ण अणिमादिवशं कुरु कुरु स्वाहा साकिनि
श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
७. हाकिनि—ऐं ग्लौं हमरयूं हां हीं हूं हैं हौं हः हाकिनि जम्भय जम्भय मम
सर्वशत्रूणां शुक्रधातुं पिब पिब अणिमादिवशं कुरु कुरु स्वाहा हाकिनि

वाराहीक्रमः १८९
श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः। इन धातु स्वामिनियों की पूजा सम्पन्न
करने के अनन्तर षट्कोण के उभयपार्श्व की पूजा की जाती है॥२८॥
अनन्तरं षडस्रोभयपार्श्वयोः क्रोधिनीस्तम्भिन्यौ चामरग्राहिण्यौ
तत्रैव स्तम्भनमुसलायुधाय आकर्षणहलायुधाय नमः षडराद्बहिः
पुरतो देव्याः क्षौं क्रौं चण्डोच्चण्डाय नम इति तद्यजनम् ॥२९॥
अनन्तरं धातुनाथयजनानन्तरम्। षडस्रोभयपार्श्वयोरिति, उभयपार्श्व-
द्वयकोणान्तःप्रदेशो बोध्यः। मन्त्रस्वरूपं च ऐं ग्लौं क्रोधिनी चामरग्राहिणी
श्रीपादुकाम्। एवमपरम्। अग्रे चण्डोच्चण्डपूजाया बहिर्विधानात् तत्रैवेति
षडस्रोभयपार्श्वयोरेवेत्यर्थः। इति तृतीयावरणम् ॥२९॥
धातुनाथ पूजन के अनन्तर षडस्र के दाहिने और बायें दोनों ओर कोणों
के अन्तःप्रदेश में क्रोधिनी और स्तम्भिनी दो चामरग्राहिणी शक्तियों की पूजा
भी होनी चाहिये। इनके दो मन्त्र इस प्रकार बनेंगे।
१. ऐं ग्लौं क्रोधिनी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
२. ऐं ग्लौं स्तम्भिनी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
षट्कोण के दोनों पार्श्व भाग में ही आयुधों की पूजा करने का निर्देश
सूत्रकार दे रहे हैं। इनके मन्त्र—१. ऐं ग्लौं स्तम्भनमुसलायुधाय नमः। २. ऐं
ग्लौं आकर्षणहलायुधाय नमः। बनते हैं। षडर के बाहर देवी के समक्ष ही श्री
चण्डोच्चण्ड देव की पूजा इस मन्त्र से करनी चाहिये।
१. ऐं ग्लौं क्षौं क्रौं चण्डोच्चण्डाय नमः। इस प्रकार धातुनाथ, चामर-
ग्राहिणी और षडस्र के बाहर चण्डोच्चण्ड की पूजा इस तीसरे आवरण में सम्पन्न
की जाती है॥२९॥
चतुर्थावरणमाह
अष्टदले वार्त्ताली वाराही वराहमुख्यन्धिन्यादयः पञ्च तद्बहिः
महामहिषाय देवीवाहनाय नमः ॥३०॥
देव्यग्रदलमारभ्य प्रादक्षिण्येन, क्रमस्यानुक्तत्वात्। वाहनपूजामाह—
तद्बहिरिति। अष्टदलाद्बहिरित्यर्थः। देवीपुरतोऽयं पूज्यः, वाहनरूपत्वात्।
वाहनस्थितेः सर्वत्र प्रधानदेवताग्रभागे दृष्टत्वात् ॥३०॥

१९० परशुरामकल्पसूत्रम्
चतुर्थ आवरण में अष्टदलों में आठ देवियों—१. वार्त्ताली २. वाराही,
३. वराहमुखी, ४. अन्धिनी, ५. रुन्धिनी, ६. जम्भनी, ७. मोहिनी और
८. स्तम्भिनी की पूजा की जाती है। अष्टदल के बाहर सामने ही 'ऐं ग्लौं
महामहिषाय देवीवाहनाय नमः' मन्त्र से वाहन की पूजा होती है। 'ऐं ग्लौं'
लगाकर ही 'वार्त्ताली श्रीपादुकां पूजयामि नमः' के समान सभी सातों देवियों
के मन्त्र बनते हैं॥३०॥
पञ्चमावरणमाह
शतारे देवीपुरतो दलसन्धौ जम्भिन्यै, इन्द्राद्याप्सरोभ्यः,
सिद्धेभ्यः, द्वादशादित्येभ्योऽग्नये, साध्येभ्यो, विश्वेभ्यो देवेभ्यो,
विश्वकर्मणे, यमाय, मातृभ्यो, रुद्रपरिचारकेभ्यो, रुद्रेभ्यो, मोहिन्यै,
निरृतये, राक्षसेभ्यो, मित्रेभ्यो, गन्धर्वेभ्यो, भूतगणेभ्यो, वरुणाय,
वसुभ्यो, विद्याधरेभ्यः, किन्नरेभ्यो, वायवे, स्तम्भिन्यै, चित्ररथाय,
तुम्बुरवे, नारदाय, यक्षेभ्यो, सोमाय, कुबेराय, देवेभ्यो, विष्णवे,
ईशानाय, ब्रह्मणे, अश्विन्यां, धन्वन्तरये, विनायकेभ्यो नम इति
देवतामण्डलमिष्ट्वा तद्बहिः औं क्षौं क्षेत्रपालाय नमः, सिंहवराय
देवीवाहनाय नम इति च तदुभयं वरिवस्येत्। तद्बहिः महाकृष्णाय
देवीवाहनाय नम इति तत्पूजा ।।३१।।
देवतानामष्टत्रिंशत्संख्याकत्वात् तया संख्यया शतपत्रविभागासम्भवाद्
अवश्यं सन्धयो हेयाः। तथा सति देव्याः पुरतः देवतासमसंख्याकसन्धयो
ग्राह्याः। शेषा हेयाः। तत्राप्युदगपवर्गलाभाय नमःपद्मनुषज्यते। तत उत्तरे
समाप्तिः। सर्वत्र नमःपद्मनुषज्यते। ततः क्षेत्रपालादिपूजां विधत्ते—तद्वहिरिति।
तद्बहिः शतपत्रबहिः। वाहनरूपत्वाद् देवीपुरत एव। यद्वा तद्बहिः पूर्व-
पूजिताष्टत्रिंशद्देवताऽधिष्ठानदलसन्धिबहिः। तेन देवीपुरोभागस्त्वर्थात् सिध्यति।
तदुभयं क्षेत्रपालसिंहोभयम्। तद्बहिः क्षेत्रपालसिंहबहिः। तत्पूजा मृगराजपूजा।
इति पञ्चमावरणम् ।।३१।।
पञ्चमावरण की पूजा शतार सम्बन्धित पूजा है। इसमें ३८ देवताओं
की पूजा का उल्लेख वृत्तिकार ने किया है। शेष को हेय कर दलसन्धि में

