परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ परशुरामकल्पसूत्रम्
तत्त्वन्यासमाह
पूर्वोक्तानष्टखण्डानेकैकश उच्चार्य पूर्वोक्तेषु स्थानेषु 'ह्रां'
शर्वाय क्षितितत्त्वाधिपतये' 'ह्रीं' भवाय अम्बुतत्त्वाधिपतये, ह्रुं रुद्राय
वह्नितत्त्वाधिपतये' 'हैं' उग्राय वायुतत्त्वाधिपतये' 'ह्रौं' ईशानाय
भानुतत्त्वाधिपतये, 'सौ' महादेवाय सोमतत्त्वाधिपतये, 'हं' महादेवाय
यजमानतत्त्वाधिपतये' 'औं' भीमाय आकाशतत्त्वाधिपतये नम इति
तत्त्वन्यासः ॥१३॥
पूर्वोक्तानेकत्रिंशत्सप्तेत्यादिना खण्डितान् अष्टखण्डान् पादादि-
जान्वित्यादिस्थानेषु सर्वत्र। तत्त्वाधिपतये एतदनन्तरं 'नमः' इति पदस्यानुषङ्गेण
योगः। इति तत्त्वन्यासः ॥१३॥
१. पादादिजानुपर्यन्त ५. हृदयादिकण्ठपर्यन्त
२. जान्वादिकटिपर्यन्त ६. कण्ठादिभ्रूमध्यपर्यन्त
३. कट्यादिनाभिपर्यन्त ७. भ्रूमध्यादिललाटपर्यन्त
४. नाभ्यादिहृदयपर्यन्त ८. ललाटादिमौलिपर्यन्त
इन आठ स्थानों में मूल मन्त्र के आठ भागों के साथ सूत्रोक्त ह्रां ह्रीं
ह्रुं हैं ह्रौं सों हं औं बीजों के साथ वाले मन्त्रों को भी बोलकर ऊपर निर्दिष्ट
आठ स्थानों में न्यास करना चाहिये। जैसे प्रथम पूरा मन्त्र 'ऐं ग्लौं ऐं नमो
भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि वाराहि वाराहि वराहमुखि वराहमुखि ह्रां शर्वाय
क्षितितत्त्वाधिपतये पादादिजानुभागे नमः' बोलकर उस अङ्गभाग का स्पर्श करना
चाहिये। इसी तरह मूलविद्या के शेष सात खण्डों को बोलकर सूत्रोक्त मन्त्रों के
साथ क्रमिक अङ्गभागों का न्यासरूप स्पर्श करना चाहिये। जैसे दूसरा मन्त्र भी
इस प्रकार बनाना चाहिये—'ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि ह्रीं भवायाम्बुतत्त्वाधिपतये
नमः' मन्त्र बोलकर जान्वादिकटिपर्यन्त का स्पर्श कर अम्बुतत्त्व का न्यास करना
चाहिये। इसी तरह उक्त स्थानों में वह्नि, वायु, सूर्य, सोम, यजमान और आकाश
तत्त्वों का न्यास शेष मन्त्र बनाकर करना चाहिये ॥१३॥