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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 226

१८४ परशुरामकल्पसूत्रम्
षडङ्गन्यासजालक्रमं च विवृणोति
देव्यङ्गन्यस्तषडङ्गपञ्चाङ्गाः ।।२२।।
षडङ्गमन्त्राः
१. ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि हृदयाय नमः।
२. ऐं ग्लौं वाराहि शिरसे स्वाहा।
३. ऐं ग्लौं वराहमुखि वराहमुखि शिखायै वषट्।
४. ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः कवचाय हुम्।
५. ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः नेत्रत्रयाय वौषट्।
६. ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः अस्त्राय फट्।
पञ्चाङ्गन्यासमन्त्रा ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि इत्यादयः पूर्वोक्ताः। तैर्देव्या-
स्तत्तदङ्गेषु न्यासं भावयेत् ।।२२।।
माँ वार्त्ताली के अङ्गों में मन्त्रन्यास का भावन करना चाहिये। षडङ्गन्यास
मन्त्र मैने ऊपर लिख दिया है। पञ्चाङ्गन्यास क्रमशः अङ्गुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा,
अनामिका और कनिष्ठिका में भावित करना चाहिये। 'अन्धे अन्धिनि' से 'स्तम्भे
स्तम्भिनि' तक 'ऐं ग्लौं' लगाकर 'अङ्गुष्ठाभ्यां नमः' आदि का प्रयोग करना
चाहिये।।२२।।
अथ षोडशोपचारपदार्थकथनपूर्वकं तावतामर्पणं विधत्ते
पाद्यार्घ्याचमनीयस्नानवासोगन्धपुष्पधूपदीपनीराजनच्छत्रचामर-
दर्पणरक्षाचमनीयर्नैवेद्यपानीयताम्बूलाख्यषोडशोपचारक्लृप्त्यन्ते ।।२३।।
षडङ्ग-पञ्चाङ्ग न्यास के अनन्तर षोडशोपचार पूजन करना चाहिये। जैसे
पाद्यमन्त्र—'ऐं ग्लौं पाद्यं कल्पयामि नमः' बनता है, इसी तरह सभी उपचारों
में 'ऐं ग्लौं' जोड़कर अन्त में 'कल्पयामि नमः' लगाने से मन्त्र बन जाते हैं।
इन उपचार वस्तुओं को माँ के समक्ष श्रद्धापूर्वक प्रस्तुत कर परमानन्द का
अनुभव करना चाहिये।।२३।।