परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
७४ परशुरामकल्पसूत्रम्
३. कमला— प्रथम ऊष्मवर्ण (श्) + द्वितीय अन्तःस्थ (र्) + तुरीय स्वर
(ई) + बिन्दु इन संकेतों से निष्पन्न बीज मन्त्रों १. ऐं, २. ह्रीं और ३. श्रीं
मन्त्रों को त्रितारी कहते हैं। तार ओङ्कार होता है। शाक्त सम्प्रदाय के ये
तीनों तार अर्थात् ओङ्कार ही माने जाते हैं। पहला वाग्भव बीज, दूसरा माया
बीज और तीसरा लक्ष्मी बीज माना जाता है।।८।।
इतः परं श्रीचक्रस्वरूपं तत्साधनद्रव्यं चाह
पुरतः पञ्चशक्तिचतुःश्रीकण्ठमेलनरूपं भूसदनत्रयवलित्रय-
भूपपत्रदिक्पत्रभुवन- भुवनारद्रुहिणारविधिकोणदिक्कोण-त्रिकोण-
बिन्दुचक्रमयं महाचक्रराजं सिन्दूरकुङ्कुमलिखितं चामीकर-कलधौत-
पञ्चलोहरत्नस्फटिकाद्युत्कीर्णं वा निवेश्य ।।९।।
पुरत इत्यस्य निवेश्येत्यन्तेन साकमन्वयः पञ्चशक्तयः शक्तिचक्राणि।
चतुः श्रीकण्ठाः चत्वारि शिवचक्राणि। एषां मेलनम् अभिन्नस्वरूपम्।
भूसदनत्रयं परितश्चतुरस्ररेखात्रयम्। वलित्रयं वृत्तत्रयम्। भूपपत्रं भूपा इति
षोडशसङ्ख्यायाः सङ्केतः। षोडशपत्राणि यस्मिंस्तत्। दिक्पत्रं दिगित्यष्ट-
सङ्ख्या तावन्ति पत्राणि यस्मिंस्तत्। भुवनारं भुवनमिति चतुर्दशसङ्ख्या।
तावदरं तावत्कोणम्। द्रुहिणारं दशकोणम्। विधिकोणम् इति विख्यातप्रायम्।
दिक्कोणं त्रिकोणं, बिन्दुचक्रमयम्। मयमित्यनेन समष्ट्येकरूपत्वं ज्ञापितम्।
महाचक्रराजं श्रीचक्रस्य नाम सिन्दूरं कुङ्कुमं लिखितम्। चामीकरं सुवर्णं,
कलधौतं रौप्यम्, पञ्चलोहं रौप्यं, सुवर्णं, ताम्रम्, लौहम्, पित्तलम्) रत्नानि
मरकतादीनि स्फटिकाद्युत्कीर्णं पूर्वोक्तानुसारं निर्मितम् ईदृशं चक्रराजं पुरतो
निवेश्य ।।९।।
महाचक्रराज श्रीचक्र को कहते हैं। श्रीचक्र में ही शक्तिचक्रैकनायिका
श्रीललिताम्बा की उपासना की जाती है। शक्तिचक्र और शिवचक्र दोनों श्रीचक्र
में शाश्वत उल्लसित हैं। सूत्रकार ने सरलरूप से सबके स्वरूप का निर्देश दिया
है। इसे पूजा-क्रम में नित्य सूत्रानुसार निर्माण करने का भी संकेत है और
पञ्चलौह या स्फटिकादि पर बने सिद्ध यन्त्रों पर भी पूजा का आदेश यह सूत्र
देता है। उसके स्वरूप की रचना की सूचना श्रीचक्रस्थित निम्न बिन्दुओं के
अनुसार समझी जा सकती है—
श्रीक्रमः ७५
१. पाँच शक्तिचक्रों और २. चार श्रीकण्ठ-चक्रों का मेलन, ३.
