परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ देव्या ध्यानप्रकारमाह
ध्यानं देव्या मेघमेचका कुटिलदंष्ट्रा कपिलनयना घनस्तन-
मण्डला चक्रखड्गमुसलाभयशङ्खखेटकहलवरपाणिः पद्मासीना
वार्त्ताली ध्येया।। २४।।
तथा च षोडशोपचारार्पणानन्तरं यावदवकाशमुक्तप्रकारेण मूर्तिं ध्यायेद्
इत्यर्थः। मेघमेचका मेघश्यामला ‘कालश्यामलमेचकाः’ इत्यमरः। कुटिला
(वक्रा) ‘कुटिलं भुग्नं वेल्लितं वक्रमित्यपि’ इत्यमरः। हलं लाङ्गलम् ।। २४।।
षोडशोपचार पूजन के उपरान्त माँ वार्त्ताली का ध्यान करना चाहिये। ध्यान
का श्लोक इसी क्रम के सूत्र १४ में लिखा गया है। वहीं से देखकर श्रद्धापूर्वक
ध्यान में तसल्ली होने से माँ की अनुकम्पा प्राप्त होती है।। २४।।
देवीतर्पणम्
दशधा तस्यास्तर्पणं कुर्यात् ।।२५।।
तर्पणमन्त्रे कोलमुखीति मूलमन्त्रान्ते योज्यम्, न तु वाराहीमिति।
उत्पत्तिवाक्ये कोलमुखीति श्रवणात् ।।२५।।
तर्पण के मन्त्र से देवी का दश बार तर्पण करना चाहिये। तर्पण के
मन्त्र को मूलमन्त्र से वहीं तक लेना चाहिये, जिसमें कोलमुखि शब्द का प्रयोग
किया गया है। जैसे तर्पण के ‘ऐं ग्लौं सौं नमः भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि
वराहमुखि वराहमुखि श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः’ इस मन्त्र से बाँयें हाथ
में जल लेकर दाहिने हाथ के पुष्प को उसमें डुबाकर देवीं को तृप्त करने के
उद्देश्य से तृप्त करना चाहिये। यही तर्पण का विधान है।।२५।।
अथावरणपूजां वक्तुं प्रारभते
त्र्यस्रे जम्भिनीमोहिनीस्तम्भिन्यः ।। २६ ।।
देव्यग्रकोणमारभ्य प्रादक्षिण्येन ज्ञेयम्। इति प्रथमावरणम् ।।२६।।
त्रिकोण में प्रथमावरण की पूजा होती है। इसमें देवी के अग्रकोण से
आरम्भ कर प्रादक्षिण्य क्रम से पूजन का विधान है। इसका मन्त्र है—