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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 320 में से

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पृष्ठ 234

१९२ परशुरामकल्पसूत्रम्
नमोऽन्तमन्त्रेषु सर्वत्र नमोऽन्ते देवतानाम्। ततः श्रीपादुकामित्यष्टाक्षरीयोगः।
यथा जम्भिन्यै नमः जम्भिनी श्रीं। बाह्यप्रकारेति प्रथमचतुरस्रे इत्यर्थः।
हेतुकादयो दश अचलान्ताः प्रत्येकं प्रतिमन्त्रं क्षौं इत्यादौ येषां ते यष्टव्याः
पूज्याः। मन्त्रस्वरूपं ऐं ग्लौं क्षौं हेतुकभैरव-क्षेत्रपाल श्रीं। एवमग्रेऽपि
योज्यम् ।।३२।।
एक हजार अरों वाले भाग को आठ से विभक्त करने पर एक सौ पचीस
दलों का एक भाग होता है। प्रति एक सौ पचीस दल वाले भाग पर एक
देवता की पूजा करनी चाहिये। ये देवता—१. ऐरावत, २. पुण्डरीक,
३. वामन, ४. कुमुद, ५. अञ्जन, ६. पुष्पदन्त, ७. सार्वभौम और ८. सुप्रतीक
नामक हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार सुधा समुद्र के लिये अधिकृत जो
भाग प्रकल्पित होता है, उसी में इनकी पूजा होनी चाहिये। पूर्व से ईशान तक
का क्रम पूजा में मान्य है।
बाह्य प्राकार के अर्थात् चक्र के प्रथम चतुष्कोण के चारों ओर, चारों
कोणों और ऊपर-नीचे भी भैरवक्षेत्रपाल चतुर्थ्यन्त शब्द योजना के साथ नमः
लगाकर मन्त्र बनाना चाहिये। मन्त्र के पहले 'ऐं ग्लौं क्षौं' अवश्य जोड़ना चाहिये।
हेतुकभैरव का मन्त्र इस प्रकार बनता है—ऐं ग्लौं क्षौं, हेतुकभैरवक्षेत्रपालाय नमः।
हेतुकभैरवश्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः। कुल भैरवों की संख्या यहाँ दश
दी गयी है।
वे—१. हेतुक, २. त्रिपुरान्तक, ३. अग्निजिह्व, ४. यमजिह्व, ५.
एकपाद, ६. काल, ७. कराल, ८. भीमरूप, ९. हाटकेश और १०. अचल
नामक हैं। हेतुक भैरवों के मन्त्र बनते हैं। जैसे अन्तिम दशवें भैरव की (ऊपर)
पूजा के लिये मन्त्र इस प्रकार बनेगा— ऐं ग्लौं क्षौं अचलभैरवक्षेत्रपालाय नमः।
अचलभैरवश्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः। इस प्रकार आवरणपूजा पूरी होती
है।।३२।।
उक्तमर्थमुपसंहरति
एवं षडावरणीमिष्ट्वा पुनर्देवीं त्रिधा सन्तर्प्य सर्वैरुपचारै-
रुपचर्य ।।३३।।