वाराहीक्रमः १९१
ही पूजा का विधान किया गया है। देवताओं की ३८ संख्या का परिगणन
परम्परा के अनुसार है। सूत्र के अनुसार नहीं। जैसे बहुवचन वाले शब्दों की
देवसंख्यायें तीन-तीन हैं। आदित्य १२ हैं। साध्य, विश्वदेव, अष्टमातृकाएँ ११
रुद्र और उनके ११ परिचारकों (अष्टवसुवों) की निर्धारित संख्यायें पुराणों में
प्रसिद्ध हैं। शतार में स्थान सौ हैं। इन्हें छोड़ना और किसी को ग्रहण करना
परम्परा पर आश्रित लगता है। विद्वानों को इस पर विचार करना चाहिये।
सूत्रानुसार यह ठीक नहीं। सूत्रकार ने देवता मण्डल कहा है। अड़तीस नहीं
कहा है। पुराणों में निर्धारित संख्याओं के अनुसार यह संख्या सौ ही होनी
चाहिये।
जो हो, ऐं ग्लौं लगाकर चतुर्थ्यन्त के साथ नमः लगाकर पूरा मन्त्र बनाते
हैं। इन्हीं मन्त्रों से इनकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार देवता मण्डल की
पूजा के बाद शतपत्र के बाहर 'ऐं ग्लौं औं क्षौं क्षेत्रपालाय नमः' से इन दोनों
की पूजा करनी चाहिये।
इसके बाहर अर्थात् देवदलसन्धि के बाहर देवी के समक्ष ही 'ऐं ग्लौं
महाकृष्णाय मृगराजाय देवीवाहनाय नमः' मन्त्र से मृगराज की पूजा पूरी की जाती
है। इस प्रकार पञ्चम आवरण की पूजा पूरी होती है॥३१॥
षष्ठावरणपूजामाह
सहस्रारे अष्टधा विभक्ते ऐरावताय, पुण्डरीकाय, वामनाय,
कुमुदायाञ्जनाय, पुष्पदन्ताय, सार्वभौमाय, सुप्रतीकाय नम इति
तत्पूजा। बहिः सुधाब्धेर्वा बाह्यप्रकाराष्टदिक्षु अध उपरि च
हेतुकादयो भैरवक्षेत्रपालशब्दयुक्ताः प्रत्येकं क्षौमादयश्च यष्टव्याः।
हेतुकत्रिपुरान्तकाग्नियमजिह्वैकपादकालकरालभीमरूपहाटकेशाचला
दशभैरवाः ।।३२।।
अष्टधा विभक्ते पञ्चविंशत्युत्तरशतदलेष्वेकैका देवता पूज्या। अमीषामेव
देवतानां विकल्पेन स्थानान्तरमाह—बहिः सुधाब्धेर्वेति। सुधाव्यधिकरणत्वेन
कल्पितो यो देशस्तस्माद्बहिरित्यर्थः। क्रमस्तु इन्द्रादीशानान्तप्रदक्षिणम्। अत्र

१९२ परशुरामकल्पसूत्रम्
नमोऽन्तमन्त्रेषु सर्वत्र नमोऽन्ते देवतानाम्। ततः श्रीपादुकामित्यष्टाक्षरीयोगः।
यथा जम्भिन्यै नमः जम्भिनी श्रीं। बाह्यप्रकारेति प्रथमचतुरस्रे इत्यर्थः।
हेतुकादयो दश अचलान्ताः प्रत्येकं प्रतिमन्त्रं क्षौं इत्यादौ येषां ते यष्टव्याः
पूज्याः। मन्त्रस्वरूपं ऐं ग्लौं क्षौं हेतुकभैरव-क्षेत्रपाल श्रीं। एवमग्रेऽपि
योज्यम् ।।३२।।
एक हजार अरों वाले भाग को आठ से विभक्त करने पर एक सौ पचीस
दलों का एक भाग होता है। प्रति एक सौ पचीस दल वाले भाग पर एक
देवता की पूजा करनी चाहिये। ये देवता—१. ऐरावत, २. पुण्डरीक,
३. वामन, ४. कुमुद, ५. अञ्जन, ६. पुष्पदन्त, ७. सार्वभौम और ८. सुप्रतीक
नामक हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार सुधा समुद्र के लिये अधिकृत जो
भाग प्रकल्पित होता है, उसी में इनकी पूजा होनी चाहिये। पूर्व से ईशान तक
का क्रम पूजा में मान्य है।
बाह्य प्राकार के अर्थात् चक्र के प्रथम चतुष्कोण के चारों ओर, चारों
कोणों और ऊपर-नीचे भी भैरवक्षेत्रपाल चतुर्थ्यन्त शब्द योजना के साथ नमः
लगाकर मन्त्र बनाना चाहिये। मन्त्र के पहले 'ऐं ग्लौं क्षौं' अवश्य जोड़ना चाहिये।
हेतुकभैरव का मन्त्र इस प्रकार बनता है—ऐं ग्लौं क्षौं, हेतुकभैरवक्षेत्रपालाय नमः।
हेतुकभैरवश्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः। कुल भैरवों की संख्या यहाँ दश
दी गयी है।
वे—१. हेतुक, २. त्रिपुरान्तक, ३. अग्निजिह्व, ४. यमजिह्व, ५.
एकपाद, ६. काल, ७. कराल, ८. भीमरूप, ९. हाटकेश और १०. अचल
नामक हैं। हेतुक भैरवों के मन्त्र बनते हैं। जैसे अन्तिम दशवें भैरव की (ऊपर)
पूजा के लिये मन्त्र इस प्रकार बनेगा— ऐं ग्लौं क्षौं अचलभैरवक्षेत्रपालाय नमः।
अचलभैरवश्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः। इस प्रकार आवरणपूजा पूरी होती
है।।३२।।
उक्तमर्थमुपसंहरति
एवं षडावरणीमिष्ट्वा पुनर्देवीं त्रिधा सन्तर्प्य सर्वैरुपचारै-
रुपचर्य ।।३३।।

