परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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देवीध्यानम्
मूलेन सर्वेण व्यापकं कृत्वा देवीं ध्यात्वा ।।१४।।
ध्यानं सूत्रे वक्ष्यमाणं, तन्त्रान्तरप्रसिद्धध्यानश्लोकरीत्याऽपि ज्ञेयम्।
ध्यानश्लोको यथा—
पाथोरुहपीठगतां पाथोरुहमेचकां कुटिलदंष्ट्रां।
कपिलाक्षित्रितयां घनकुचकुम्भां प्रणत वाञ्छितवदान्याम्।
दक्षोर्ध्वतोऽरिखड्गां मुसलमभीतिं तदन्यतस्तद्वत्
शङ्खं खेटं हलवरान् करैर्दधानां स्मरामि वार्त्तालीम्।।
अत्र अरिः चक्रम्। दक्षोर्ध्वत ऊर्ध्वमारभ्य। तद्वद् वामेऽप्यूर्ध्व-
मारभ्यैव ।।१४।।
इसी सातवें खण्ड के आगामी २४वें सूत्र में माँ वार्त्ताली का ध्यान वर्णित
है। सर्वप्रथम पूरा मन्त्र पढ़कर व्यापक विधि पूरी करनी चाहिये। उसके बाद
ही ध्यान करना चाहिये। यों तो २४वें सूत्र में ध्यान का उल्लेख है, फिर भी
तन्त्रान्तरोक्त मन्त्रों द्वारा ध्यान करने में कोई हर्ज नहीं। उक्त श्लोक-सूत्रानुसार
ही विरचित है। माँ नीलकमल के समान आकर्षक श्यामवर्ण से विभूषित है
और कमलासन पर ही अधिष्ठित है। उसकी दंष्ट्रा टेढी है, आँखें पिंगलवर्णी
हैं, माता के वक्ष पर वात्सल्य के प्रतीक कुचकुम्भ शोभित हैं। प्रणत की प्रार्थना
तुरत पूरी करने के लिये प्रसिद्ध हैं। माँ दाहिने हाथ में खड्ग और चक्र धारण
करती हैं। मुसल और अभयमुद्रा में हैं। इसी तरह बाँयें में भी ऊपर से नीचे
तक शङ्ख, खेटक, हल और वर मुद्रा धारण करती हैं। ऐसी महिमामयी माँ
वार्त्ताली का मैं श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा हूँ।।१४।।
चक्रनिर्माणम्—
पुरतः पटपट्टसुवर्णरजतताम्रचन्दनपीठादिनिर्मितं दृष्टिमनोहरं
चतुरस्रत्रयं सहस्रपत्रशतपत्राष्टपत्र-षडस्रपञ्चास्रत्र्यस्रबिन्दुलक्षणं
कोलमुखीचक्रं विरच्य ।।१५।।
पटतूलमयः। पट्टः कौशेयः। पीठं फलकम्, आदिपदेन नवरत्न-
परिग्रहः। तेषु निर्मितं दृष्टिमनोहरमित्यनेन दलानां कोणानां च मानवैषम्य-