परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
१७८ परशुरामकल्पसूत्रम्
तत्त्वन्यासमाह
पूर्वोक्तानष्टखण्डानेकैकश उच्चार्य पूर्वोक्तेषु स्थानेषु 'ह्रां'
शर्वाय क्षितितत्त्वाधिपतये' 'ह्रीं' भवाय अम्बुतत्त्वाधिपतये, ह्रुं रुद्राय
वह्नितत्त्वाधिपतये' 'हैं' उग्राय वायुतत्त्वाधिपतये' 'ह्रौं' ईशानाय
भानुतत्त्वाधिपतये, 'सौ' महादेवाय सोमतत्त्वाधिपतये, 'हं' महादेवाय
यजमानतत्त्वाधिपतये' 'औं' भीमाय आकाशतत्त्वाधिपतये नम इति
तत्त्वन्यासः ॥१३॥
पूर्वोक्तानेकत्रिंशत्सप्तेत्यादिना खण्डितान् अष्टखण्डान् पादादि-
जान्वित्यादिस्थानेषु सर्वत्र। तत्त्वाधिपतये एतदनन्तरं 'नमः' इति पदस्यानुषङ्गेण
योगः। इति तत्त्वन्यासः ॥१३॥
१. पादादिजानुपर्यन्त ५. हृदयादिकण्ठपर्यन्त
२. जान्वादिकटिपर्यन्त ६. कण्ठादिभ्रूमध्यपर्यन्त
३. कट्यादिनाभिपर्यन्त ७. भ्रूमध्यादिललाटपर्यन्त
४. नाभ्यादिहृदयपर्यन्त ८. ललाटादिमौलिपर्यन्त
इन आठ स्थानों में मूल मन्त्र के आठ भागों के साथ सूत्रोक्त ह्रां ह्रीं
ह्रुं हैं ह्रौं सों हं औं बीजों के साथ वाले मन्त्रों को भी बोलकर ऊपर निर्दिष्ट
आठ स्थानों में न्यास करना चाहिये। जैसे प्रथम पूरा मन्त्र 'ऐं ग्लौं ऐं नमो
भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि वाराहि वाराहि वराहमुखि वराहमुखि ह्रां शर्वाय
क्षितितत्त्वाधिपतये पादादिजानुभागे नमः' बोलकर उस अङ्गभाग का स्पर्श करना
चाहिये। इसी तरह मूलविद्या के शेष सात खण्डों को बोलकर सूत्रोक्त मन्त्रों के
साथ क्रमिक अङ्गभागों का न्यासरूप स्पर्श करना चाहिये। जैसे दूसरा मन्त्र भी
इस प्रकार बनाना चाहिये—'ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि ह्रीं भवायाम्बुतत्त्वाधिपतये
नमः' मन्त्र बोलकर जान्वादिकटिपर्यन्त का स्पर्श कर अम्बुतत्त्व का न्यास करना
चाहिये। इसी तरह उक्त स्थानों में वह्नि, वायु, सूर्य, सोम, यजमान और आकाश
तत्त्वों का न्यास शेष मन्त्र बनाकर करना चाहिये ॥१३॥
वाराहीक्रमः १७९
देवीध्यानम्
मूलेन सर्वेण व्यापकं कृत्वा देवीं ध्यात्वा ।।१४।।
ध्यानं सूत्रे वक्ष्यमाणं, तन्त्रान्तरप्रसिद्धध्यानश्लोकरीत्याऽपि ज्ञेयम्।
ध्यानश्लोको यथा—
पाथोरुहपीठगतां पाथोरुहमेचकां कुटिलदंष्ट्रां।
कपिलाक्षित्रितयां घनकुचकुम्भां प्रणत वाञ्छितवदान्याम्।
दक्षोर्ध्वतोऽरिखड्गां मुसलमभीतिं तदन्यतस्तद्वत्
शङ्खं खेटं हलवरान् करैर्दधानां स्मरामि वार्त्तालीम्।।
अत्र अरिः चक्रम्। दक्षोर्ध्वत ऊर्ध्वमारभ्य। तद्वद् वामेऽप्यूर्ध्व-
मारभ्यैव ।।१४।।
इसी सातवें खण्ड के आगामी २४वें सूत्र में माँ वार्त्ताली का ध्यान वर्णित
है। सर्वप्रथम पूरा मन्त्र पढ़कर व्यापक विधि पूरी करनी चाहिये। उसके बाद
ही ध्यान करना चाहिये। यों तो २४वें सूत्र में ध्यान का उल्लेख है, फिर भी
तन्त्रान्तरोक्त मन्त्रों द्वारा ध्यान करने में कोई हर्ज नहीं। उक्त श्लोक-सूत्रानुसार
ही विरचित है। माँ नीलकमल के समान आकर्षक श्यामवर्ण से विभूषित है
और कमलासन पर ही अधिष्ठित है। उसकी दंष्ट्रा टेढी है, आँखें पिंगलवर्णी
हैं, माता के वक्ष पर वात्सल्य के प्रतीक कुचकुम्भ शोभित हैं। प्रणत की प्रार्थना
तुरत पूरी करने के लिये प्रसिद्ध हैं। माँ दाहिने हाथ में खड्ग और चक्र धारण
करती हैं। मुसल और अभयमुद्रा में हैं। इसी तरह बाँयें में भी ऊपर से नीचे
तक शङ्ख, खेटक, हल और वर मुद्रा धारण करती हैं। ऐसी महिमामयी माँ
वार्त्ताली का मैं श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा हूँ।।१४।।
चक्रनिर्माणम्—
पुरतः पटपट्टसुवर्णरजतताम्रचन्दनपीठादिनिर्मितं दृष्टिमनोहरं
चतुरस्रत्रयं सहस्रपत्रशतपत्राष्टपत्र-षडस्रपञ्चास्रत्र्यस्रबिन्दुलक्षणं
कोलमुखीचक्रं विरच्य ।।१५।।
पटतूलमयः। पट्टः कौशेयः। पीठं फलकम्, आदिपदेन नवरत्न-
परिग्रहः। तेषु निर्मितं दृष्टिमनोहरमित्यनेन दलानां कोणानां च मानवैषम्य-
१८० परशुरामकल्पसूत्रम्
विरहः। दलमाने शास्त्रीयनियमाभावश्च सूचितः। तथापि तत् शारदातिलका-
दुद्ग्राह्य एव यन्त्रनिर्माणक्रमः प्रवेशरीत्या, बिन्दुचक्रस्य चरमपाठात्। शेषं
स्पष्टम् ।। १५ ।।
सामने ही फलक होना चाहिये, जिसमें चक्र की रचना की जा सके।
चक्र का फलक कपास के वस्त्र कौशेय, स्वर्ण, रजत, ताम्र या चन्दन का होना
चाहिये। देखने में वह आकर्षक होना चाहिये। सूत्र में जो विधि निर्दिष्ट है, वह
प्रवेश क्रम से है क्योंकि बिन्दु का उल्लेख सूत्र के अन्त में आया हुआ है।
इसकी रचना के क्रम में सर्वप्रथम चतुरस्र का निर्माण करना चाहिये। ये तीन
एक पर एक बनते हैं। उसके भीतर वृत्त में एक हजार दल वाला कमल, उसके
भीतर शतपत्र, उसके भीतर अष्टपत्र, उसमें षट्कोण, उसमें त्रिकोण और उसमें
बिन्दु की रचना कर लेने पर यन्त्र तैयार हो जाता है। इसे ही वाराही चक्र
कहते हैं।। १५ ।।
चक्रनिर्माणानन्तरं चक्रकर्त्तव्यमाह
