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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

१९४ परशुरामकल्पसूत्रम्
(मधु), मुद्गत्रय, उड़दचूर्ण, दही, दूध, घी इन सबको शुद्ध पके चावल (भात)
में पूरी तरह मिश्रित कर लेना चाहिये। इन्हीं द्रव्यों से बने उस मिश्रित खाद्य
से कुक्कुट के अण्डे के बराबर दश पिण्ड बनाना चाहिये। उपलिप्त भूमि पर
इन पिण्डों को रखना चाहिये। एक अलग कपित्थ फल के बराबर पिण्ड बनाकर
उन्हीं पिण्डों के पास रखते हैं। दश पिण्ड दश दिशाओं के क्रम से ही पूजा
के उपयुक्त भाव से रखे जाते हैं। पूजा के मन्त्रों में केवल नमः अन्त वाले
मन्त्र ही प्रयुक्त किये जाते हैं, श्रीपादुका वाले नहीं। ११ पिण्ड तीन चषक में
से १० पिण्ड और दो चषक तो हेतुक भैरव क्षेत्रपालों को तथा ग्यारहवाँ कपित्थ
समपिण्ड तथा तीसरा चषक 'चण्डोच्चण्ड' देव को अर्पित करना होता है। चषक
वहीं उलट देते हैं। सूत्र के अनुसार अन्त में वृन्द का पञ्चोपचार पूजन होना
चाहिये; किन्तु वृत्तिकार आराधन के बाद बलि का क्रम उचित मानते हैं॥३४॥
गुरुसन्तोषणम्
यथाविभवं गुरुं सन्तोष्य ॥३५॥
यथाविभवं स्वशक्तिं दृष्ट्वा गुरुं सन्तोषयेत्यनेन गुरुसन्निधावनुष्ठानं
सूचितम्। दूरस्थे नित्यं सन्तोषणासम्भवात् तेन सति सम्भवे गुरुसन्निधौ
फलाधिक्यं ज्ञेयम् ॥३५॥
अपने वैभव के अनुसार गुरु को सन्तुष्ट करना शिष्य का कर्त्तव्य है।
शास्त्र का यह निर्देश है कि, वित्त रहने पर वित्तशाठ्य नहीं करना चाहिये।
इस सूत्र के निर्देश के अनुसार यह भी सूचित हो रहा है, कि ये क्रियायें गुरु
के सान्निध्य में होनी चाहिये। दूर रहकर यह सम्भव नहीं॥३५॥
शक्त्यादिपूजामाह
सम्पूर्णयौवनाः सलक्षणा मदनोन्मादिनीस्तिस्रः शक्तीराहूय
बटुकं चैकमभ्यर्च्य स्नपयित्वा गन्धादिभिरलङ्कृत्य वार्त्तालीबुद्ध्या
एकां शक्तिं मध्ये क्रोधिनी-स्तम्भिनी-बुद्ध्या द्वे इतरे पार्श्वयोश्चण्डो-
च्चण्डधिया बटुकमग्रे स्थापयित्वा सर्वैर्द्रव्यैः सन्तोष्य मम
श्रीवार्त्ताली-मन्त्रसिद्धिर्भूयादिति ताः प्रति वदेत् ताश्च प्रसीदन्त्व-
थिदेवता इति ब्रूयुः॥३६॥