परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवाराहीक्रमः १९५
मदनोन्मादिनीः मदनवर्धिनीः आहूयाभ्यर्च्येति शक्तिषु बटुके चान्वेति।
स्नपनं चात्राभ्यङ्गरूपम्। तत्त्वपूजायां स्नानावसरे कर्तव्यम्। ततो गन्धादिभि-
रलङ्कुर्यात्। आदिपदेन वस्त्रभूषापटादि ग्राह्यम्, अग्रे तासामग्रे सर्वैर्द्रव्यैरिति
वाराहीपूजायां विहित-प्रथम-द्वितीय-तृतीयैरित्यर्थः। ता इत्यतः प्रार्थनं
सुवासिनीनामेव न बटुकस्य ।।३६।।
पूर्णरूप से यौवनसम्पन्न स्त्रियाँ सलक्षणा मानी जाती हैं, यौवन से स्त्रीमात्र
में एक दिव्य आकर्षण होता है। इस आकर्षण के फलस्वरूप काम का उन्माद
होना पुरुष की दुर्बलता का द्योतक है। पूजा के सन्दर्भ में काम बढ़ाने वाली
स्त्रियों के आवाहन में सूत्रकार की यह स्पष्ट इच्छा झलक रही है कि, साधक
ऐसी स्त्री में दिव्यता का दर्शन करे। अन्यथा तत्काल काम के मृत्यु-गर्त में
गिराने वाली गार्ह्य-गर्हिता-वृत्तिरूप गोमुखी गोधायें काट खाने को मुँह बाये
खड़ी हैं। ऐसी आकर्षक सौन्दर्यमयी शक्तिरूपा देवियों और बटुक को वहाँ
बुलाकर उनकी पूजा करनी चाहिये। स्नपन को वृत्तिकार अभ्यङ्ग रूप मानते हैं।
वस्तुतः अभ्यङ्ग के बाद, जिसे उबटन कहते हैं, स्नान आवश्यक होता है। स्नान
के बाद गन्ध, वस्त्राभूषण से अलङ्कृत करना चाहिये। उन्हें पूर्ण सन्तुष्ट कर
उनसे निवेदन करना चाहिये कि, आप लोग शक्तिरूपा हैं। हमें यह आशीर्वाद
दें कि, 'हमारी वार्त्तालीपूजा सिद्ध हो जाय'। वे यह कहें कि, यहाँ इस मण्डल
में अभ्यर्चित सभी अधिकारसम्पन्न देवता परम प्रसन्न हों। अर्थात् यजमान के
मनोरथ सिद्ध हों।।३६।।
एवं पूजामुपसंहृत्य अग्रे कर्त्तव्यं विधत्ते
एवं सपरिवारामुदारां भूदारवदनामुपतोष्य पुरश्चरणं कृत्वा
तद्दशांशं तापिच्छकुसुमैर्हुत्वा मन्त्रं साधयेत् ।।३७।।
एवमुक्तप्रकारेण सपरिवाराम् आवरणदेवतासहिताम् उदारां फलदान-
शौण्डां भूदारस्य क्रोडस्य वदनमिव वदनं यस्यास्ताम्। लक्षं पुरश्चरणं कृत्वा इति
तद्दशांशं, जपदशांशं, तापिच्छकुसुमैस्तमालकुसुमैः। 'कालस्कन्धस्तमालः स्याद्
तापिच्छोऽप्यथ' इत्यमरः। मन्त्रं साधयेद् इत्यनेन केवललक्षजपेनैव पर्याप्तः।