भूसदनत्रय, ४. वलित्रय, ५. भूपपत्र, ६. दिक्पत्र, ७. भुवनार, ८. द्रुहिणार,
९. विधिकोण, १०. दिक्कोण, ११. त्रिकोण और १२. बिन्दु-चक्र।
इन बारह बिन्दुओं का जानकार श्रीचक्र का निर्माण कर लेता है। जहाँ
सूत्रकार ने इसे महाचक्रराज की संज्ञा से विभूषित किया है, वहीं ब्रह्माण्डपुराण
इसे शिव और शिवा श्रीललिताम्बा का सामरस्यमय विग्रह कहता है। संक्षेप में
इसे चार भागों में भी बाँटकर समझ सकते हैं—१. चार शिवचक्र, २. पाँच
शक्तिचक्र ३. नौ चक्र (भूपूर, तीन वलय, सोलह दल, दिक् (आठ) दल,
भुवनार (चौदह कोण), द्रुहिण (दश) कोण, विधि कोण, पुनः दिक् (आठ)
कोण, त्रिकोण) और चौथा भाग बिन्दु-चक्र। १-२ चार शिवचक्र और पाँच
शक्तिचक्रों को मिलाकर नव-योनि-चक्र भी कहते हैं। ३-नौ चक्र, चार अधोमुख
और पाँच ऊर्ध्वमुख त्रिकोण मिलकर नौ होते हैं—
१. भूपूर— चार द्वारों से शोभित तीन भूपूर निर्मित किये जाते हैं।
२. तीन वलय— तीन वृत्तरेखायें बनायी जाती हैं।
३. भूप— सोलह और पत्र अर्थात् दल। इसके अनुसार षोडशदल कमल का
निर्माण।
४. दिक्पत्र— (दिक् = आठ) अर्थात् अष्टदल कमल।
५. भुवनार— भुवन अर्थात् चौदह और अर अर्थात् कोण इसके अनुसार चौदह
कोण बनते हैं।
६. द्रुहिण अर्थात् प्रजापति के आधार पर दश संख्या अर्थात् दशार कोण रचना
भी आवश्यक है।
७. विधि शब्द भी दश अर्थ में ही प्रयुक्त होता है।
८. दिक् शब्द चौथे बिन्दु पर व्याख्यात है।
९. त्रिकोण। ये नौ चक्र श्रीचक्र के विशिष्ट अङ्ग हैं।
अन्तिम चक्र बिन्दुमय चक्र है। यह केन्द्र में शाश्वत उल्लसित रहता है।
मह-धातु उत्सव और पूजा परक है। इस आधार पर ही श्रीचक्र उत्सवमय और
चरम अर्चनीय महाराज चक्र है। सिन्दूर और कुङ्कुम दोनों को मिलाकर अथवा
७६ परशुरामकल्पसूत्रम्
भूमि पर लिखते समय कुङ्कुम से और अन्यत्र सिन्दूर से भी लिखते हैं। इतना
वर्णन नित्य निर्मातव्य श्रीचक्र का है। सिद्ध यन्त्र सोने, चाँदी, ताँबा, पीतल
और लोह आदि तथा रत्न और स्फटिक पर भी उत्कीर्ण होते हैं। ऐसे चक्र
को पूजा के समय आगे रखना अनिवार्यतः आवश्यक है॥१९॥
ततो मन्दिराद्यर्चनक्रममाह
तत्र महाचक्रे अमृताम्भोनिधये रत्नद्वीपाय नानावृक्षमहोद्यानाय
कल्पवृक्षवाटिकायै, सन्तानवाटिकायै हरिचन्दनवाटिकायै मन्दार-
वाटिकायै पारिजातवाटिकायै कदम्बवाटिकायै पुष्परागप्रकाराय
पद्मरागरत्नप्रकाराय, गोमेधरत्नप्रकाराय वज्ररत्नप्राकाराय वैदूर्य-
रत्नप्राकाराय इन्द्रनीलरत्नप्राकाराय मुक्तारत्नप्राकाराय मरकत-
रत्नप्राकाराय विद्रुमरत्नप्राकाराय माणिक्यमण्डपाय सहस्र-स्तम्भ-
मण्डपाय अमृतवापिकायै आनन्दवापिकायै विमर्शवापिकायै
बालातपोद्गाराय चन्द्रिकोद्गाराय महाशृङ्गारपरिघायै महापद्माटव्यै
चिन्तामणिगृहराजाय पूर्वाम्नायमयपूर्वद्वाराय, दक्षिणाम्नायमय-
दक्षिणद्वाराय, पश्चिमाम्नायमयपश्चिमद्वारायोत्तराम्नायमयोत्तरद्वाराय
रत्नप्रदीपवलयाय, मणिमयमहासिंहासनाय ब्रह्ममयैकमञ्चपादाय
विष्णुमयैकमञ्चपादाय रुद्रमयैकमञ्चपादाय ईश्वरमयैकमञ्चपादाय
सदाशिवमयैकमञ्चफलकाय हंसतूलतल्पाय हंसतूलमहोपधानाय
