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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 320 में से

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पृष्ठ 223

अनन्तनालाय नमः। इन मन्त्रों से चक्रमध्य की पूजा करनी चाहिये। तदुपरान्त
पुनः निम्नलिखित आठ मन्त्रों से पूजा करनी चाहिये। वे मन्त्र इस प्रकार बनते
हैं—९. ऐं ग्लौं धर्माय नमः। १०. ऐं ग्लौं ज्ञानाय नमः। ११. ऐं ग्लौं वैराग्याय
नमः। १२. ऐं ग्लौं ऐश्वर्याय नमः। इन मन्त्रों से अग्नि, नैऋत्य, वायव्य और
ईशान कोणों में पूजा करनी चाहिये। तदुपरान्त १३. ऐं ग्लौं अधर्माय नमः।
१४. ऐं ग्लौं अनैश्वर्याय नमः। १५. ऐं ग्लौं अवैराग्याय नमः। १६. ऐं ग्लौं
अनैश्वर्याय नमः इन मन्त्रों से पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में पूजा
करनी चाहिये। यह पीठपूजा कहलाती है।।१६।।
चक्रमनुमाह
'त्रिपञ्चषडदलाष्टकशतसहस्रारपद्मासनाय नमः' इति चक्र-
मनुना चक्रमिष्ट्वा ।।१७।।
इस सूत्र में साम्राज्ञी कोलमुखी, जो विन्दु में विराजमान हैं, उनके सान्निध्य
में उल्लसित चक्र रूप देवशक्ति-प्रतीक रूप जो निर्मिति है, उसका क्रमिक
उल्लेख भीतर से बाहर की ओर किया गया है। यही चक्रमन्त्र कहलाता है।
इससे चक्र पर पुष्प अर्पित करना चाहिये। वृत्ति में केवल निबन्धकार का खण्डन
है। सूत्र से उसका कोई सम्बन्ध नहीं।।१७।।
ततो मण्डलादीनां यजनम्
वह्निमण्डलाय, सूर्यमण्डलाय, सोममण्डलाय नमः, इति त्रयो
गुणमन्त्राः। आत्ममन्त्राश्चत्वारः। इति सप्तविंशतिकमिदं पीठे
वरिवसनीयम् ।।१८।।
अत्र सोममण्डलाय नम इत्यन्तं मन्त्रत्रयम्। सं सत्त्वाय नमः, रं रजसे
नमः, तं तमसे नमः, इति गुणमन्त्राः। आं आत्मने नमः, अं अन्त-रात्मने
नमः, पं परमात्मने नमः, हीं ज्ञानात्मने नम इति आत्ममन्त्राश्चत्वारः। इत्थं
च स्वर्णप्राकारायेत्यारभ्य सप्तविंशतिः, तैः पीठपूजा कार्येत्यर्थः।।१८।।
इस सूत्र में तीन प्रकार के मन्त्र हैं—
१. तत्त्वमन्त्र—१. ऐं ग्लौं वह्निमण्डलाय नमः। २. ऐं ग्लौं सूर्यमण्डलाय नमः
और ३. ऐं ग्लौं सोममण्डलाय नमः। ये मण्डल तीन हैं।