परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 240, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ेंपराक्रमः
[ अष्टमः खण्डः ]
इति विधिवत्कृतवार्त्तालीवरिवस्यः सिंहासनविद्याहृदयमनुत्तरं
पराबीजरूपं धाम तत्क्रमपूर्वकं विमृशेत् ॥१॥
कृतवार्त्तालीवरिवस्य इत्यनेन वार्त्तालीक्रमसमाप्त्युत्तरकालोऽङ्गत्वेन
सूचितः। सिंहासनं सिंहासनस्वामिपरम्। तद्रूपा या विद्या सा त्रिपुरसुन्दरी
ललिता तस्या हृदयं हृदयरूपम्। न विद्यते उत्तरं श्रेष्ठं यस्मात् तद् अनुत्तरं
पराबीजं, सौः तद्रूपं देवतामन्त्रयोरभेदात् तद्रूपत्वं युक्तम्। धाम
तेजः। तत्क्रमः पूर्वं यस्येति क्रियाविशेषणम्। विमृशेद् उपासनां कुर्यात्॥१॥
सूत्रकार ने स्पष्ट रूप से यह निर्देश दिया है कि, वार्त्ताली विद्या की
पूरी तरह सम्पन्नता के बाद ही सिंहासन-विद्या-हृदयरूप अनुत्तर पराबीज रूप
को क्रमिक रूप से विमर्श का विषय बनाना चाहिये।
सिंहासन शब्द से सिंहासनेश्वरी राजराजेश्वरी ललिता त्रिपुरसुन्दरी का अर्थ
गृहीत करना चाहिये। ऐसी विश्ववात्सल्यमयी माँ की हृदयरूपा परा विद्या मानी
जाती है। यह 'परा' बीज-मन्त्र कहलाता है। इसे चिन्मय धाम भी कहते हैं।
इसमें देवता और मन्त्र दोनों का तादात्म्य अनुसन्धान का विषय है। इसकी
उपासना का एक निर्धारित क्रम होता है। इसी क्रम से इस विद्या को विमर्श
का विषय बनाया जाना चाहिये॥१॥
अस्या उपासने हेतुमाह
प्रभुहृदयज्ञातुः पदे पदे सुखानि भवन्ति ॥२॥