परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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विराजमान रहती है। उसके चरणयुगल से शाश्वत अमृतरससार की वर्षा होती
रहती है। प्रातः उठते ही अपने को उस अमृतरस से स्नात अनुभव करना
उपासक का प्रथम और परम कर्त्तव्य है। इससे आत्मिक शान्ति मिलती है और
उपासना में प्रवृत्ति बढ़ती है।।४।।
स्नानादिकृत्यम्
स्नातः शुचिवाससो वसानः, सौःवर्णेन त्रिराचम्य, द्विः
परिमृज्य, सकृदुपस्पृश्य चक्षुषी, नासिके, श्रोत्रे, अंसे, नाभिं, हृदयं,
शिरश्चावमृश्य, एवं त्रिराचम्य ।।५।।
स्नात इति नाम्ना श्रीक्रमोक्तस्नानधर्मातिदेशः। अत्र मूलस्थाने
प्रकृतमूलम्। एतावान् विशेषः। अथाचमनमाह त्रिराचम्य त्रिवारं सौःवर्णेन
एकैकवारमभिमन्त्रितजलपानं कृत्वेत्यर्थः। सौःवर्णस्य तृतीयाश्रुत्या
आचमनाङ्गत्वे सिद्धे प्रतिप्रधानमङ्गावृत्तिरिति न्यायेन मन्त्रावृत्तिर्लभ्यते। द्विः
परिमार्जनम् ओष्ठयोः। सकृदुपस्पृश्य इत्यत्रापि जलम् इति। अवमृश्य
स्पृष्ट्वा।।५।।
स्नानोपरान्त पवित्र वस्त्र धारण कर पराबीज रूप सौः वर्ण से तीन बार
आचमन करे। दो बार इसी वर्ण से परिमार्जन कर, एक बार इसी बीज से
उपस्पर्शन कर, दोनों आँखें, नासापुट, दोनों कर्ण, दोनों स्कन्ध, नाभि, हृदय
और शिर का भी इसी वर्ण से स्पर्श कर पुनः तीन बार आचमन करना
चाहिये।।५।।
अथासनविधिमाह
ऊर्णामृदुशुचितमासनं सौवर्णसूर्यजपाभिमन्त्रितं मूलमन्त्रो-
क्षितमधिष्ठाय।।६।।
ऊर्णा एडकलोमविकारः। मृदुत्वविधानाद् दृष्टं फलं स्वस्यान्तःकरणं
कठिनसंयोगाभावेन। सौवर्णस्तद्युक्तो यः सूर्यो विसर्गः सौः विसर्गस्य
सूर्यपदवाच्यत्वे प्रमाणम् देवीभागवते—‘बिन्दुद्वयं हिमांशुः स्याद् विसर्ग-
स्तरणिस्तथा’ इति वाक्यम्। अनेन अभिमन्त्रितं तेनैवोक्षितमासनम् अधिष्ठाय
स्थित्वा ।।६।।