वाराहीक्रमः १९३
षडावरणपूजानन्तरं कर्त्तव्यां क्रियामाह—पुनरिति। सर्वैरुपचारैः पूर्वोक्त-
षोडशोपचारैरुपचर्य ।।३३।।
छः आवरणों की पूजा-विधि का वर्णन सूत्र-संख्या ३२ तक हो चुका,
इसके बाद क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासा के उत्तर में सूत्रकार कह रहे हैं
कि, देवी का त्रिधा सन्तर्पण होना चाहिये और अन्त में सोलह उपचारों से माँ
की पूजा की जानी चाहिये। इससे माँ परम प्रसन्न होती है।।३३।।
अथ बलिदानप्रकारं वक्तुं प्रक्रमते
पुरतो वामभागे हस्तमात्रं जलेनोपलिप्य रुधिरान्नहरिद्राऽन्न-
महिषपलसक्तुशर्करा-हेतुफलत्रय-माक्षिकमुद्गत्रय-माषचूर्णदधिक्षीर-
घृतैः शुद्धोदनं सम्मर्द्य चरणायुधाण्डप्रमाणान् दशपिण्डान् विधाय,
तत्र निधाय कपित्थपलमानमेकं पिण्डं च तत्समीपे सादिमोपादिम-
मध्यमं चषकं च निक्षिप्य दशपिण्डान् हेतुकादिभ्यो मध्यमपिण्डं
चषकं च चण्डोच्चण्डाय तत्तन्मन्त्रैर्दत्त्वा वृन्दमाराध्य ।।३४।।
देव्या इति शेषः। अथ द्रव्यमाह—रुधिरान्नेति। रुधिरेण रक्तेन युक्तम्
अन्नं हरिद्रायुक्तम्, अन्नं पलं मांसं सक्तवो भर्जितयवचणकचूर्णं हेतुः प्रथमं
फलत्रयं त्रिफला माक्षिकं पुष्परसः, मुद्गत्रयं त्रिजातिमुद्गाः। शेषं स्पष्टम्। एतैः
शुद्धोदनं संमर्द्य मिश्रितं कृत्वा। चरणायुधः कुक्कुटः, कुक्कुटश्चरणायुध
इत्यमरः। तत्र पूर्वलिप्तदेशे तत्समीपे दशपिण्डसमीपे। दशपिण्डस्थापनं च
प्रागादिदशदिक्षु पूजायामासां दिशां क्लृप्तत्वात् तत्तन्मन्त्रैः पूजायां क्लृप्तमन्त्रैः।
तत्रापि नमोऽन्तैरेव, न श्रीपादुकेत्यादि मन्त्रशेषः। वृन्दमाराध्येति हेतुकादि-
चण्डोच्चण्डान्तवृन्दमित्यर्थः। अत्र पाठक्रमं बाधित्वाऽर्थक्रमेण आदौ आराधनं
पश्चाद् बलिदानं ज्ञेयम्, तत्रापि बाधकाभावात् पदार्थानुसमयेनाभ्यर्चनं
पञ्चोपचारैः कार्यम् ।।३४।।
सामने आगे ही बायें भाग में एक हाथ वर्गाकार जल से उपलिप्त कर
वहीं दश पिण्डों का निर्माण करना चाहिये। पिण्डों के द्रव्य के रूप में रक्तमिश्रित
अन्न, हरिद्रामिश्रित अन्न, मांस, सक्तु, शर्करा, हेतु, द्रव्य, त्रिफला, माक्षिक

१९४ परशुरामकल्पसूत्रम्
(मधु), मुद्गत्रय, उड़दचूर्ण, दही, दूध, घी इन सबको शुद्ध पके चावल (भात)
में पूरी तरह मिश्रित कर लेना चाहिये। इन्हीं द्रव्यों से बने उस मिश्रित खाद्य
से कुक्कुट के अण्डे के बराबर दश पिण्ड बनाना चाहिये। उपलिप्त भूमि पर
इन पिण्डों को रखना चाहिये। एक अलग कपित्थ फल के बराबर पिण्ड बनाकर
उन्हीं पिण्डों के पास रखते हैं। दश पिण्ड दश दिशाओं के क्रम से ही पूजा
के उपयुक्त भाव से रखे जाते हैं। पूजा के मन्त्रों में केवल नमः अन्त वाले
मन्त्र ही प्रयुक्त किये जाते हैं, श्रीपादुका वाले नहीं। ११ पिण्ड तीन चषक में
से १० पिण्ड और दो चषक तो हेतुक भैरव क्षेत्रपालों को तथा ग्यारहवाँ कपित्थ
समपिण्ड तथा तीसरा चषक 'चण्डोच्चण्ड' देव को अर्पित करना होता है। चषक
वहीं उलट देते हैं। सूत्र के अनुसार अन्त में वृन्द का पञ्चोपचार पूजन होना
चाहिये; किन्तु वृत्तिकार आराधन के बाद बलि का क्रम उचित मानते हैं॥३४॥
गुरुसन्तोषणम्
यथाविभवं गुरुं सन्तोष्य ॥३५॥
यथाविभवं स्वशक्तिं दृष्ट्वा गुरुं सन्तोषयेत्यनेन गुरुसन्निधावनुष्ठानं
सूचितम्। दूरस्थे नित्यं सन्तोषणासम्भवात् तेन सति सम्भवे गुरुसन्निधौ
फलाधिक्यं ज्ञेयम् ॥३५॥
अपने वैभव के अनुसार गुरु को सन्तुष्ट करना शिष्य का कर्त्तव्य है।
शास्त्र का यह निर्देश है कि, वित्त रहने पर वित्तशाठ्य नहीं करना चाहिये।
इस सूत्र के निर्देश के अनुसार यह भी सूचित हो रहा है, कि ये क्रियायें गुरु
के सान्निध्य में होनी चाहिये। दूर रहकर यह सम्भव नहीं॥३५॥
शक्त्यादिपूजामाह
सम्पूर्णयौवनाः सलक्षणा मदनोन्मादिनीस्तिस्रः शक्तीराहूय
बटुकं चैकमभ्यर्च्य स्नपयित्वा गन्धादिभिरलङ्कृत्य वार्त्तालीबुद्ध्या
एकां शक्तिं मध्ये क्रोधिनी-स्तम्भिनी-बुद्ध्या द्वे इतरे पार्श्वयोश्चण्डो-
च्चण्डधिया बटुकमग्रे स्थापयित्वा सर्वैर्द्रव्यैः सन्तोष्य मम
श्रीवार्त्ताली-मन्त्रसिद्धिर्भूयादिति ताः प्रति वदेत् ताश्च प्रसीदन्त्व-
थिदेवता इति ब्रूयुः॥३६॥