तत्र कुसुमाञ्जलिं विकीर्य स्वर्णप्राकाराय सुधाब्धये वराहद्वीपाय
वराहपीठाय नमः। आं आधारशक्तये कुं कूर्माय, कं कन्दाय नमः,
अं अनन्तनालाय नम इति च धर्मादिभिः सह षोडशमन्त्रैः पीठे
अभ्यर्च्य ।। १६ ।।
तत्र चक्रे। स्वर्णप्राकारादयः चतुर्थ्यन्ताः। अष्टौ नमोऽन्ता मन्त्राः। तैः
पीठमध्यपूजनं, धर्मादिचतुर्भिः, अधर्मादिचतुर्भिश्च गणपतिक्रमे कॢप्तस्थाने
पूजनं, मिलित्वा षोडशभिः पीठपूजनं भवति। पीठपदेन देवतायतनं
चक्रमेव ।। १६ ।।
पूजा के उद्देश्य से यागगृह में प्रवेश करते समय चक्र पर पुष्पों भरी
अञ्जलि के द्वारा फूल अर्पित करना उचित है। इसके बाद सोलह मन्त्रों से उसकी
पूजा होनी चाहिये। सोलह मन्त्र इस प्रकार उच्चरित करना चाहिये।
१. ऐं ग्लौं स्वर्णप्राकाराय नमः। २. ऐं ग्लौं सुराब्धये नमः। ३. ऐं ग्लौं
वराहदीपाय नमः। ४. ऐं ग्लौं वराहपीठाय नमः। ५. ऐं ग्लौं आधारशक्तये नमः।
६. ऐं ग्लौं कूं कूर्माय नमः। ७. ऐं ग्लौं कं कन्दाय नमः। ८. ऐं ग्लौं अं
अनन्तनालाय नमः। इन मन्त्रों से चक्रमध्य की पूजा करनी चाहिये। तदुपरान्त
पुनः निम्नलिखित आठ मन्त्रों से पूजा करनी चाहिये। वे मन्त्र इस प्रकार बनते
हैं—९. ऐं ग्लौं धर्माय नमः। १०. ऐं ग्लौं ज्ञानाय नमः। ११. ऐं ग्लौं वैराग्याय
नमः। १२. ऐं ग्लौं ऐश्वर्याय नमः। इन मन्त्रों से अग्नि, नैऋत्य, वायव्य और
ईशान कोणों में पूजा करनी चाहिये। तदुपरान्त १३. ऐं ग्लौं अधर्माय नमः।
१४. ऐं ग्लौं अनैश्वर्याय नमः। १५. ऐं ग्लौं अवैराग्याय नमः। १६. ऐं ग्लौं
अनैश्वर्याय नमः इन मन्त्रों से पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में पूजा
करनी चाहिये। यह पीठपूजा कहलाती है।।१६।।
चक्रमनुमाह
'त्रिपञ्चषडदलाष्टकशतसहस्रारपद्मासनाय नमः' इति चक्र-
मनुना चक्रमिष्ट्वा ।।१७।।
इस सूत्र में साम्राज्ञी कोलमुखी, जो विन्दु में विराजमान हैं, उनके सान्निध्य
में उल्लसित चक्र रूप देवशक्ति-प्रतीक रूप जो निर्मिति है, उसका क्रमिक
उल्लेख भीतर से बाहर की ओर किया गया है। यही चक्रमन्त्र कहलाता है।
इससे चक्र पर पुष्प अर्पित करना चाहिये। वृत्ति में केवल निबन्धकार का खण्डन
है। सूत्र से उसका कोई सम्बन्ध नहीं।।१७।।
ततो मण्डलादीनां यजनम्
वह्निमण्डलाय, सूर्यमण्डलाय, सोममण्डलाय नमः, इति त्रयो
गुणमन्त्राः। आत्ममन्त्राश्चत्वारः। इति सप्तविंशतिकमिदं पीठे
वरिवसनीयम् ।।१८।।
अत्र सोममण्डलाय नम इत्यन्तं मन्त्रत्रयम्। सं सत्त्वाय नमः, रं रजसे
नमः, तं तमसे नमः, इति गुणमन्त्राः। आं आत्मने नमः, अं अन्त-रात्मने
नमः, पं परमात्मने नमः, हीं ज्ञानात्मने नम इति आत्ममन्त्राश्चत्वारः। इत्थं
च स्वर्णप्राकारायेत्यारभ्य सप्तविंशतिः, तैः पीठपूजा कार्येत्यर्थः।।१८।।
इस सूत्र में तीन प्रकार के मन्त्र हैं—
१. तत्त्वमन्त्र—१. ऐं ग्लौं वह्निमण्डलाय नमः। २. ऐं ग्लौं सूर्यमण्डलाय नमः
और ३. ऐं ग्लौं सोममण्डलाय नमः। ये मण्डल तीन हैं।
१८२ परशुरामकल्पसूत्रम्
२. गुणमन्त्र—१. सं सत्त्वाय नमः। २. रं रजसे नमः। ३. तं तमसे नमः।
ये गुणमन्त्र भी तीन ही हैं।
३. आत्ममन्त्र—यें चार हैं, १. आं आत्मने नमः, २. अं अन्तरात्मने नमः।
३. पं परमात्मने नमः। ४. ह्रीं ज्ञानात्मने नमः। इस प्रकार ‘स्वर्णप्राकाराय
नमः’ इस १६वें सूत्र से इस अठारहवें सूत्र तक सप्तविंशति मन्त्रों से इस
सप्तविंशतिक पीठ की पूजा करने का निर्देश सूत्रकार ने दिया है। इसी
क्रम से पूजा होनी चाहिये।।१८।।
हौं प्रेतपद्मासनाय सदाशिवाय नम इति चक्रोपरि देव्यासन-
विमृष्टिः ।।१९।।
प्रेतरूपं यत्पद्मं तदभिन्नं यदासनं तत् स्वरूपो यः सदाशिवस्तस्मै नम
इति योजना, ब्रह्मा ननु सदाशिवे प्रेतरूपत्वं कथम्। एतदुक्तं ज्ञानार्णवे
पार्वतीप्रश्नोत्तरे—
ब्रह्माविष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः।
पञ्चप्रेता वरारोहे निश्चला एव ते सदा।।
अयमभिप्रायः — ब्रह्मादयः सदाशिवान्ता वामाज्येष्ठादिस्वस्वशक्ति-
रहिताः स्पन्दनेऽप्यशक्ताः सन्तः प्रेततुल्या एवेति। विमृष्टिः कल्पनम्।।१९।।
सदाशिव प्रेतपद्मासनस्वरूप माने जाते हैं। ज्ञानार्णव नामक ग्रन्थ में पार्वती
के प्रश्नोत्तर रूप में भगवान् शिव का कथन दिया गया है। उसके अनुसार “ब्रह्मा
विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः। पञ्चप्रेता वरारोहे निश्चला एव ते सदा”। अर्थात्
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ये पाँचों अपनी-अपनी शक्तियों से रहित
प्रेत माने जाते हैं। शक्तिसमन्वित रहने पर ही अपने कार्य करने में समर्थ होते
हैं। अन्यथा निश्चल ही रहते हैं। इनकी शक्तियाँ क्रमशः वामा, ज्येष्ठा, रौद्री,
अम्बिका और सदाशिवा मानी जाती हैं। इस विचार के पहले ही बिन्दुरूप देवी
के आसन पर ‘ऐं ग्लौं प्रेतपद्मासनाय सदाशिवाय नमः’ मन्त्र से देवी के प्रति
आस्थावान् होकर अभ्यर्थना करनी चाहिये।।१९।।
