परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 241, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ेंपराक्रमः १९९
अस्याः श्रीललिताहृदयरूपत्वाद् एतदुपासनेन तत्प्रीतौ सम्पादितायां
प्रधानदेवीप्रीतिसम्पादनं सुगममिति ध्वनितम् ॥२॥
यह ध्रुव सत्य है कि, प्रभु के हृदय को सुचारुरूप से पहचानने वाला
विज्ञ उपासक सर्वदा सुखी रहता है। उसके जीवन में सुख का साम्राज्य छाया
रहता है। इस सूत्र से यह ध्वनित होता है कि, मन्त्र की इस उपासना से माँ
ललिता को प्रसन्न करना अत्यन्त सरल हो जाता है॥२॥
अस्याः क्रमव्याख्यानं प्रतिजानीते
अथोऽनुत्तरपद्धतिं व्याख्यास्यामः ॥३॥
अथो इति समुच्चयार्थो निपातः। अग्रिमवर्णे पूर्वरूपमार्षम्॥३॥
यहाँ से अनुत्तर-पद्धति की व्याख्या सूत्रकार सूत्र रूप से प्रस्तुत कर रहे
हैं। सूत्र में अथो शब्द निपात अव्यय है। इसे समुच्चयबोधक अव्यय कहते
हैं। इससे सारी पद्धति का प्रकल्पन हो जाता है। अथो निपात से युक्त अनुत्तर
का पूर्वरूप नहीं हो सकता। इसलिये अथो अव्यय पृथक् निपात है। इसमें
पूर्वरूप आर्ष प्रयोग है॥३॥
उषःकृत्यम्
कल्ये समुत्थाय ब्रह्मकोटरवर्त्तिनि सहस्रदलकमले सन्नि-
विष्टायाः सौवर्णरूपायाः परायाश्चरणयुगलविगलदमृतरसविसर-
परिप्लुतं वपुः ध्यात्वा॥४॥
कल्ये उषसि। 'प्रत्यूषोऽहर्मुखं कल्यम्' इत्यमरे। ब्रह्मकोटरं ब्रह्मविलम्।
सौवर्णरूपाया इति सुवर्णस्येदं सौवर्णं पीतमित्यर्थः। सौवर्णं रूपं यस्यास्तस्या
विगलत्प्रस्रवद् अमृतरसः, अमृतसारं तस्य यो विसरो व्याप्तिस्तेन परिप्लुतं
स्नातं ध्यात्वा। इति ब्राह्ममुहूर्तकृत्यम्॥४॥
कल्य उषःकाल का पर्यायवाची शब्द है। ब्रह्मकोटर ब्रह्मबिल को कहते
हैं। उसमें सहस्रदल कमल रूप सहस्रार चक्र विद्यमान है। सहस्रार मानवशरीर
में प्राकृतिक संरचना का वरदान है। उसमें सुवर्णवर्णा परा देवता सर्वदा