वाराहीक्रमः १९५
मदनोन्मादिनीः मदनवर्धिनीः आहूयाभ्यर्च्येति शक्तिषु बटुके चान्वेति।
स्नपनं चात्राभ्यङ्गरूपम्। तत्त्वपूजायां स्नानावसरे कर्तव्यम्। ततो गन्धादिभि-
रलङ्कुर्यात्। आदिपदेन वस्त्रभूषापटादि ग्राह्यम्, अग्रे तासामग्रे सर्वैर्द्रव्यैरिति
वाराहीपूजायां विहित-प्रथम-द्वितीय-तृतीयैरित्यर्थः। ता इत्यतः प्रार्थनं
सुवासिनीनामेव न बटुकस्य ।।३६।।
पूर्णरूप से यौवनसम्पन्न स्त्रियाँ सलक्षणा मानी जाती हैं, यौवन से स्त्रीमात्र
में एक दिव्य आकर्षण होता है। इस आकर्षण के फलस्वरूप काम का उन्माद
होना पुरुष की दुर्बलता का द्योतक है। पूजा के सन्दर्भ में काम बढ़ाने वाली
स्त्रियों के आवाहन में सूत्रकार की यह स्पष्ट इच्छा झलक रही है कि, साधक
ऐसी स्त्री में दिव्यता का दर्शन करे। अन्यथा तत्काल काम के मृत्यु-गर्त में
गिराने वाली गार्ह्य-गर्हिता-वृत्तिरूप गोमुखी गोधायें काट खाने को मुँह बाये
खड़ी हैं। ऐसी आकर्षक सौन्दर्यमयी शक्तिरूपा देवियों और बटुक को वहाँ
बुलाकर उनकी पूजा करनी चाहिये। स्नपन को वृत्तिकार अभ्यङ्ग रूप मानते हैं।
वस्तुतः अभ्यङ्ग के बाद, जिसे उबटन कहते हैं, स्नान आवश्यक होता है। स्नान
के बाद गन्ध, वस्त्राभूषण से अलङ्कृत करना चाहिये। उन्हें पूर्ण सन्तुष्ट कर
उनसे निवेदन करना चाहिये कि, आप लोग शक्तिरूपा हैं। हमें यह आशीर्वाद
दें कि, 'हमारी वार्त्तालीपूजा सिद्ध हो जाय'। वे यह कहें कि, यहाँ इस मण्डल
में अभ्यर्चित सभी अधिकारसम्पन्न देवता परम प्रसन्न हों। अर्थात् यजमान के
मनोरथ सिद्ध हों।।३६।।
एवं पूजामुपसंहृत्य अग्रे कर्त्तव्यं विधत्ते
एवं सपरिवारामुदारां भूदारवदनामुपतोष्य पुरश्चरणं कृत्वा
तद्दशांशं तापिच्छकुसुमैर्हुत्वा मन्त्रं साधयेत् ।।३७।।
एवमुक्तप्रकारेण सपरिवाराम् आवरणदेवतासहिताम् उदारां फलदान-
शौण्डां भूदारस्य क्रोडस्य वदनमिव वदनं यस्यास्ताम्। लक्षं पुरश्चरणं कृत्वा इति
तद्दशांशं, जपदशांशं, तापिच्छकुसुमैस्तमालकुसुमैः। 'कालस्कन्धस्तमालः स्याद्
तापिच्छोऽप्यथ' इत्यमरः। मन्त्रं साधयेद् इत्यनेन केवललक्षजपेनैव पर्याप्तः।

१९६ परशुरामकल्पसूत्रम्
इयं संख्या पुरश्चरणे कृतयुगे कलौ चतुर्गुणं प्रोक्तम् इति वचनात्
कलियुगे चतुर्गुणमित्यलं पल्लवितेन इति।।३७।।
इस प्रकार परिवारसहित माता वार्त्ताली की पूजा कर उनको प्रसन्न करने
में उपासक को अपना अस्तित्व ही अर्पित कर देना चाहिये। वह महती कृपावती
है। उसके औदार्य का उपमान नहीं। इसके मुख का सादृश्य क्रान्तदर्शी विद्वानों,
गुरुजनों और उपासकों के अनुसार वराह से मिलता-जुलता है। इस कथन के
भी कई रहस्य हैं। ऐसी दयामयी माँ श्रद्धा से ही सन्तुष्ट हो जाती है।
उसको सन्तुष्ट करने के उपरान्त पुरश्चरण में प्रवृत्त होना चाहिये। पुरश्चरण
की संख्या का निर्देश सूत्रकार ने दिया है। तदनुसार एक लाख मन्त्रजप
आवश्यक है। वृत्तिकार कहते हैं कि, यह संख्या सत्ययुग की है। कलियुग में
चतुर्गुण अर्थात् चार लाख की होनी चाहिये। इसी के साथ वृत्तिकार ने
परमानन्दतन्त्र आदि के विशद और सविस्तर उद्धरण प्रस्तुत किये हैं। सूत्रकार
की दृष्टि से साधक या उपासक को गुरुदेव पर निर्भर रहना चाहिये। उद्धरणों
से उपासक में वृत्तिभेद पैदा होने का भय है। यहाँ वह अनावश्यक विस्तार
ही लग रहा है। यों विद्वान् साधक के स्वाध्याय और तन्त्रान्तर अध्ययन को
कहीं बाधित नहीं किया गया है।
पुरश्चरण के सिद्ध हो जाने के उपरान्त जप के दशवें भाग की संख्या
में हवन करना चाहिए। विशेष कृत्यों में हवनीय द्रव्य भी अलग-अलग होते
हैं। यहाँ पर सूत्रकार ने तापिच्छकुसुम से हवन का निर्देश दिया है। तापिच्छ
अमरकोश के अनुसार तमाल को कहते हैं। तमाल के फूल का हवन इस
उपासना की पूर्णता के लिये आवश्यक माना जाता है।
मन्त्र की सिद्धि में हवन सहायक होता है, कैसे? इस रहस्य को गुरुदेव
से जानना चाहिये।।३७।।
एवं पुरश्चरणमुक्त्वा पूजाशेषकृत्यमाह
ततश्च पूजितां देवीमात्मनि योजयित्वा स्वैरं विहरन्नाज्ञासिद्धः
सुखी विहरेत्। इति शिवम् ।।३८।।