मूर्त्तिकरणीविद्यामाह
लृषाईं वाराहीमूर्त्तये ठः ठः ठः ठः हुं फट् इति
वाग्ग्लौमादिग्लौंवागन्ता मूर्त्तिकरणीविद्या ।।२०।।
वाराहीक्रमः १८३
'वाग्ग्लौं' आदौ यस्यां, ग्लौं वागन्ते यस्यां, मध्यतनवर्णानाम् ईदृशी
मूर्तिकरणीविद्येत्यर्थः। एतेन आसनकल्पनानन्तरं मूर्तिकल्पनविधिरुन्नेयः।
मन्त्रस्वरूपम्—‘ऐं ग्लौं लृषाईं वाराहीमूर्त्तये ठः ठः ठः ठः हुं फट् ग्लौं ऐं'
इति॥२०॥
इस सूत्र में मूर्तिकरणी विद्या का निर्देश है। पहले आसन की कल्पना
के बाद मूर्तिकल्पन विद्या का प्रयोग करना चाहिये। इस विद्या के आदि मे
'ऐं ग्लौं' का प्रयोग पहले तथा अन्त में इसी का विपर्यय अर्थात् 'ग्लौं ऐं'
करना चाहिये। मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार मन्त्रप्रयोग से अनुभूत होता है—
'ऐं ग्लौं लृषाई वाराहीमूर्त्तये ठः ठः ठः ठः हुं फट् ग्लौं ऐं'। आस्थापूर्वक
मन्त्र का प्रयोग करने पर चक्र में एक चमत्कार उन्मिषित होता हुआ-सा
अनुभूत होता है॥२०॥
आवाहनादि मुद्राबन्धनम्
मूलविद्यया आवाहनसंस्थापनसन्निधापनसन्निरोधनसम्मुखी-
करणावकुण्ठनवन्दनधेनुयोनीर्बद्ध्वा ॥२१॥
मूलविद्यामुच्चार्य तत्तन्मुद्रां बध्वा दर्शयन् तं तमर्थं भावयेद् इति भावः।
आवाहनादि मुद्राबन्धप्रकारः प्रसिद्धः। यावत्यो मुद्रा विहितास्तावतीषु मुद्रासु
बध्यमानासु तावद्वारं मूलमावर्त्तयेत्। न तु सकृन्मूलमुच्चार्य सर्वमुद्राबन्धनम्।
इति ज्ञेयम् ॥२१॥
मूलविद्या का उच्चारण कर उन मुद्राओं के बन्ध का प्रदर्शन करना
चाहिये। साथ ही उन मुद्राओं का उन बन्धों के साथ भावन भी करना चाहिये।
सूत्रकार ने सारी मुद्राओं का परिगणन सूत्र में कर दिया है। वे इस प्रकार हैं—
१. आवाहन, २. संस्थापन, ३. सन्निधापन, ४. संनिरोधन, ५. सम्मुखीकरण,
६. अवकुण्ठन, ७. वन्दन, ८. धेनु और ९. योनि। वृत्ति में तन्त्रों के उद्धरण
हैं। इनसे पढ़कर ये बन्ध नहीं बन पाते। गुरुदेव से इन्हें अभ्यासपूर्वक सीखना
चाहिये। इन सारी मुद्राओं के बनाने के लिये पुस्तकों का आश्रय लेने से अच्छा
सीखना ही है॥२१॥
१८४ परशुरामकल्पसूत्रम्
षडङ्गन्यासजालक्रमं च विवृणोति
देव्यङ्गन्यस्तषडङ्गपञ्चाङ्गाः ।।२२।।
षडङ्गमन्त्राः
१. ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि हृदयाय नमः।
२. ऐं ग्लौं वाराहि शिरसे स्वाहा।
३. ऐं ग्लौं वराहमुखि वराहमुखि शिखायै वषट्।
४. ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः कवचाय हुम्।
५. ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः नेत्रत्रयाय वौषट्।
६. ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः अस्त्राय फट्।
पञ्चाङ्गन्यासमन्त्रा ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि इत्यादयः पूर्वोक्ताः। तैर्देव्या-
स्तत्तदङ्गेषु न्यासं भावयेत् ।।२२।।
माँ वार्त्ताली के अङ्गों में मन्त्रन्यास का भावन करना चाहिये। षडङ्गन्यास
मन्त्र मैने ऊपर लिख दिया है। पञ्चाङ्गन्यास क्रमशः अङ्गुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा,
अनामिका और कनिष्ठिका में भावित करना चाहिये। 'अन्धे अन्धिनि' से 'स्तम्भे
स्तम्भिनि' तक 'ऐं ग्लौं' लगाकर 'अङ्गुष्ठाभ्यां नमः' आदि का प्रयोग करना
चाहिये।।२२।।
अथ षोडशोपचारपदार्थकथनपूर्वकं तावतामर्पणं विधत्ते
पाद्यार्घ्याचमनीयस्नानवासोगन्धपुष्पधूपदीपनीराजनच्छत्रचामर-
दर्पणरक्षाचमनीयर्नैवेद्यपानीयताम्बूलाख्यषोडशोपचारक्लृप्त्यन्ते ।।२३।।
षडङ्ग-पञ्चाङ्ग न्यास के अनन्तर षोडशोपचार पूजन करना चाहिये। जैसे
पाद्यमन्त्र—'ऐं ग्लौं पाद्यं कल्पयामि नमः' बनता है, इसी तरह सभी उपचारों
में 'ऐं ग्लौं' जोड़कर अन्त में 'कल्पयामि नमः' लगाने से मन्त्र बन जाते हैं।
इन उपचार वस्तुओं को माँ के समक्ष श्रद्धापूर्वक प्रस्तुत कर परमानन्द का
अनुभव करना चाहिये।।२३।।
अथ देव्या ध्यानप्रकारमाह
ध्यानं देव्या मेघमेचका कुटिलदंष्ट्रा कपिलनयना घनस्तन-
मण्डला चक्रखड्गमुसलाभयशङ्खखेटकहलवरपाणिः पद्मासीना
वार्त्ताली ध्येया।। २४।।
तथा च षोडशोपचारार्पणानन्तरं यावदवकाशमुक्तप्रकारेण मूर्तिं ध्यायेद्
इत्यर्थः। मेघमेचका मेघश्यामला ‘कालश्यामलमेचकाः’ इत्यमरः। कुटिला
(वक्रा) ‘कुटिलं भुग्नं वेल्लितं वक्रमित्यपि’ इत्यमरः। हलं लाङ्गलम् ।। २४।।
षोडशोपचार पूजन के उपरान्त माँ वार्त्ताली का ध्यान करना चाहिये। ध्यान
का श्लोक इसी क्रम के सूत्र १४ में लिखा गया है। वहीं से देखकर श्रद्धापूर्वक
ध्यान में तसल्ली होने से माँ की अनुकम्पा प्राप्त होती है।। २४।।
देवीतर्पणम्
दशधा तस्यास्तर्पणं कुर्यात् ।।२५।।
तर्पणमन्त्रे कोलमुखीति मूलमन्त्रान्ते योज्यम्, न तु वाराहीमिति।
उत्पत्तिवाक्ये कोलमुखीति श्रवणात् ।।२५।।
तर्पण के मन्त्र से देवी का दश बार तर्पण करना चाहिये। तर्पण के
मन्त्र को मूलमन्त्र से वहीं तक लेना चाहिये, जिसमें कोलमुखि शब्द का प्रयोग
