परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाराहीक्रमः १९१
ही पूजा का विधान किया गया है। देवताओं की ३८ संख्या का परिगणन
परम्परा के अनुसार है। सूत्र के अनुसार नहीं। जैसे बहुवचन वाले शब्दों की
देवसंख्यायें तीन-तीन हैं। आदित्य १२ हैं। साध्य, विश्वदेव, अष्टमातृकाएँ ११
रुद्र और उनके ११ परिचारकों (अष्टवसुवों) की निर्धारित संख्यायें पुराणों में
प्रसिद्ध हैं। शतार में स्थान सौ हैं। इन्हें छोड़ना और किसी को ग्रहण करना
परम्परा पर आश्रित लगता है। विद्वानों को इस पर विचार करना चाहिये।
सूत्रानुसार यह ठीक नहीं। सूत्रकार ने देवता मण्डल कहा है। अड़तीस नहीं
कहा है। पुराणों में निर्धारित संख्याओं के अनुसार यह संख्या सौ ही होनी
चाहिये।
जो हो, ऐं ग्लौं लगाकर चतुर्थ्यन्त के साथ नमः लगाकर पूरा मन्त्र बनाते
हैं। इन्हीं मन्त्रों से इनकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार देवता मण्डल की
पूजा के बाद शतपत्र के बाहर 'ऐं ग्लौं औं क्षौं क्षेत्रपालाय नमः' से इन दोनों
की पूजा करनी चाहिये।
इसके बाहर अर्थात् देवदलसन्धि के बाहर देवी के समक्ष ही 'ऐं ग्लौं
महाकृष्णाय मृगराजाय देवीवाहनाय नमः' मन्त्र से मृगराज की पूजा पूरी की जाती
है। इस प्रकार पञ्चम आवरण की पूजा पूरी होती है॥३१॥
षष्ठावरणपूजामाह
सहस्रारे अष्टधा विभक्ते ऐरावताय, पुण्डरीकाय, वामनाय,
कुमुदायाञ्जनाय, पुष्पदन्ताय, सार्वभौमाय, सुप्रतीकाय नम इति
तत्पूजा। बहिः सुधाब्धेर्वा बाह्यप्रकाराष्टदिक्षु अध उपरि च
हेतुकादयो भैरवक्षेत्रपालशब्दयुक्ताः प्रत्येकं क्षौमादयश्च यष्टव्याः।
हेतुकत्रिपुरान्तकाग्नियमजिह्वैकपादकालकरालभीमरूपहाटकेशाचला
दशभैरवाः ।।३२।।
अष्टधा विभक्ते पञ्चविंशत्युत्तरशतदलेष्वेकैका देवता पूज्या। अमीषामेव
देवतानां विकल्पेन स्थानान्तरमाह—बहिः सुधाब्धेर्वेति। सुधाव्यधिकरणत्वेन
कल्पितो यो देशस्तस्माद्बहिरित्यर्थः। क्रमस्तु इन्द्रादीशानान्तप्रदक्षिणम्। अत्र