वाराहीक्रमः १९७
ततः जपानन्तरं चक्रे पूजितां देवीम् आत्मनि हृदयकमले योजयित्वा
स्थापयित्वा स्वैरं स्वेच्छया विहरन् आज्ञायाः सिद्धिः फलवत्ता यस्यैतादृशः
अप्रतिहताज्ञः सुखी अपरिच्छिन्नसुखः। शिवमिति व्याख्यातं प्राक्।।३८।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) वाराहीक्रमो नाम
सप्तमः खण्डः सम्पूर्णः ।।७।।
इस प्रकार वार्त्ताली की आराधना का सम्पूर्ण विवरण यहाँ तक
दिया गया है।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का वाराहीक्रम नामक सप्तम खण्ड परिपूर्ण ।।७।।
।। शुभं भूयात् ।।

पराक्रमः
[ अष्टमः खण्डः ]
इति विधिवत्कृतवार्त्तालीवरिवस्यः सिंहासनविद्याहृदयमनुत्तरं
पराबीजरूपं धाम तत्क्रमपूर्वकं विमृशेत् ॥१॥
कृतवार्त्तालीवरिवस्य इत्यनेन वार्त्तालीक्रमसमाप्त्युत्तरकालोऽङ्गत्वेन
सूचितः। सिंहासनं सिंहासनस्वामिपरम्। तद्रूपा या विद्या सा त्रिपुरसुन्दरी
ललिता तस्या हृदयं हृदयरूपम्। न विद्यते उत्तरं श्रेष्ठं यस्मात् तद् अनुत्तरं
पराबीजं, सौः तद्रूपं देवतामन्त्रयोरभेदात् तद्रूपत्वं युक्तम्। धाम
तेजः। तत्क्रमः पूर्वं यस्येति क्रियाविशेषणम्। विमृशेद् उपासनां कुर्यात्॥१॥
सूत्रकार ने स्पष्ट रूप से यह निर्देश दिया है कि, वार्त्ताली विद्या की
पूरी तरह सम्पन्नता के बाद ही सिंहासन-विद्या-हृदयरूप अनुत्तर पराबीज रूप
को क्रमिक रूप से विमर्श का विषय बनाना चाहिये।
सिंहासन शब्द से सिंहासनेश्वरी राजराजेश्वरी ललिता त्रिपुरसुन्दरी का अर्थ
गृहीत करना चाहिये। ऐसी विश्ववात्सल्यमयी माँ की हृदयरूपा परा विद्या मानी
जाती है। यह 'परा' बीज-मन्त्र कहलाता है। इसे चिन्मय धाम भी कहते हैं।
इसमें देवता और मन्त्र दोनों का तादात्म्य अनुसन्धान का विषय है। इसकी
उपासना का एक निर्धारित क्रम होता है। इसी क्रम से इस विद्या को विमर्श
का विषय बनाया जाना चाहिये॥१॥
अस्या उपासने हेतुमाह
प्रभुहृदयज्ञातुः पदे पदे सुखानि भवन्ति ॥२॥

पराक्रमः १९९
अस्याः श्रीललिताहृदयरूपत्वाद् एतदुपासनेन तत्प्रीतौ सम्पादितायां
प्रधानदेवीप्रीतिसम्पादनं सुगममिति ध्वनितम् ॥२॥
यह ध्रुव सत्य है कि, प्रभु के हृदय को सुचारुरूप से पहचानने वाला
विज्ञ उपासक सर्वदा सुखी रहता है। उसके जीवन में सुख का साम्राज्य छाया
रहता है। इस सूत्र से यह ध्वनित होता है कि, मन्त्र की इस उपासना से माँ
ललिता को प्रसन्न करना अत्यन्त सरल हो जाता है॥२॥
अस्याः क्रमव्याख्यानं प्रतिजानीते
अथोऽनुत्तरपद्धतिं व्याख्यास्यामः ॥३॥
अथो इति समुच्चयार्थो निपातः। अग्रिमवर्णे पूर्वरूपमार्षम्॥३॥
यहाँ से अनुत्तर-पद्धति की व्याख्या सूत्रकार सूत्र रूप से प्रस्तुत कर रहे
हैं। सूत्र में अथो शब्द निपात अव्यय है। इसे समुच्चयबोधक अव्यय कहते
हैं। इससे सारी पद्धति का प्रकल्पन हो जाता है। अथो निपात से युक्त अनुत्तर
का पूर्वरूप नहीं हो सकता। इसलिये अथो अव्यय पृथक् निपात है। इसमें
पूर्वरूप आर्ष प्रयोग है॥३॥
उषःकृत्यम्
कल्ये समुत्थाय ब्रह्मकोटरवर्त्तिनि सहस्रदलकमले सन्नि-
विष्टायाः सौवर्णरूपायाः परायाश्चरणयुगलविगलदमृतरसविसर-
परिप्लुतं वपुः ध्यात्वा॥४॥
कल्ये उषसि। 'प्रत्यूषोऽहर्मुखं कल्यम्' इत्यमरे। ब्रह्मकोटरं ब्रह्मविलम्।
सौवर्णरूपाया इति सुवर्णस्येदं सौवर्णं पीतमित्यर्थः। सौवर्णं रूपं यस्यास्तस्या
विगलत्प्रस्रवद् अमृतरसः, अमृतसारं तस्य यो विसरो व्याप्तिस्तेन परिप्लुतं
स्नातं ध्यात्वा। इति ब्राह्ममुहूर्तकृत्यम्॥४॥
कल्य उषःकाल का पर्यायवाची शब्द है। ब्रह्मकोटर ब्रह्मबिल को कहते
हैं। उसमें सहस्रदल कमल रूप सहस्रार चक्र विद्यमान है। सहस्रार मानवशरीर
में प्राकृतिक संरचना का वरदान है। उसमें सुवर्णवर्णा परा देवता सर्वदा

