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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 320 में से

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पृष्ठ 232

१९० परशुरामकल्पसूत्रम्
चतुर्थ आवरण में अष्टदलों में आठ देवियों—१. वार्त्ताली २. वाराही,
३. वराहमुखी, ४. अन्धिनी, ५. रुन्धिनी, ६. जम्भनी, ७. मोहिनी और
८. स्तम्भिनी की पूजा की जाती है। अष्टदल के बाहर सामने ही 'ऐं ग्लौं
महामहिषाय देवीवाहनाय नमः' मन्त्र से वाहन की पूजा होती है। 'ऐं ग्लौं'
लगाकर ही 'वार्त्ताली श्रीपादुकां पूजयामि नमः' के समान सभी सातों देवियों
के मन्त्र बनते हैं॥३०॥
पञ्चमावरणमाह
शतारे देवीपुरतो दलसन्धौ जम्भिन्यै, इन्द्राद्याप्सरोभ्यः,
सिद्धेभ्यः, द्वादशादित्येभ्योऽग्नये, साध्येभ्यो, विश्वेभ्यो देवेभ्यो,
विश्वकर्मणे, यमाय, मातृभ्यो, रुद्रपरिचारकेभ्यो, रुद्रेभ्यो, मोहिन्यै,
निरृतये, राक्षसेभ्यो, मित्रेभ्यो, गन्धर्वेभ्यो, भूतगणेभ्यो, वरुणाय,
वसुभ्यो, विद्याधरेभ्यः, किन्नरेभ्यो, वायवे, स्तम्भिन्यै, चित्ररथाय,
तुम्बुरवे, नारदाय, यक्षेभ्यो, सोमाय, कुबेराय, देवेभ्यो, विष्णवे,
ईशानाय, ब्रह्मणे, अश्विन्यां, धन्वन्तरये, विनायकेभ्यो नम इति
देवतामण्डलमिष्ट्वा तद्बहिः औं क्षौं क्षेत्रपालाय नमः, सिंहवराय
देवीवाहनाय नम इति च तदुभयं वरिवस्येत्। तद्बहिः महाकृष्णाय
देवीवाहनाय नम इति तत्पूजा ।।३१।।
देवतानामष्टत्रिंशत्संख्याकत्वात् तया संख्यया शतपत्रविभागासम्भवाद्
अवश्यं सन्धयो हेयाः। तथा सति देव्याः पुरतः देवतासमसंख्याकसन्धयो
ग्राह्याः। शेषा हेयाः। तत्राप्युदगपवर्गलाभाय नमःपद्मनुषज्यते। तत उत्तरे
समाप्तिः। सर्वत्र नमःपद्मनुषज्यते। ततः क्षेत्रपालादिपूजां विधत्ते—तद्वहिरिति।
तद्बहिः शतपत्रबहिः। वाहनरूपत्वाद् देवीपुरत एव। यद्वा तद्बहिः पूर्व-
पूजिताष्टत्रिंशद्देवताऽधिष्ठानदलसन्धिबहिः। तेन देवीपुरोभागस्त्वर्थात् सिध्यति।
तदुभयं क्षेत्रपालसिंहोभयम्। तद्बहिः क्षेत्रपालसिंहबहिः। तत्पूजा मृगराजपूजा।
इति पञ्चमावरणम् ।।३१।।
पञ्चमावरण की पूजा शतार सम्बन्धित पूजा है। इसमें ३८ देवताओं
की पूजा का उल्लेख वृत्तिकार ने किया है। शेष को हेय कर दलसन्धि में