किया गया है। जैसे तर्पण के ‘ऐं ग्लौं सौं नमः भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि
वराहमुखि वराहमुखि श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः’ इस मन्त्र से बाँयें हाथ
में जल लेकर दाहिने हाथ के पुष्प को उसमें डुबाकर देवीं को तृप्त करने के
उद्देश्य से तृप्त करना चाहिये। यही तर्पण का विधान है।।२५।।
अथावरणपूजां वक्तुं प्रारभते
त्र्यस्रे जम्भिनीमोहिनीस्तम्भिन्यः ।। २६ ।।
देव्यग्रकोणमारभ्य प्रादक्षिण्येन ज्ञेयम्। इति प्रथमावरणम् ।।२६।।
त्रिकोण में प्रथमावरण की पूजा होती है। इसमें देवी के अग्रकोण से
आरम्भ कर प्रादक्षिण्य क्रम से पूजन का विधान है। इसका मन्त्र है—
१८६ परशुरामकल्पसूत्रम्
'ऐं ग्लौं जम्भिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः'।
'ऐं ग्लौं मोहिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः'।
'ऐं ग्लौं स्तम्भिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः'।
इन मन्त्रों में पूजयामि और नमः के बीच में तर्पयामि लगाने की भी
परम्परा है॥२६॥
अथ द्वितीयावरणपूजामाह
पञ्चारे अन्थिनी-रुन्धिन्यौ ताश्च ।।२७।।
पञ्चारे पञ्चकोणेषु अन्थिनीरुन्धिन्यौ। ताश्च जम्भिन्यादयः, त्रयश्च मन्त्राः
पूर्वोक्ता ग्राह्याः। मन्त्रस्वरूपम्—'ऐं ग्लौं अन्थिनि नमः अन्थिनीश्रीपादुकां
पूजयामि' क्रमः पूर्ववद् इति द्वितीयावरणम् ।।२७।।
दूसरा आवरणपूजा-स्थान पञ्चकोण माना जाता है। पञ्चकोण की संरचना
बड़ी आकर्षक होती है। रेखाओं के परस्पर कटाव और कोणों की स्वतः निर्मिति
में ब्रह्माण्डीय रहस्यमयता के दर्शन होते हैं।
उस रहस्य-शक्ति की पूजा इस आवरण में भी की जाती है। इन पाँच
शक्तियों की पूजा के सन्दर्भ में अन्थिनी, रुन्धिनी, जम्भिनी, मोहिनी और
स्तम्भिनी की पूजा का विधान है। वृत्ति में मन्त्र स्वरूप इस प्रकार दिया गया
है 'ऐं ग्लौं अन्थिनि नमः अन्थिनीश्रीपादुकां पूजयानि नमः'। इसी तरह क्रमशः
स्तम्भिनी पर्यन्त मन्त्र का ऊहन कर लेना चाहिये। स्तम्भिनी मन्त्र, जैसे—'ऐं
ग्लौं स्तम्भिनि नमः स्तम्भिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः' बनेगा। पूजयामि और नमः
के बीच में तर्पयामि भी लगाते हैं। इस प्रकार द्वितीयावरण की पूजा पूरी होती
है॥२७॥
तृतीयावरणपूजामाह
षट्कोणे आक्षाईं ब्रह्माणी, ईलाईं माहेश्वरी ऊहाई कौमारी,
ॠसाईं वैष्णवी, ऐशाईं इन्द्राणी, औवाईं चामुण्डा, तस्यैवाग्रेषु मध्ये
च यमरयूं यां यीं यूं यैं यौं यः याकिनि जम्भय जम्भय मम
सर्वशत्रूणां त्वग्धातुं गृह्ण गृह्ण अणिमादि वशं कुरु कुरु स्वाहेति।
वाराहीक्रमः १८७
अन्यासां धातुनाथानामप्येवं बीजे नामनि धातौ त्वाराधनकर्मणि मन्त्रः
सन्नाम। रमरयूं राकिणि रक्तधातुं पिब पिब लमरयूं लाकिनि
मांसधातुं भक्षय भक्षय डमरयूं डाकिनि मेदोधातुं ग्रस ग्रस कमरयूं
काकिनि अस्थिधातुं जम्भय जम्भय समरयूं साकिनि मज्जाधातुं गृह्ल
गृह्ल हमरयूं हाकिनि शुक्रधातुं पिब पिब अणिमादिवशं कुरु कुरु
स्वाहा-इति धातुनाथयजनम् ।।२८।।
षट्कोणे कोणाग्रेषु आक्षाईं. इत्यादि षण्मन्त्रैः षड्देवताः पूजयेत्। 'ऐं
ग्लौं' आक्षाईं ब्रह्माणी श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नम, इति मन्त्रस्वरूपम्।
एवमग्रेऽपि। मध्ये (षट्कोणमध्ये) स्वाहान्तमेकं मन्त्रं दर्शयित्वा एतन्मन्त्र-
वर्णानन्यत्र काँश्चिदतिदिशति—एवमिति। एवम् (उक्तमन्त्रवदित्यर्थः)। एवमति-
देशमुक्त्वा अतिदिष्टमन्त्रवर्णेषु बाधकमूह्यम्। तत्रैव क्वचित्स्थलविशेषे
दर्शयति—बीजेत्यादिना। बीजे इत्येकवचनं जात्याख्यायाम्। 'इति रीत्या
बीजस्थाने वक्ष्यमाणबीजानां सन्नाम ऊहः कार्यः।
एवं धातौ त्वग्धातुस्थाने तत्तद्धातूनां नामनि याकिनीति नामस्थाने
तत्तन्नाम्नामूहश्च कार्यः। शिष्टा मन्त्रवर्णा मम सर्वशत्रूणाम् इत्यादयः समाना
इति भावः। अथ द्वितीयादिमन्त्रेषु विशेषमाह—रमरयूमित्यादिना ।।२८।।
तीसरे आवरण की पूजा का सर्वाधिक विशिष्ट महत्त्व है। षट्कोण के
छः कोणों के कोण-मूलों में क्रमशः पाँच बीज-मन्त्र लगते हैं। ऐं ग्लौं आ क्षाईं
उनके बाद ब्रह्माणी देवी का उल्लेख कर श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः।
यह प्रथम अग्रकोण का मूल मन्त्र बनता है। पूरे मन्त्र इस प्रकार बनेंगे—
१. ब्रह्माणी—ऐं ग्लौं आक्षाईं ब्रह्माणी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
२. माहेश्वरी—ऐं ग्लौं ईलाईं माहेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
३. कौमारी—ऐं ग्लौं ऊहाईं कौमारी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
४. वैष्णवी—ऐं ग्लौं ऋसाईं वैष्णवी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
५. इन्द्राणी—ऐं ग्लौं ऐशाईं इन्द्राणी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