२०० परशुरामकल्पसूत्रम्
विराजमान रहती है। उसके चरणयुगल से शाश्वत अमृतरससार की वर्षा होती
रहती है। प्रातः उठते ही अपने को उस अमृतरस से स्नात अनुभव करना
उपासक का प्रथम और परम कर्त्तव्य है। इससे आत्मिक शान्ति मिलती है और
उपासना में प्रवृत्ति बढ़ती है।।४।।
स्नानादिकृत्यम्
स्नातः शुचिवाससो वसानः, सौःवर्णेन त्रिराचम्य, द्विः
परिमृज्य, सकृदुपस्पृश्य चक्षुषी, नासिके, श्रोत्रे, अंसे, नाभिं, हृदयं,
शिरश्चावमृश्य, एवं त्रिराचम्य ।।५।।
स्नात इति नाम्ना श्रीक्रमोक्तस्नानधर्मातिदेशः। अत्र मूलस्थाने
प्रकृतमूलम्। एतावान् विशेषः। अथाचमनमाह त्रिराचम्य त्रिवारं सौःवर्णेन
एकैकवारमभिमन्त्रितजलपानं कृत्वेत्यर्थः। सौःवर्णस्य तृतीयाश्रुत्या
आचमनाङ्गत्वे सिद्धे प्रतिप्रधानमङ्गावृत्तिरिति न्यायेन मन्त्रावृत्तिर्लभ्यते। द्विः
परिमार्जनम् ओष्ठयोः। सकृदुपस्पृश्य इत्यत्रापि जलम् इति। अवमृश्य
स्पृष्ट्वा।।५।।
स्नानोपरान्त पवित्र वस्त्र धारण कर पराबीज रूप सौः वर्ण से तीन बार
आचमन करे। दो बार इसी वर्ण से परिमार्जन कर, एक बार इसी बीज से
उपस्पर्शन कर, दोनों आँखें, नासापुट, दोनों कर्ण, दोनों स्कन्ध, नाभि, हृदय
और शिर का भी इसी वर्ण से स्पर्श कर पुनः तीन बार आचमन करना
चाहिये।।५।।
अथासनविधिमाह
ऊर्णामृदुशुचितमासनं सौवर्णसूर्यजपाभिमन्त्रितं मूलमन्त्रो-
क्षितमधिष्ठाय।।६।।
ऊर्णा एडकलोमविकारः। मृदुत्वविधानाद् दृष्टं फलं स्वस्यान्तःकरणं
कठिनसंयोगाभावेन। सौवर्णस्तद्युक्तो यः सूर्यो विसर्गः सौः विसर्गस्य
सूर्यपदवाच्यत्वे प्रमाणम् देवीभागवते—‘बिन्दुद्वयं हिमांशुः स्याद् विसर्ग-
स्तरणिस्तथा’ इति वाक्यम्। अनेन अभिमन्त्रितं तेनैवोक्षितमासनम् अधिष्ठाय
स्थित्वा ।।६।।

पराक्रमः २०१
आसन के लिये सुकुमार ऊनी वस्त्र उचित होता है। 'सौः' वर्ण के साथ
सूर्य अर्थात् विसर्ग लगाकर पराबीज रूप मूलमन्त्र बनता है। इसी बीज से
अभिमन्त्रित जल से आसन को प्रोक्षित कर लेना चाहिये। ऐसे आसन पर बैठने
से उपासक की वैद्युतिक शक्ति उपासक में ही अधिष्ठित रहती है।।६।।
दैशिकयजनम्
उदग्वदनो मौनी भूषितविग्रहो मूलपूर्वेण दैशिकमनुना मस्तके
दैशिकमिष्ट्वा ।।७।।
उदग्वदन इति पराप्रकरणविधिः। भूषितविग्रहो वस्त्रभूषणादिभिः। मूलं
पूर्वं यस्य ईदृशेन दैशिकमनुना ।।७।।
परा प्रकरण के उपासन क्रम में उत्तर मुख बैठने का विधान है। माँ
राजराजेश्वरी के समक्ष उसका उपासक सामान्य परिधान में कैसे उपस्थित हो
सकता है। अपने को पूरी तरह यथाशक्ति सजाकर ही आसन पर बैठना उचित
है। प्रकरण में दैशिक सम्बद्ध गुरुपादुका १ मन्त्र का वर्णन है। उस मन्त्र में मूल
मन्त्र पहले लगाकर शिर के अग्रभाग में दैशिक की पूजा करनी चाहिये। पूरा
मन्त्र इस 'सौः ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ऐं ग्लौं हस्रैं हसक्षमलवरयूँ सहक्षमलवरयीं
हसौः सहौः अमुकानन्दनाथश्रीगुरुपादुकां पूजयामि' इस मन्त्र से शिर पर
अंजलिबद्ध भाव से गुरुदेव का स्मरण करना चाहिये।।७।।
विघ्नोत्सारणम्
वामपाष्णिघातैः छोटिकात्रयेण पातालादिगतान् भेदावभा-
सिनः विघ्नानुत्सार्य ।।८।।
वामपाष्णिघातैर्वामपादपृष्ठभागघातैः (बहुवचनेन त्रित्वमेव) छोटिका-
त्रयेण। पातालादिपदेन अन्तरिक्षस्य दिशः परिग्रहः। पातालादित्रये अभिघात-
छोटिकयोः प्रत्येकमन्वयः। उत्सार्य दूरीकृत्य ।।८।।
१. सर्वसाधारणक्रम-सू. ३२।

२०२ परशुरामकल्पसूत्रम्
अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः।
ये भूता विघ्नकर्त्तारस्ते गच्छन्तु शिवाज्ञया ।।
इस मन्त्र को पढ़ते हुए बाँयीं एड़ी से भूमि में तीन आघात करना चाहिये।
इसी तरह तीन बार चुटकी बजाकर तीनों लोकों में अवस्थित विघ्नों का उत्सारण
करना चाहिये।।८।।
अङ्गन्यासः
शिरोमुखहृन्मूलसर्वाङ्गेषु मूलं विन्यस्य ।।९।।
अत्र शिरोमुखादिषु प्रत्यवयवं मूलावृत्तिः। सर्वाङ्गे सकृत्। मूले
मूलाधारे। पराप्रकरणे एतावानेव न्यासः। अधिकानुक्तेः ।।९।।
न्यासविधि में सूत्र के सामान्य निर्देश का विशेष अर्थ परम्परा में गृहीत
है। पहले 'सौः नमः' कहकर शिर, मुख, हृदय, मूल और सर्वाङ्ग का स्पर्श
पुनः सौःस् हृदयाय नमः, सौः औ शिरसे स्वाहा, सौः शिखायै वषट्, सौः स्
कवचाय हुम्, सौः औ नेत्रत्रयाय वौषट्, सौः१ अस्त्राय फट्।
विसर्गन्यास में स्वर नहीं लगाना चाहिये। इसमें न्यास की आवृत्ति हो
जाती है।।९।।
चिदग्नौ सर्वतत्त्वविलापनम्
काकचञ्चुपुटाकृतिना मुखेन सञ्चोष्यानिलं सप्तविंशतिशो मूलं
जप्त्वा वेद्यं नाभौ सम्मुद्र्य पुनः सप्तविंशतिशो जप्त्वा अङ्गुष्ठेन
शिखां बध्वा पुनरनिलमापूर्य तेन मूले चिदग्निमुत्थाप्य तत्र वेद्यस्य
विलयं विभाव्य ।।१०।।
काकचञ्चुपुटं काकमुखाग्रं तत्समाकृतिना स्वमुखेन सञ्चोष्यानिलं सम्यग्
बाह्यवायुमन्तर्नीत्वा वेद्यं षट्त्रिंशत्तत्त्वानि२ सम्मुद्र्य एकीकृत्य। अङ्गुष्ठेन
तन्मन्त्रेण नमः इत्यनेनेत्यर्थः। विलयं घनघृतम् अग्निसंयोगेन द्रवीभूतम्।
यद्यपि लयशब्दो नाशः, तथापि 'वि' उपसर्गेण द्रवत्वमर्थः। आज्यं विलाप्य
इति प्रयोगात्।।१०।।
१. अस्त्राय फट्। २. पराक्रम-सूत्र १८।

