परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ परशुरामकल्पसूत्रम्
'ऐं ग्लौं जम्भिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः'।
'ऐं ग्लौं मोहिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः'।
'ऐं ग्लौं स्तम्भिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः'।
इन मन्त्रों में पूजयामि और नमः के बीच में तर्पयामि लगाने की भी
परम्परा है॥२६॥
अथ द्वितीयावरणपूजामाह
पञ्चारे अन्थिनी-रुन्धिन्यौ ताश्च ।।२७।।
पञ्चारे पञ्चकोणेषु अन्थिनीरुन्धिन्यौ। ताश्च जम्भिन्यादयः, त्रयश्च मन्त्राः
पूर्वोक्ता ग्राह्याः। मन्त्रस्वरूपम्—'ऐं ग्लौं अन्थिनि नमः अन्थिनीश्रीपादुकां
पूजयामि' क्रमः पूर्ववद् इति द्वितीयावरणम् ।।२७।।
दूसरा आवरणपूजा-स्थान पञ्चकोण माना जाता है। पञ्चकोण की संरचना
बड़ी आकर्षक होती है। रेखाओं के परस्पर कटाव और कोणों की स्वतः निर्मिति
में ब्रह्माण्डीय रहस्यमयता के दर्शन होते हैं।
उस रहस्य-शक्ति की पूजा इस आवरण में भी की जाती है। इन पाँच
शक्तियों की पूजा के सन्दर्भ में अन्थिनी, रुन्धिनी, जम्भिनी, मोहिनी और
स्तम्भिनी की पूजा का विधान है। वृत्ति में मन्त्र स्वरूप इस प्रकार दिया गया
है 'ऐं ग्लौं अन्थिनि नमः अन्थिनीश्रीपादुकां पूजयानि नमः'। इसी तरह क्रमशः
स्तम्भिनी पर्यन्त मन्त्र का ऊहन कर लेना चाहिये। स्तम्भिनी मन्त्र, जैसे—'ऐं
ग्लौं स्तम्भिनि नमः स्तम्भिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः' बनेगा। पूजयामि और नमः
के बीच में तर्पयामि भी लगाते हैं। इस प्रकार द्वितीयावरण की पूजा पूरी होती
है॥२७॥
तृतीयावरणपूजामाह
षट्कोणे आक्षाईं ब्रह्माणी, ईलाईं माहेश्वरी ऊहाई कौमारी,
ॠसाईं वैष्णवी, ऐशाईं इन्द्राणी, औवाईं चामुण्डा, तस्यैवाग्रेषु मध्ये
च यमरयूं यां यीं यूं यैं यौं यः याकिनि जम्भय जम्भय मम
सर्वशत्रूणां त्वग्धातुं गृह्ण गृह्ण अणिमादि वशं कुरु कुरु स्वाहेति।