परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ परशुरामकल्पसूत्रम्
२. गुणमन्त्र—१. सं सत्त्वाय नमः। २. रं रजसे नमः। ३. तं तमसे नमः।
ये गुणमन्त्र भी तीन ही हैं।
३. आत्ममन्त्र—यें चार हैं, १. आं आत्मने नमः, २. अं अन्तरात्मने नमः।
३. पं परमात्मने नमः। ४. ह्रीं ज्ञानात्मने नमः। इस प्रकार ‘स्वर्णप्राकाराय
नमः’ इस १६वें सूत्र से इस अठारहवें सूत्र तक सप्तविंशति मन्त्रों से इस
सप्तविंशतिक पीठ की पूजा करने का निर्देश सूत्रकार ने दिया है। इसी
क्रम से पूजा होनी चाहिये।।१८।।
हौं प्रेतपद्मासनाय सदाशिवाय नम इति चक्रोपरि देव्यासन-
विमृष्टिः ।।१९।।
प्रेतरूपं यत्पद्मं तदभिन्नं यदासनं तत् स्वरूपो यः सदाशिवस्तस्मै नम
इति योजना, ब्रह्मा ननु सदाशिवे प्रेतरूपत्वं कथम्। एतदुक्तं ज्ञानार्णवे
पार्वतीप्रश्नोत्तरे—
ब्रह्माविष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः।
पञ्चप्रेता वरारोहे निश्चला एव ते सदा।।
अयमभिप्रायः — ब्रह्मादयः सदाशिवान्ता वामाज्येष्ठादिस्वस्वशक्ति-
रहिताः स्पन्दनेऽप्यशक्ताः सन्तः प्रेततुल्या एवेति। विमृष्टिः कल्पनम्।।१९।।
सदाशिव प्रेतपद्मासनस्वरूप माने जाते हैं। ज्ञानार्णव नामक ग्रन्थ में पार्वती
के प्रश्नोत्तर रूप में भगवान् शिव का कथन दिया गया है। उसके अनुसार “ब्रह्मा
विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः। पञ्चप्रेता वरारोहे निश्चला एव ते सदा”। अर्थात्
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ये पाँचों अपनी-अपनी शक्तियों से रहित
प्रेत माने जाते हैं। शक्तिसमन्वित रहने पर ही अपने कार्य करने में समर्थ होते
हैं। अन्यथा निश्चल ही रहते हैं। इनकी शक्तियाँ क्रमशः वामा, ज्येष्ठा, रौद्री,
अम्बिका और सदाशिवा मानी जाती हैं। इस विचार के पहले ही बिन्दुरूप देवी
के आसन पर ‘ऐं ग्लौं प्रेतपद्मासनाय सदाशिवाय नमः’ मन्त्र से देवी के प्रति
आस्थावान् होकर अभ्यर्थना करनी चाहिये।।१९।।
मूर्त्तिकरणीविद्यामाह
लृषाईं वाराहीमूर्त्तये ठः ठः ठः ठः हुं फट् इति
वाग्ग्लौमादिग्लौंवागन्ता मूर्त्तिकरणीविद्या ।।२०।।