पराक्रमः २०३
काकचञ्चुपुट के समान मुख और जिह्वाग्र गोलक से बाहरी वायु का
आन्तर आकर्षण हठयोग की प्राणायाम विधि के अन्तर्गत आने वाली क्रिया है।
उस वायु-समाकर्षण के बीच में ही २७ बार मूल-मन्त्र का जप आवश्यक है।
इसके बाद समस्त वेद्य को अर्थात् ३४ तत्त्वों को नाभि में एकत्र मापन
करना चाहिये।
तत्पश्चात् पुनः परामन्त्र का २७ बार जप करना चाहिये। शिखा बँधी
रहनी चाहिये। बँधी न हो, तो बाँधकर पुनः 'पूरक' करके चिदग्नि का उत्थापन
करना चाहिये। इस चिदग्नि में सारे वेद्य ३६ तत्त्वों का विलय कर देना चाहिये।
यहाँ वेद्य के विलय का सन्दर्भ विचारणीय है। वृत्तिकार विलय का अर्थ
पिघलाना कर रहे हैं। यह मेरी दृष्टि से उचित नहीं। यह एक प्रकार का
चिदग्निसात्करण व्यापार है। इस सम्बन्ध में एक श्लोक मैं लिख रहा हूँ। इस
पर विचार उचित है।
अन्तर्निरन्तरनिरिन्धनमेधमाने
कस्याञ्चिदद्भुतमरीचिविकासवेद्याम्।
मायान्धकारपरिपन्थिनि संविदग्नौ
विश्वं जुहोमि वसुधादिशिवावसानम्॥
इस श्लोक में भी संविदग्नि में विश्व अर्थात् वेद्य का चिदग्निसात्करण
है, पर मात्र ३४ वेद्यतत्त्वों का, शिवशक्ति का नहीं। अतः इस सूत्र के अनुसार
भी ३४ वेद्योँ का ही विलापन उद्देश्य है।।१०।।
अथार्घ्यसादनम्
गोमयेनोपलिप्तचतुरस्रभूतले प्रवहत्पार्श्वकरकृतया मत्स्यमुद्रया
दिव्यगन्धाम्बुयुतया भूव्योमवायुवह्निमण्डलानि कृत्वा।।१९१।।
प्रवहत्पार्श्वेति, येन नासापुटेन वायुर्वहति, तत्पार्श्वकरमधः कृत्वा,
रचितमत्स्यमुद्रया दिव्यः श्रेष्ठः। भूमण्डलं चतुरस्रं श्रीयन्त्रलेखने चतुरस्रे
भूबिम्बं क्षोणीपुरमिति भूरिप्रयोगात्। व्योममण्डलं वृत्तं, शून्यात्मकवृत्ते ज्योतिः-

२०४ परशुरामकल्पसूत्रम्
शास्त्रादौ संख्यासङ्केते आकाशशब्दस्य भूरिप्रयोगात् शून्यस्य वृत्तरूपत्वात्।
वायुमण्डलं षट्कोणं, वह्निमण्डलं त्रिकोणम्। इत्थं च चतुरस्र-वृत्तषट्कोण-
त्रिकोणानि इत्यर्थः।।९१।।
पूजा में साँस लेते समय यह ध्यान दीजिये कि, वह किस पुट में बह
रही है। मत्स्य मुद्रा में वही हाथ नीचे रखकर मत्स्यमुद्राबन्ध साधन करना उचित
है। गोबर से लिपे-पुते चतुर्भुज भूतल पर भूमण्डल, व्योममण्डल, वायुमण्डल,
वह्निमण्डल, इस तरह १. भूमण्डल चौकोर, २. व्योममण्डल वृत्ताकार,
३. वायुमण्डल षट्कोण और ४. वह्निमण्डल त्रिकोण बनाना चाहिये। इतनी
प्रक्रिया इस सूत्र के अनुसार पूरी कर लेनी चाहिये। यह क्रिया आवश्यक
होती है।।९१।।
शेषमर्घ्यमानमतिदिशति
श्यामावत् सामान्यविशेषार्घ्ये सादयेत् ।।९२।।
श्यामा क्रम की तरह इस पूजाक्रम में भी सामान्य और विशेष दो प्रकार
के अर्घ्य प्रदान की व्यवस्था करनी चाहिये।।९२।।
परामन्त्रेषु योजनीयबीजविशेषः
सर्वेऽपि पराक्रममनवः ‘सौः'वर्णपूर्वाः कार्याः ।।९३।।
पराक्रम में जितने मन्त्रों के निर्देश हैं, उन सबके पहले पराबीज ‘सौः’
का प्रयोग आवश्यक होता है।।९३।।
विशेषार्घ्ये श्यामातोयोऽधिकांशस्तमाह
भृगुचतुर्दशषोडशद्विरावृत्त्या वर्णषडङ्गं सर्वमूलषडावृत्त्या
मन्त्रषडङ्गं च कृत्वा ।।९४।।
भृगुः सकारः। चतुर्दशः औकारः। षोडशो विसर्गः। एतेषां प्रत्येकं
द्विरावृत्त्या हृदयादि-षडङ्गं कुर्यात्। अथ वर्णषडङ्गन्यासः। बिन्दुयोगश्च
शिष्टसम्प्रदायात्। मन्त्रस्वरूपम्। सं हृदयाय नमः। औं शिरसे स्वाहा। औः
शिखायै वषट्। विसर्गस्य केवलस्यानुच्चार्यत्वात्। एवमग्रेऽपि। इति मूल-
वर्णषडङ्गन्यासः। मूलेष पुनः षडङ्गन्यासमाह—सर्वमूलेति।।९४।।