कौस्तुभास्तरणाय महावितानकाय महाजवनिकायै नम इति
चतुश्चत्वारिंशन्मन्त्रैस्तत्तदखिलं भावयित्वा अर्चयित्वा ।।१०।।
तत्र यागमन्दिरे स्थिते महाचक्रे। अमृताम्भोनिधिः अमृतसमुद्रः।
रत्नमयो द्वीपो वासयोग्यो देश उन्नतभूमिरिति यावत्। उद्यानं क्रीडावनं,
वृक्षवाटिका उपवनम्। कल्पादीनि सुरतरुनामानि। पुष्परागादि-विद्रुमान्ता
रत्नभेदाः। तेषां प्राकारः परितो गृहाद्बहिर्निर्मितभित्तिः। माणिक्यं पद्मरागः तस्य
मण्डपः। वापी दीर्घिका। उद्गारो लोहितवर्णं समाह्लादकं वस्तु। रत्नमयाः
प्रदीपास्तेषां वलयम्। हंसतूलं पक्षिविशेषस्य पक्षाधःस्थितरोममालाऽऽकृति-
श्रीक्रमः ७७
सूक्ष्मपक्षाः। महोपधानं कौस्तुभास्तरणं रक्तवर्णं तल्पोपरि तन्मालिन्याभावार्थं
सूक्ष्मं वस्त्रं पात्यते। वितानम् ऊर्ध्वदेशान्मृत्तिकादिपात-प्रतिबन्धकमुपरि
बध्यमानं वस्त्रम्। एवं चतुर्थ्यन्तैः सर्वैर्नमोयोगः। एतैश्चतुश्चत्वारिंशन्मन्त्रै-
र्मन्त्रवाच्यानर्थान् आदौ श्रीचक्रे परिभाव्य तेषां पूजनं कुर्यात्। एकस्य ध्यानं
ततोऽर्चनं ततोऽपरस्य ध्यानं, ततस्तस्यार्चनम् इति क्रमः। तत्तदिति
पदस्वारस्यात् लब्धः ॥१०॥
तत्र अव्यय का प्रयोग यहाँ यागमन्दिर अर्थ में हुआ है। उसमें ही यह
महाचक्र प्रतिष्ठापित है। उसमें ४४ चतुर्थ्यन्त तत्त्व पदार्थ विद्यमान हैं। उन सबके
साथ नमः अव्यय का योग आवश्यक है। इसके योग से सभी मन्त्रवत् हो जाते
हैं। इन ४४ मन्त्रों से चौवालिस तत्त्व पदार्थों और उनके अस्तित्व का भावन
करते हुए श्रीललिताम्बा के अङ्गभूत होने के कारण इनकी पूजा भी करनी
चाहिये। इन चौवालिस के स्वरूपों का क्रमशः अर्थसहित भावन अनिवार्यतः
आवश्यक है। जैसे अमृताम्भोनिधि से अमृत समुद्र का भावन वहाँ होता है,
उसी तरह रत्नद्वीप से रत्नों का भी भावन होता है, अर्थात् अत्यन्त रमणीय
वह वासभूमि है। आकर्षक तरुवरों से सुशोभित है। कल्पवृक्ष, सन्तान, हरिचन्दन
और मन्दार चारों कल्पवृक्ष के विविध नाम हैं। वहाँ सभी हैं। उनकी पूजा की
आवश्यकता है। पुष्पराग से लेकर विद्रुम तक रत्नों के भेद हैं। मण्डप तो
माणिक्य का ही बना है। उसमें एकसहस्र स्तम्भ हैं। अमृत की उसमें वापी
की भी प्रतिष्ठा है। इसके अतिरिक्त आनन्द और विमर्श की बावलियाँ भी उसमें
लहराती हैं। बालातप, चन्द्रिका आदि के उद्गार रूप लालवर्ण के आह्लादक पदार्थ
भी नमस्कार के योग्य हैं। महाशृङ्गार-परिघा, महापद्माटवी चिन्तामणिमन्दिर
पूर्वाम्नायरूप-पूर्वद्वार, दक्षिणाम्नायमय दक्षिण-द्वार, पश्चिमाम्नायमय पश्चिमद्वार
और उत्तराम्नायमय उत्तर-द्वार इसमें उल्लिखित हैं। चारों ओर रत्न-प्रदीपों के
वलय हैं। मणिमंय सिंहासन हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिवमयं
मञ्चफलक हैं। हंस की पाँखों के भीतरी रोमजाल से निर्मित रूई की उपधान
है। हंसतूल का ही मसनद विद्यमान है। कौस्तुभ के समान पाटलिमा-मण्डित
आस्तरणरूप चादर है। महावितान तना हुआ है। सुन्दर-सा पर्दा है। ये सभी
पदार्थ आराधक और आराध्य के तादात्म्य के साधक हैं। अतः समान रूप से
.
