परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९६ परशुरामकल्पसूत्रम्
इयं संख्या पुरश्चरणे कृतयुगे कलौ चतुर्गुणं प्रोक्तम् इति वचनात्
कलियुगे चतुर्गुणमित्यलं पल्लवितेन इति।।३७।।
इस प्रकार परिवारसहित माता वार्त्ताली की पूजा कर उनको प्रसन्न करने
में उपासक को अपना अस्तित्व ही अर्पित कर देना चाहिये। वह महती कृपावती
है। उसके औदार्य का उपमान नहीं। इसके मुख का सादृश्य क्रान्तदर्शी विद्वानों,
गुरुजनों और उपासकों के अनुसार वराह से मिलता-जुलता है। इस कथन के
भी कई रहस्य हैं। ऐसी दयामयी माँ श्रद्धा से ही सन्तुष्ट हो जाती है।
उसको सन्तुष्ट करने के उपरान्त पुरश्चरण में प्रवृत्त होना चाहिये। पुरश्चरण
की संख्या का निर्देश सूत्रकार ने दिया है। तदनुसार एक लाख मन्त्रजप
आवश्यक है। वृत्तिकार कहते हैं कि, यह संख्या सत्ययुग की है। कलियुग में
चतुर्गुण अर्थात् चार लाख की होनी चाहिये। इसी के साथ वृत्तिकार ने
परमानन्दतन्त्र आदि के विशद और सविस्तर उद्धरण प्रस्तुत किये हैं। सूत्रकार
की दृष्टि से साधक या उपासक को गुरुदेव पर निर्भर रहना चाहिये। उद्धरणों
से उपासक में वृत्तिभेद पैदा होने का भय है। यहाँ वह अनावश्यक विस्तार
ही लग रहा है। यों विद्वान् साधक के स्वाध्याय और तन्त्रान्तर अध्ययन को
कहीं बाधित नहीं किया गया है।
पुरश्चरण के सिद्ध हो जाने के उपरान्त जप के दशवें भाग की संख्या
में हवन करना चाहिए। विशेष कृत्यों में हवनीय द्रव्य भी अलग-अलग होते
हैं। यहाँ पर सूत्रकार ने तापिच्छकुसुम से हवन का निर्देश दिया है। तापिच्छ
अमरकोश के अनुसार तमाल को कहते हैं। तमाल के फूल का हवन इस
उपासना की पूर्णता के लिये आवश्यक माना जाता है।
मन्त्र की सिद्धि में हवन सहायक होता है, कैसे? इस रहस्य को गुरुदेव
से जानना चाहिये।।३७।।
एवं पुरश्चरणमुक्त्वा पूजाशेषकृत्यमाह
ततश्च पूजितां देवीमात्मनि योजयित्वा स्वैरं विहरन्नाज्ञासिद्धः
सुखी विहरेत्। इति शिवम् ।।३८।।