६. चामुण्डा—ऐं ग्लौं औवाईं चामुण्डा श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
१८८ परशुरामकल्पसूत्रम्
इन्हीं कोणों में कोण-मध्य में क्रमशः १. याकिनी, २. राकिणी,
३. लाकिनी, ४. डाकिनी, ५. काकिनी, ६. साकिनी और ७. हाकिनी देवियों
की पूजा होती है। ये देवियाँ धातुओं की स्वामिनी मानी जाती है। इनके क्रमिक
मन्त्र इस प्रकार हैं—
१. याकिनी—ऐं ग्लौं यमरयूं यां यीं यूं यैं यौं यः याकिनि जम्भय जम्भय मम
शत्रूणां त्वग्धातुं गृह्ण गृह्ण अणिमादिवशं कुरु कुरु स्वाहा श्रीपादुकां पूजयामि
नमः।
२. राकिणी—ऐं ग्लौं रमरयूं राकिणि रक्तधातुं पिब पिब इतना मूल उल्लेख है;
किन्तु इस अन्य धातु स्वामिनियों के मन्त्रों में भी पहले की तरह योजना
होनी चाहिये, यह निर्देश सूत्र में अन्यासां धातुनाथानां वाक्य में दिया हुआ
है। अतः पूरा मन्त्र इस प्रकार होता है—
ऐं ग्लौं रमरयूं रां रीं रूं रैं रौं रः राकिनि जम्भय जम्भय मम सर्वशत्रूणां रक्तधातुं
पिब पिब अणिमादिवशं कुरु कुरु स्वाहा राकिणी श्रीपादुकां पूजयामि
(तर्पयामि) नमः।
३. लाकिनी—ऐं ग्लौं लमरयूं लां लीं लूं लैं लौं लः लाकिनि जम्भय जम्भय
मम सर्वशत्रूणां मांसधातुं भक्षय भक्षय अणिमादि वशं कुरु कुरु स्वाहा
लाकिनी श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः।
४. डाकिनी—ऐं ग्लौं डमरयूं डां डीं डं डैं डौं डः डाकिनि जम्भय जम्भय मम
सर्वशत्रूणां मेदोधातुं ग्रस ग्रस अणिमादि वशं कुरु कुरु स्वाहा डाकिनी
श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः।
५. काकिनी—ऐं ग्लौं कां कीं कं कैं कौं कः काकिनि जम्भय जम्भय मम सर्व-
शत्रूणाम् अस्थिधातुं भञ्जय भञ्जय अणिमादि वशं कुरु कुरु स्वाहा काकिनी
श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः।
६. साकिनी—ऐं ग्लौं समरयूं सां सीं सूं सैं सौं सः साकिनि जम्भय जम्भय
मम सर्वशत्रूणां मज्जाधातुं गृह्ण गृह्ण अणिमादिवशं कुरु कुरु स्वाहा साकिनि
श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
७. हाकिनि—ऐं ग्लौं हमरयूं हां हीं हूं हैं हौं हः हाकिनि जम्भय जम्भय मम
सर्वशत्रूणां शुक्रधातुं पिब पिब अणिमादिवशं कुरु कुरु स्वाहा हाकिनि
वाराहीक्रमः १८९
श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः। इन धातु स्वामिनियों की पूजा सम्पन्न
करने के अनन्तर षट्कोण के उभयपार्श्व की पूजा की जाती है॥२८॥
अनन्तरं षडस्रोभयपार्श्वयोः क्रोधिनीस्तम्भिन्यौ चामरग्राहिण्यौ
तत्रैव स्तम्भनमुसलायुधाय आकर्षणहलायुधाय नमः षडराद्बहिः
पुरतो देव्याः क्षौं क्रौं चण्डोच्चण्डाय नम इति तद्यजनम् ॥२९॥
अनन्तरं धातुनाथयजनानन्तरम्। षडस्रोभयपार्श्वयोरिति, उभयपार्श्व-
द्वयकोणान्तःप्रदेशो बोध्यः। मन्त्रस्वरूपं च ऐं ग्लौं क्रोधिनी चामरग्राहिणी
श्रीपादुकाम्। एवमपरम्। अग्रे चण्डोच्चण्डपूजाया बहिर्विधानात् तत्रैवेति
षडस्रोभयपार्श्वयोरेवेत्यर्थः। इति तृतीयावरणम् ॥२९॥
धातुनाथ पूजन के अनन्तर षडस्र के दाहिने और बायें दोनों ओर कोणों
के अन्तःप्रदेश में क्रोधिनी और स्तम्भिनी दो चामरग्राहिणी शक्तियों की पूजा
भी होनी चाहिये। इनके दो मन्त्र इस प्रकार बनेंगे।
१. ऐं ग्लौं क्रोधिनी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
२. ऐं ग्लौं स्तम्भिनी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
षट्कोण के दोनों पार्श्व भाग में ही आयुधों की पूजा करने का निर्देश
सूत्रकार दे रहे हैं। इनके मन्त्र—१. ऐं ग्लौं स्तम्भनमुसलायुधाय नमः। २. ऐं
ग्लौं आकर्षणहलायुधाय नमः। बनते हैं। षडर के बाहर देवी के समक्ष ही श्री
चण्डोच्चण्ड देव की पूजा इस मन्त्र से करनी चाहिये।
१. ऐं ग्लौं क्षौं क्रौं चण्डोच्चण्डाय नमः। इस प्रकार धातुनाथ, चामर-
ग्राहिणी और षडस्र के बाहर चण्डोच्चण्ड की पूजा इस तीसरे आवरण में सम्पन्न
की जाती है॥२९॥
चतुर्थावरणमाह
अष्टदले वार्त्ताली वाराही वराहमुख्यन्धिन्यादयः पञ्च तद्बहिः
महामहिषाय देवीवाहनाय नमः ॥३०॥
देव्यग्रदलमारभ्य प्रादक्षिण्येन, क्रमस्यानुक्तत्वात्। वाहनपूजामाह—
तद्बहिरिति। अष्टदलाद्बहिरित्यर्थः। देवीपुरतोऽयं पूज्यः, वाहनरूपत्वात्।
वाहनस्थितेः सर्वत्र प्रधानदेवताग्रभागे दृष्टत्वात् ॥३०॥
१९० परशुरामकल्पसूत्रम्
चतुर्थ आवरण में अष्टदलों में आठ देवियों—१. वार्त्ताली २. वाराही,
३. वराहमुखी, ४. अन्धिनी, ५. रुन्धिनी, ६. जम्भनी, ७. मोहिनी और
८. स्तम्भिनी की पूजा की जाती है। अष्टदल के बाहर सामने ही 'ऐं ग्लौं
महामहिषाय देवीवाहनाय नमः' मन्त्र से वाहन की पूजा होती है। 'ऐं ग्लौं'
लगाकर ही 'वार्त्ताली श्रीपादुकां पूजयामि नमः' के समान सभी सातों देवियों
के मन्त्र बनते हैं॥३०॥
पञ्चमावरणमाह
शतारे देवीपुरतो दलसन्धौ जम्भिन्यै, इन्द्राद्याप्सरोभ्यः,
सिद्धेभ्यः, द्वादशादित्येभ्योऽग्नये, साध्येभ्यो, विश्वेभ्यो देवेभ्यो,
