परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवाराहीक्रमः १८९
श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः। इन धातु स्वामिनियों की पूजा सम्पन्न
करने के अनन्तर षट्कोण के उभयपार्श्व की पूजा की जाती है॥२८॥
अनन्तरं षडस्रोभयपार्श्वयोः क्रोधिनीस्तम्भिन्यौ चामरग्राहिण्यौ
तत्रैव स्तम्भनमुसलायुधाय आकर्षणहलायुधाय नमः षडराद्बहिः
पुरतो देव्याः क्षौं क्रौं चण्डोच्चण्डाय नम इति तद्यजनम् ॥२९॥
अनन्तरं धातुनाथयजनानन्तरम्। षडस्रोभयपार्श्वयोरिति, उभयपार्श्व-
द्वयकोणान्तःप्रदेशो बोध्यः। मन्त्रस्वरूपं च ऐं ग्लौं क्रोधिनी चामरग्राहिणी
श्रीपादुकाम्। एवमपरम्। अग्रे चण्डोच्चण्डपूजाया बहिर्विधानात् तत्रैवेति
षडस्रोभयपार्श्वयोरेवेत्यर्थः। इति तृतीयावरणम् ॥२९॥
धातुनाथ पूजन के अनन्तर षडस्र के दाहिने और बायें दोनों ओर कोणों
के अन्तःप्रदेश में क्रोधिनी और स्तम्भिनी दो चामरग्राहिणी शक्तियों की पूजा
भी होनी चाहिये। इनके दो मन्त्र इस प्रकार बनेंगे।
१. ऐं ग्लौं क्रोधिनी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
२. ऐं ग्लौं स्तम्भिनी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
षट्कोण के दोनों पार्श्व भाग में ही आयुधों की पूजा करने का निर्देश
सूत्रकार दे रहे हैं। इनके मन्त्र—१. ऐं ग्लौं स्तम्भनमुसलायुधाय नमः। २. ऐं
ग्लौं आकर्षणहलायुधाय नमः। बनते हैं। षडर के बाहर देवी के समक्ष ही श्री
चण्डोच्चण्ड देव की पूजा इस मन्त्र से करनी चाहिये।
१. ऐं ग्लौं क्षौं क्रौं चण्डोच्चण्डाय नमः। इस प्रकार धातुनाथ, चामर-
ग्राहिणी और षडस्र के बाहर चण्डोच्चण्ड की पूजा इस तीसरे आवरण में सम्पन्न
की जाती है॥२९॥
चतुर्थावरणमाह
अष्टदले वार्त्ताली वाराही वराहमुख्यन्धिन्यादयः पञ्च तद्बहिः
महामहिषाय देवीवाहनाय नमः ॥३०॥
देव्यग्रदलमारभ्य प्रादक्षिण्येन, क्रमस्यानुक्तत्वात्। वाहनपूजामाह—
तद्बहिरिति। अष्टदलाद्बहिरित्यर्थः। देवीपुरतोऽयं पूज्यः, वाहनरूपत्वात्।
वाहनस्थितेः सर्वत्र प्रधानदेवताग्रभागे दृष्टत्वात् ॥३०॥