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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 225

वाराहीक्रमः १८३
'वाग्ग्लौं' आदौ यस्यां, ग्लौं वागन्ते यस्यां, मध्यतनवर्णानाम् ईदृशी
मूर्तिकरणीविद्येत्यर्थः। एतेन आसनकल्पनानन्तरं मूर्तिकल्पनविधिरुन्नेयः।
मन्त्रस्वरूपम्—‘ऐं ग्लौं लृषाईं वाराहीमूर्त्तये ठः ठः ठः ठः हुं फट् ग्लौं ऐं'
इति॥२०॥
इस सूत्र में मूर्तिकरणी विद्या का निर्देश है। पहले आसन की कल्पना
के बाद मूर्तिकल्पन विद्या का प्रयोग करना चाहिये। इस विद्या के आदि मे
'ऐं ग्लौं' का प्रयोग पहले तथा अन्त में इसी का विपर्यय अर्थात् 'ग्लौं ऐं'
करना चाहिये। मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार मन्त्रप्रयोग से अनुभूत होता है—
'ऐं ग्लौं लृषाई वाराहीमूर्त्तये ठः ठः ठः ठः हुं फट् ग्लौं ऐं'। आस्थापूर्वक
मन्त्र का प्रयोग करने पर चक्र में एक चमत्कार उन्मिषित होता हुआ-सा
अनुभूत होता है॥२०॥
आवाहनादि मुद्राबन्धनम्
मूलविद्यया आवाहनसंस्थापनसन्निधापनसन्निरोधनसम्मुखी-
करणावकुण्ठनवन्दनधेनुयोनीर्बद्ध्वा ॥२१॥
मूलविद्यामुच्चार्य तत्तन्मुद्रां बध्वा दर्शयन् तं तमर्थं भावयेद् इति भावः।
आवाहनादि मुद्राबन्धप्रकारः प्रसिद्धः। यावत्यो मुद्रा विहितास्तावतीषु मुद्रासु
बध्यमानासु तावद्वारं मूलमावर्त्तयेत्। न तु सकृन्मूलमुच्चार्य सर्वमुद्राबन्धनम्।
इति ज्ञेयम् ॥२१॥
मूलविद्या का उच्चारण कर उन मुद्राओं के बन्ध का प्रदर्शन करना
चाहिये। साथ ही उन मुद्राओं का उन बन्धों के साथ भावन भी करना चाहिये।
सूत्रकार ने सारी मुद्राओं का परिगणन सूत्र में कर दिया है। वे इस प्रकार हैं—
१. आवाहन, २. संस्थापन, ३. सन्निधापन, ४. संनिरोधन, ५. सम्मुखीकरण,
६. अवकुण्ठन, ७. वन्दन, ८. धेनु और ९. योनि। वृत्ति में तन्त्रों के उद्धरण
हैं। इनसे पढ़कर ये बन्ध नहीं बन पाते। गुरुदेव से इन्हें अभ्यासपूर्वक सीखना
चाहिये। इन सारी मुद्राओं के बनाने के लिये पुस्तकों का आश्रय लेने से अच्छा
सीखना ही है॥२१॥