विश्वकर्मणे, यमाय, मातृभ्यो, रुद्रपरिचारकेभ्यो, रुद्रेभ्यो, मोहिन्यै,
निरृतये, राक्षसेभ्यो, मित्रेभ्यो, गन्धर्वेभ्यो, भूतगणेभ्यो, वरुणाय,
वसुभ्यो, विद्याधरेभ्यः, किन्नरेभ्यो, वायवे, स्तम्भिन्यै, चित्ररथाय,
तुम्बुरवे, नारदाय, यक्षेभ्यो, सोमाय, कुबेराय, देवेभ्यो, विष्णवे,
ईशानाय, ब्रह्मणे, अश्विन्यां, धन्वन्तरये, विनायकेभ्यो नम इति
देवतामण्डलमिष्ट्वा तद्बहिः औं क्षौं क्षेत्रपालाय नमः, सिंहवराय
देवीवाहनाय नम इति च तदुभयं वरिवस्येत्। तद्बहिः महाकृष्णाय
देवीवाहनाय नम इति तत्पूजा ।।३१।।
देवतानामष्टत्रिंशत्संख्याकत्वात् तया संख्यया शतपत्रविभागासम्भवाद्
अवश्यं सन्धयो हेयाः। तथा सति देव्याः पुरतः देवतासमसंख्याकसन्धयो
ग्राह्याः। शेषा हेयाः। तत्राप्युदगपवर्गलाभाय नमःपद्मनुषज्यते। तत उत्तरे
समाप्तिः। सर्वत्र नमःपद्मनुषज्यते। ततः क्षेत्रपालादिपूजां विधत्ते—तद्वहिरिति।
तद्बहिः शतपत्रबहिः। वाहनरूपत्वाद् देवीपुरत एव। यद्वा तद्बहिः पूर्व-
पूजिताष्टत्रिंशद्देवताऽधिष्ठानदलसन्धिबहिः। तेन देवीपुरोभागस्त्वर्थात् सिध्यति।
तदुभयं क्षेत्रपालसिंहोभयम्। तद्बहिः क्षेत्रपालसिंहबहिः। तत्पूजा मृगराजपूजा।
इति पञ्चमावरणम् ।।३१।।
पञ्चमावरण की पूजा शतार सम्बन्धित पूजा है। इसमें ३८ देवताओं
की पूजा का उल्लेख वृत्तिकार ने किया है। शेष को हेय कर दलसन्धि में
वाराहीक्रमः १९१
ही पूजा का विधान किया गया है। देवताओं की ३८ संख्या का परिगणन
परम्परा के अनुसार है। सूत्र के अनुसार नहीं। जैसे बहुवचन वाले शब्दों की
देवसंख्यायें तीन-तीन हैं। आदित्य १२ हैं। साध्य, विश्वदेव, अष्टमातृकाएँ ११
रुद्र और उनके ११ परिचारकों (अष्टवसुवों) की निर्धारित संख्यायें पुराणों में
प्रसिद्ध हैं। शतार में स्थान सौ हैं। इन्हें छोड़ना और किसी को ग्रहण करना
परम्परा पर आश्रित लगता है। विद्वानों को इस पर विचार करना चाहिये।
सूत्रानुसार यह ठीक नहीं। सूत्रकार ने देवता मण्डल कहा है। अड़तीस नहीं
कहा है। पुराणों में निर्धारित संख्याओं के अनुसार यह संख्या सौ ही होनी
चाहिये।
जो हो, ऐं ग्लौं लगाकर चतुर्थ्यन्त के साथ नमः लगाकर पूरा मन्त्र बनाते
हैं। इन्हीं मन्त्रों से इनकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार देवता मण्डल की
पूजा के बाद शतपत्र के बाहर 'ऐं ग्लौं औं क्षौं क्षेत्रपालाय नमः' से इन दोनों
की पूजा करनी चाहिये।
इसके बाहर अर्थात् देवदलसन्धि के बाहर देवी के समक्ष ही 'ऐं ग्लौं
महाकृष्णाय मृगराजाय देवीवाहनाय नमः' मन्त्र से मृगराज की पूजा पूरी की जाती
है। इस प्रकार पञ्चम आवरण की पूजा पूरी होती है॥३१॥
षष्ठावरणपूजामाह
सहस्रारे अष्टधा विभक्ते ऐरावताय, पुण्डरीकाय, वामनाय,
कुमुदायाञ्जनाय, पुष्पदन्ताय, सार्वभौमाय, सुप्रतीकाय नम इति
तत्पूजा। बहिः सुधाब्धेर्वा बाह्यप्रकाराष्टदिक्षु अध उपरि च
हेतुकादयो भैरवक्षेत्रपालशब्दयुक्ताः प्रत्येकं क्षौमादयश्च यष्टव्याः।
हेतुकत्रिपुरान्तकाग्नियमजिह्वैकपादकालकरालभीमरूपहाटकेशाचला
दशभैरवाः ।।३२।।
अष्टधा विभक्ते पञ्चविंशत्युत्तरशतदलेष्वेकैका देवता पूज्या। अमीषामेव
देवतानां विकल्पेन स्थानान्तरमाह—बहिः सुधाब्धेर्वेति। सुधाव्यधिकरणत्वेन
कल्पितो यो देशस्तस्माद्बहिरित्यर्थः। क्रमस्तु इन्द्रादीशानान्तप्रदक्षिणम्। अत्र
१९२ परशुरामकल्पसूत्रम्
नमोऽन्तमन्त्रेषु सर्वत्र नमोऽन्ते देवतानाम्। ततः श्रीपादुकामित्यष्टाक्षरीयोगः।
यथा जम्भिन्यै नमः जम्भिनी श्रीं। बाह्यप्रकारेति प्रथमचतुरस्रे इत्यर्थः।
हेतुकादयो दश अचलान्ताः प्रत्येकं प्रतिमन्त्रं क्षौं इत्यादौ येषां ते यष्टव्याः
पूज्याः। मन्त्रस्वरूपं ऐं ग्लौं क्षौं हेतुकभैरव-क्षेत्रपाल श्रीं। एवमग्रेऽपि
योज्यम् ।।३२।।
एक हजार अरों वाले भाग को आठ से विभक्त करने पर एक सौ पचीस
दलों का एक भाग होता है। प्रति एक सौ पचीस दल वाले भाग पर एक
देवता की पूजा करनी चाहिये। ये देवता—१. ऐरावत, २. पुण्डरीक,
३. वामन, ४. कुमुद, ५. अञ्जन, ६. पुष्पदन्त, ७. सार्वभौम और ८. सुप्रतीक
नामक हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार सुधा समुद्र के लिये अधिकृत जो
भाग प्रकल्पित होता है, उसी में इनकी पूजा होनी चाहिये। पूर्व से ईशान तक
का क्रम पूजा में मान्य है।
बाह्य प्राकार के अर्थात् चक्र के प्रथम चतुष्कोण के चारों ओर, चारों
कोणों और ऊपर-नीचे भी भैरवक्षेत्रपाल चतुर्थ्यन्त शब्द योजना के साथ नमः
लगाकर मन्त्र बनाना चाहिये। मन्त्र के पहले 'ऐं ग्लौं क्षौं' अवश्य जोड़ना चाहिये।
हेतुकभैरव का मन्त्र इस प्रकार बनता है—ऐं ग्लौं क्षौं, हेतुकभैरवक्षेत्रपालाय नमः।
हेतुकभैरवश्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः। कुल भैरवों की संख्या यहाँ दश
दी गयी है।
वे—१. हेतुक, २. त्रिपुरान्तक, ३. अग्निजिह्व, ४. यमजिह्व, ५.