पराक्रमः २०५
'भृगु' शब्द 'स'वर्ण का द्योतक है। इसी तरह वर्ण सन्दर्भ में प्रयुक्त
'चतुर्दश' संख्या चौदहवें स्वर 'औ'कार की द्योतक है। 'षोडश' संख्या से
सोलहवें वर्ण विसर्ग का बोध होता है। तीनों मिलकर पराबीज 'सौः' का सङ्केत
करते हैं। स का हृदय में, औ का शिर पर, विसर्ग का शिखा में, पुनः स
का कवच में, औ का नेत्रत्रय में और विसर्ग का अस्त्र मन्त्र में प्रयोग करने
पर दो आवृत्ति हो जाती है। यह वर्ण षडङ्गन्यास माना जाता है। इसके उपरान्त
पूरे मूल से अर्थात् पराबीज से छः आवृत्ति होने पर मन्त्रषडङ्ग न्यास पूरा होता
है। इस तरह मन्त्र के वर्ण-वर्ण में जिस दिव्यता का शाश्वत उल्लास होता है,
उसे उपासक अपने शरीर में धारण कर दिव्यातिदिव्य हो जाता है॥१४॥
न्यस्तानां षडङ्गदेवीनां पूजामाह
उभाभ्यामर्चयित्वा ।।१५।।
मूलवर्णमूलाभ्यामित्यर्थः ।।१५।।
न्यस्त षडङ्ग देवियों का भावन कर पुनः मूल के वर्णों से और पुनः
मूल के साथ-साथ षडङ्ग देवियों का स्मरण करते हुए, पूर्ववत् न्यास का निर्देश
इस सूत्र में दिया गया है॥१५॥
अथ सुधादेवीपूजामाह
मूलमुच्चार्य तां चिन्मयीमानन्दलक्षणाममृतकलशपिशित-
हस्तद्वयां प्रसन्नां देवीं पूजयामि नमः स्वाहा इति सुधादेवीमभ्यर्च्य
तया सम्प्रोक्ष्य वरिवस्यावस्तूनि।।१६।।
मूलमुच्चार्येति। तया सुधादेव्या। वरिवस्यावस्तूनि पूजाद्रव्याणि।।१६।।
सुधा देवी की पूजा का निर्देश इस सूत्र में है। मूल का उच्चारण कर
श्रद्धा के चरम स्तरीय आवेश से आविष्ट होकर मूलवर्ण का उच्चारण कर सुधा
देवी का ध्यान करना चाहिये। यह ध्यानात्मक स्मरण बड़ा ही आकर्षक है। देवी
चिन्मयी है। वह आनन्दमयी है। प्रकाश और स्वातन्त्र्य ही चित् और आनन्द
माने जाते हैं। ऐसी प्रकाशानन्दमयी प्रसन्नमुद्रा में अपने दोनों हाथों में अमृत-
कलश और पिशित लिये हुए है। इतना स्मरण कर यह कहना चाहिये कि,

२०६ परशुरामकल्पसूत्रम्
‘सौः चिन्मयीमानन्दलक्षणाममृतकलशपिशितहस्तां प्रसन्नां सुधादेवीं पूजयामि नमः
स्वाहा।’ उसी अमृत-कलश पवित्र जल का भावन करते हुए पूजाद्रव्य का
प्रोक्षण करना चाहिये।।१६।।
तत्त्वकदम्बस्य हृत्पद्मानयनम्
पूर्वं नाभौ सम्मुद्रितं चिदग्निविलीनं तप्तायोद्रववत् षट्त्रिंश-
तत्त्वकदम्बकं हृत्सरोजे समानीय।।१७।।
पूर्वं पात्रासादनात्पूर्वमित्यर्थः। तप्तायोद्रववत् तप्तसुवर्णद्रववत्। वेदे
निघण्टौ सुवर्णपर्याये अयःपदसत्त्वात् प्रकृतायःपदमपि सुवर्णवाचकम्। इत्थं च
पूर्वं नाभौ षट्त्रिंशत्तत्त्वानि एकीकृत्य चिदग्निना द्रवीभावः सम्पादितोऽस्ति।
ताननूद्य हृदये तद्रसस्य समानयनं विधीयते।।१७।।
पात्रासादन के पहले नाभि में सम्मुद्रित अर्थात् एकीकृत रूप से चिदग्नि
में विलीन ३६ तत्त्वों का समूह जो चैतन्य के चमत्कार से इस रूप में परिणत
हो गया है। उसको हृदयकमल में मयूराण्डरस के समान मकरन्दरस की तरह ध्यान
करना चाहिये। इस प्रक्रिया पर विशेष ध्यान देना चाहिये, चित् रूप प्रकाश में
३६ तत्त्वों को सोने के पिघले द्रव की तरह रस रूप में परिणत करने का प्रकल्पन,
एक विशेष प्रक्रिया है। फिर उसे हृदय में लाना और उसका अनुभव करना एक
अलग स्थिति है। इस स्थिति में उपासक परा पूजा के योग्य होता है।।१७।।
अथ पराचक्रं वक्तुं प्रक्रमते
मूलजप्तैः कुसुमक्षेपैर्वक्ष्यमाणैश्च मन्त्रैरासनक्लृप्तिं कुर्यात्।
मूलादियोगपीठाय नम इत्यन्तानि तानि च पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाश-
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दोपस्थपायुपादपाणिवाग्घ्राणजिह्वाचक्षुस्त्वक्श्रोत्रा-
हङ्कारबुद्धिमनःप्रकृतिपुरुषनियतिकालरागकलाविद्यामायाशुद्धविद्येश्वर-
सदाशिवशक्तिशिवाः। एवं पराचक्रं कृत्वा।।१८।।
प्रथमं केवलमूलेनैकवारं कुसुमक्षेपः। ततो वक्ष्यमाणैरेकतत्त्वमन्त्रेण,
मूलादिना योगपीठाय नम इत्यन्तेनैकवारं कुसुमाक्षतक्षेपो वक्ष्यमाणैर्मन्त्रैः।
यथा तत्र तत्त्वमन्त्रस्वरूपम्—पृथिवियोगपीठाय नम इति। एवं शिवान्तेषु