परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० परशुरामकल्पसूत्रम्
विरहः। दलमाने शास्त्रीयनियमाभावश्च सूचितः। तथापि तत् शारदातिलका-
दुद्ग्राह्य एव यन्त्रनिर्माणक्रमः प्रवेशरीत्या, बिन्दुचक्रस्य चरमपाठात्। शेषं
स्पष्टम् ।। १५ ।।
सामने ही फलक होना चाहिये, जिसमें चक्र की रचना की जा सके।
चक्र का फलक कपास के वस्त्र कौशेय, स्वर्ण, रजत, ताम्र या चन्दन का होना
चाहिये। देखने में वह आकर्षक होना चाहिये। सूत्र में जो विधि निर्दिष्ट है, वह
प्रवेश क्रम से है क्योंकि बिन्दु का उल्लेख सूत्र के अन्त में आया हुआ है।
इसकी रचना के क्रम में सर्वप्रथम चतुरस्र का निर्माण करना चाहिये। ये तीन
एक पर एक बनते हैं। उसके भीतर वृत्त में एक हजार दल वाला कमल, उसके
भीतर शतपत्र, उसके भीतर अष्टपत्र, उसमें षट्कोण, उसमें त्रिकोण और उसमें
बिन्दु की रचना कर लेने पर यन्त्र तैयार हो जाता है। इसे ही वाराही चक्र
कहते हैं।। १५ ।।
चक्रनिर्माणानन्तरं चक्रकर्त्तव्यमाह
तत्र कुसुमाञ्जलिं विकीर्य स्वर्णप्राकाराय सुधाब्धये वराहद्वीपाय
वराहपीठाय नमः। आं आधारशक्तये कुं कूर्माय, कं कन्दाय नमः,
अं अनन्तनालाय नम इति च धर्मादिभिः सह षोडशमन्त्रैः पीठे
अभ्यर्च्य ।। १६ ।।
तत्र चक्रे। स्वर्णप्राकारादयः चतुर्थ्यन्ताः। अष्टौ नमोऽन्ता मन्त्राः। तैः
पीठमध्यपूजनं, धर्मादिचतुर्भिः, अधर्मादिचतुर्भिश्च गणपतिक्रमे कॢप्तस्थाने
पूजनं, मिलित्वा षोडशभिः पीठपूजनं भवति। पीठपदेन देवतायतनं
चक्रमेव ।। १६ ।।
पूजा के उद्देश्य से यागगृह में प्रवेश करते समय चक्र पर पुष्पों भरी
अञ्जलि के द्वारा फूल अर्पित करना उचित है। इसके बाद सोलह मन्त्रों से उसकी
पूजा होनी चाहिये। सोलह मन्त्र इस प्रकार उच्चरित करना चाहिये।
१. ऐं ग्लौं स्वर्णप्राकाराय नमः। २. ऐं ग्लौं सुराब्धये नमः। ३. ऐं ग्लौं
वराहदीपाय नमः। ४. ऐं ग्लौं वराहपीठाय नमः। ५. ऐं ग्लौं आधारशक्तये नमः।
६. ऐं ग्लौं कूं कूर्माय नमः। ७. ऐं ग्लौं कं कन्दाय नमः। ८. ऐं ग्लौं अं