एकपाद, ६. काल, ७. कराल, ८. भीमरूप, ९. हाटकेश और १०. अचल
नामक हैं। हेतुक भैरवों के मन्त्र बनते हैं। जैसे अन्तिम दशवें भैरव की (ऊपर)
पूजा के लिये मन्त्र इस प्रकार बनेगा— ऐं ग्लौं क्षौं अचलभैरवक्षेत्रपालाय नमः।
अचलभैरवश्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः। इस प्रकार आवरणपूजा पूरी होती
है।।३२।।
उक्तमर्थमुपसंहरति
एवं षडावरणीमिष्ट्वा पुनर्देवीं त्रिधा सन्तर्प्य सर्वैरुपचारै-
रुपचर्य ।।३३।।
वाराहीक्रमः १९३
षडावरणपूजानन्तरं कर्त्तव्यां क्रियामाह—पुनरिति। सर्वैरुपचारैः पूर्वोक्त-
षोडशोपचारैरुपचर्य ।।३३।।
छः आवरणों की पूजा-विधि का वर्णन सूत्र-संख्या ३२ तक हो चुका,
इसके बाद क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासा के उत्तर में सूत्रकार कह रहे हैं
कि, देवी का त्रिधा सन्तर्पण होना चाहिये और अन्त में सोलह उपचारों से माँ
की पूजा की जानी चाहिये। इससे माँ परम प्रसन्न होती है।।३३।।
अथ बलिदानप्रकारं वक्तुं प्रक्रमते
पुरतो वामभागे हस्तमात्रं जलेनोपलिप्य रुधिरान्नहरिद्राऽन्न-
महिषपलसक्तुशर्करा-हेतुफलत्रय-माक्षिकमुद्गत्रय-माषचूर्णदधिक्षीर-
घृतैः शुद्धोदनं सम्मर्द्य चरणायुधाण्डप्रमाणान् दशपिण्डान् विधाय,
तत्र निधाय कपित्थपलमानमेकं पिण्डं च तत्समीपे सादिमोपादिम-
मध्यमं चषकं च निक्षिप्य दशपिण्डान् हेतुकादिभ्यो मध्यमपिण्डं
चषकं च चण्डोच्चण्डाय तत्तन्मन्त्रैर्दत्त्वा वृन्दमाराध्य ।।३४।।
देव्या इति शेषः। अथ द्रव्यमाह—रुधिरान्नेति। रुधिरेण रक्तेन युक्तम्
अन्नं हरिद्रायुक्तम्, अन्नं पलं मांसं सक्तवो भर्जितयवचणकचूर्णं हेतुः प्रथमं
फलत्रयं त्रिफला माक्षिकं पुष्परसः, मुद्गत्रयं त्रिजातिमुद्गाः। शेषं स्पष्टम्। एतैः
शुद्धोदनं संमर्द्य मिश्रितं कृत्वा। चरणायुधः कुक्कुटः, कुक्कुटश्चरणायुध
इत्यमरः। तत्र पूर्वलिप्तदेशे तत्समीपे दशपिण्डसमीपे। दशपिण्डस्थापनं च
प्रागादिदशदिक्षु पूजायामासां दिशां क्लृप्तत्वात् तत्तन्मन्त्रैः पूजायां क्लृप्तमन्त्रैः।
तत्रापि नमोऽन्तैरेव, न श्रीपादुकेत्यादि मन्त्रशेषः। वृन्दमाराध्येति हेतुकादि-
चण्डोच्चण्डान्तवृन्दमित्यर्थः। अत्र पाठक्रमं बाधित्वाऽर्थक्रमेण आदौ आराधनं
पश्चाद् बलिदानं ज्ञेयम्, तत्रापि बाधकाभावात् पदार्थानुसमयेनाभ्यर्चनं
पञ्चोपचारैः कार्यम् ।।३४।।
सामने आगे ही बायें भाग में एक हाथ वर्गाकार जल से उपलिप्त कर
वहीं दश पिण्डों का निर्माण करना चाहिये। पिण्डों के द्रव्य के रूप में रक्तमिश्रित
अन्न, हरिद्रामिश्रित अन्न, मांस, सक्तु, शर्करा, हेतु, द्रव्य, त्रिफला, माक्षिक
१९४ परशुरामकल्पसूत्रम्
(मधु), मुद्गत्रय, उड़दचूर्ण, दही, दूध, घी इन सबको शुद्ध पके चावल (भात)
में पूरी तरह मिश्रित कर लेना चाहिये। इन्हीं द्रव्यों से बने उस मिश्रित खाद्य
से कुक्कुट के अण्डे के बराबर दश पिण्ड बनाना चाहिये। उपलिप्त भूमि पर
इन पिण्डों को रखना चाहिये। एक अलग कपित्थ फल के बराबर पिण्ड बनाकर
उन्हीं पिण्डों के पास रखते हैं। दश पिण्ड दश दिशाओं के क्रम से ही पूजा
के उपयुक्त भाव से रखे जाते हैं। पूजा के मन्त्रों में केवल नमः अन्त वाले
मन्त्र ही प्रयुक्त किये जाते हैं, श्रीपादुका वाले नहीं। ११ पिण्ड तीन चषक में
से १० पिण्ड और दो चषक तो हेतुक भैरव क्षेत्रपालों को तथा ग्यारहवाँ कपित्थ
समपिण्ड तथा तीसरा चषक 'चण्डोच्चण्ड' देव को अर्पित करना होता है। चषक
वहीं उलट देते हैं। सूत्र के अनुसार अन्त में वृन्द का पञ्चोपचार पूजन होना
चाहिये; किन्तु वृत्तिकार आराधन के बाद बलि का क्रम उचित मानते हैं॥३४॥
गुरुसन्तोषणम्
यथाविभवं गुरुं सन्तोष्य ॥३५॥
यथाविभवं स्वशक्तिं दृष्ट्वा गुरुं सन्तोषयेत्यनेन गुरुसन्निधावनुष्ठानं
सूचितम्। दूरस्थे नित्यं सन्तोषणासम्भवात् तेन सति सम्भवे गुरुसन्निधौ
फलाधिक्यं ज्ञेयम् ॥३५॥
अपने वैभव के अनुसार गुरु को सन्तुष्ट करना शिष्य का कर्त्तव्य है।
शास्त्र का यह निर्देश है कि, वित्त रहने पर वित्तशाठ्य नहीं करना चाहिये।
इस सूत्र के निर्देश के अनुसार यह भी सूचित हो रहा है, कि ये क्रियायें गुरु
के सान्निध्य में होनी चाहिये। दूर रहकर यह सम्भव नहीं॥३५॥
शक्त्यादिपूजामाह
सम्पूर्णयौवनाः सलक्षणा मदनोन्मादिनीस्तिस्रः शक्तीराहूय
बटुकं चैकमभ्यर्च्य स्नपयित्वा गन्धादिभिरलङ्कृत्य वार्त्तालीबुद्ध्या
एकां शक्तिं मध्ये क्रोधिनी-स्तम्भिनी-बुद्ध्या द्वे इतरे पार्श्वयोश्चण्डो-
च्चण्डधिया बटुकमग्रे स्थापयित्वा सर्वैर्द्रव्यैः सन्तोष्य मम
श्रीवार्त्ताली-मन्त्रसिद्धिर्भूयादिति ताः प्रति वदेत् ताश्च प्रसीदन्त्व-
थिदेवता इति ब्रूयुः॥३६॥
वाराहीक्रमः १९५
मदनोन्मादिनीः मदनवर्धिनीः आहूयाभ्यर्च्येति शक्तिषु बटुके चान्वेति।
स्नपनं चात्राभ्यङ्गरूपम्। तत्त्वपूजायां स्नानावसरे कर्तव्यम्। ततो गन्धादिभि-
रलङ्कुर्यात्। आदिपदेन वस्त्रभूषापटादि ग्राह्यम्, अग्रे तासामग्रे सर्वैर्द्रव्यैरिति
वाराहीपूजायां विहित-प्रथम-द्वितीय-तृतीयैरित्यर्थः। ता इत्यतः प्रार्थनं
सुवासिनीनामेव न बटुकस्य ।।३६।।
पूर्णरूप से यौवनसम्पन्न स्त्रियाँ सलक्षणा मानी जाती हैं, यौवन से स्त्रीमात्र
में एक दिव्य आकर्षण होता है। इस आकर्षण के फलस्वरूप काम का उन्माद
होना पुरुष की दुर्बलता का द्योतक है। पूजा के सन्दर्भ में काम बढ़ाने वाली
स्त्रियों के आवाहन में सूत्रकार की यह स्पष्ट इच्छा झलक रही है कि, साधक
ऐसी स्त्री में दिव्यता का दर्शन करे। अन्यथा तत्काल काम के मृत्यु-गर्त में
गिराने वाली गार्ह्य-गर्हिता-वृत्तिरूप गोमुखी गोधायें काट खाने को मुँह बाये
खड़ी हैं। ऐसी आकर्षक सौन्दर्यमयी शक्तिरूपा देवियों और बटुक को वहाँ
बुलाकर उनकी पूजा करनी चाहिये। स्नपन को वृत्तिकार अभ्यङ्ग रूप मानते हैं।
वस्तुतः अभ्यङ्ग के बाद, जिसे उबटन कहते हैं, स्नान आवश्यक होता है। स्नान
के बाद गन्ध, वस्त्राभूषण से अलङ्कृत करना चाहिये। उन्हें पूर्ण सन्तुष्ट कर
उनसे निवेदन करना चाहिये कि, आप लोग शक्तिरूपा हैं। हमें यह आशीर्वाद
दें कि, 'हमारी वार्त्तालीपूजा सिद्ध हो जाय'। वे यह कहें कि, यहाँ इस मण्डल
में अभ्यर्चित सभी अधिकारसम्पन्न देवता परम प्रसन्न हों। अर्थात् यजमान के
मनोरथ सिद्ध हों।।३६।।
एवं पूजामुपसंहृत्य अग्रे कर्त्तव्यं विधत्ते
एवं सपरिवारामुदारां भूदारवदनामुपतोष्य पुरश्चरणं कृत्वा
तद्दशांशं तापिच्छकुसुमैर्हुत्वा मन्त्रं साधयेत् ।।३७।।
एवमुक्तप्रकारेण सपरिवाराम् आवरणदेवतासहिताम् उदारां फलदान-
शौण्डां भूदारस्य क्रोडस्य वदनमिव वदनं यस्यास्ताम्। लक्षं पुरश्चरणं कृत्वा इति
तद्दशांशं, जपदशांशं, तापिच्छकुसुमैस्तमालकुसुमैः। 'कालस्कन्धस्तमालः स्याद्
तापिच्छोऽप्यथ' इत्यमरः। मन्त्रं साधयेद् इत्यनेन केवललक्षजपेनैव पर्याप्तः।
१९६ परशुरामकल्पसूत्रम्
इयं संख्या पुरश्चरणे कृतयुगे कलौ चतुर्गुणं प्रोक्तम् इति वचनात्
कलियुगे चतुर्गुणमित्यलं पल्लवितेन इति।।३७।।
इस प्रकार परिवारसहित माता वार्त्ताली की पूजा कर उनको प्रसन्न करने
में उपासक को अपना अस्तित्व ही अर्पित कर देना चाहिये। वह महती कृपावती
है। उसके औदार्य का उपमान नहीं। इसके मुख का सादृश्य क्रान्तदर्शी विद्वानों,
गुरुजनों और उपासकों के अनुसार वराह से मिलता-जुलता है। इस कथन के
भी कई रहस्य हैं। ऐसी दयामयी माँ श्रद्धा से ही सन्तुष्ट हो जाती है।
उसको सन्तुष्ट करने के उपरान्त पुरश्चरण में प्रवृत्त होना चाहिये। पुरश्चरण
की संख्या का निर्देश सूत्रकार ने दिया है। तदनुसार एक लाख मन्त्रजप
आवश्यक है। वृत्तिकार कहते हैं कि, यह संख्या सत्ययुग की है। कलियुग में
चतुर्गुण अर्थात् चार लाख की होनी चाहिये। इसी के साथ वृत्तिकार ने
परमानन्दतन्त्र आदि के विशद और सविस्तर उद्धरण प्रस्तुत किये हैं। सूत्रकार
की दृष्टि से साधक या उपासक को गुरुदेव पर निर्भर रहना चाहिये। उद्धरणों
से उपासक में वृत्तिभेद पैदा होने का भय है। यहाँ वह अनावश्यक विस्तार
ही लग रहा है। यों विद्वान् साधक के स्वाध्याय और तन्त्रान्तर अध्ययन को
कहीं बाधित नहीं किया गया है।
पुरश्चरण के सिद्ध हो जाने के उपरान्त जप के दशवें भाग की संख्या
में हवन करना चाहिए। विशेष कृत्यों में हवनीय द्रव्य भी अलग-अलग होते
हैं। यहाँ पर सूत्रकार ने तापिच्छकुसुम से हवन का निर्देश दिया है। तापिच्छ
अमरकोश के अनुसार तमाल को कहते हैं। तमाल के फूल का हवन इस
उपासना की पूर्णता के लिये आवश्यक माना जाता है।
मन्त्र की सिद्धि में हवन सहायक होता है, कैसे? इस रहस्य को गुरुदेव
से जानना चाहिये।।३७।।
एवं पुरश्चरणमुक्त्वा पूजाशेषकृत्यमाह
ततश्च पूजितां देवीमात्मनि योजयित्वा स्वैरं विहरन्नाज्ञासिद्धः
सुखी विहरेत्। इति शिवम् ।।३८।।
वाराहीक्रमः १९७
ततः जपानन्तरं चक्रे पूजितां देवीम् आत्मनि हृदयकमले योजयित्वा
स्थापयित्वा स्वैरं स्वेच्छया विहरन् आज्ञायाः सिद्धिः फलवत्ता यस्यैतादृशः
अप्रतिहताज्ञः सुखी अपरिच्छिन्नसुखः। शिवमिति व्याख्यातं प्राक्।।३८।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) वाराहीक्रमो नाम
सप्तमः खण्डः सम्पूर्णः ।।७।।
इस प्रकार वार्त्ताली की आराधना का सम्पूर्ण विवरण यहाँ तक
दिया गया है।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का वाराहीक्रम नामक सप्तम खण्ड परिपूर्ण ।।७।।
।। शुभं भूयात् ।।