Wait, let's look at स्र्य: स् + र + य. But why is there a repha?
Wait! In Devanagari, when you type स् + र + य, how does it look? स्र्य.
When you type स् + त् + र + य, how does it look? स्त्र्य.
In स्त्र्य, the र is a diagonal slash on the त्, or on the स्?
In स्त्र्य, it's स् + त्र + य.
Look at char 4: it has स्, then य, and on top of य is a REPHA!
Wait, स् + य with repha = र्स्य? No, repha is pronounced before: र्स्य. But nobody writes र्स्य here.
Wait, why would there be a repha over य?
Wait, look at line 4: चक्रार्चनं चाह -> र्च has that exact same repha!
Look at line 6: चक्रमभ्यर्च्य -> र्च्य has च + य with repha!
Now look at char 4 of प्रथम...:
Does it have स + य with repha?
Wait,
श्रीक्रमः ७९
कामराज और शक्तिबीजों का प्रादक्षिणयेन प्रयोग होना चाहिये। जहाँ क्रम नहीं
उक्त होता है, वहाँ स्वाग्रप्रादाक्षिण्य क्रम ही न्याय्य होता है।।११।।
ततः शोषणादीनात्मशुद्धिहेतूनाह
वाय्वग्निसलिलवर्णयुक्तप्राणायामैः शोषणं सन्दहनमाप्लावनं च
विधाय ।।१२।।
वायुवर्णः यं, अग्निवर्णः रं, सलिलवर्णः वं, वायौ शोषकताशक्तिः।
अतस्तेन शोषणम्। एवमेव अग्निवर्णेन संदहनं, सलिलवर्णेन आप्लावनं च
विधाय। चकारात् पृथ्वीबीजेन काठिन्यसम्पादनं च विधाय। वर्णयुक्तप्राणा-
यामैरित्युक्त्या यमित्युच्चरन् प्राणानभितो नियच्छेत्। ततः शरीरशोषणं
भावयेत् ।।१२।।
वायु, अग्नि और सलिल तत्त्वों के वर्ण-बीज निर्धारित हैं। वायुबीज 'यं'
अग्निबीज 'रं' और वरुणबीज 'वं' माना जाता है। इन बीजों में तत्त्वों के सारे
गुण, सारे बल और तदात्मक सर्व-भाव विद्यमान होते हैं। प्राणायाम करते समय
वायुबीज से प्राण का नियन्त्रण, अग्निबीज से दोषराशि का भस्मीकरण और
आप्लावन से उसे प्रक्षालित कर बाहर प्रक्षिप्त करना चाहिये। कुछ लोग
आप्लावन का अर्थ पिण्डीकरण करते हैं और धराबीज से उसे सुखाते हैं।।१२।।
ततः प्राणायामविधिमाह
त्रिः प्राणानायम्य ।।१३।।
प्राणायामस्तु श्यामाप्रकरणे वक्ष्यमाणप्रकारेण ज्ञेयः ।।१३।।
श्यामा-प्रकरण जो अभी ललिता और ललितानवावरण-पूजा नामक चौथे
और पाँचवें खण्डों के बाद वर्णन का विषय बनाया जायगा, उसी में प्राणायाम
की भी चर्चा है। उसी के अनुसार सूत्रोद्दिष्ट तीन प्राणायाम करने चाहिये।।१३।।
तदुत्तरं विघ्नकृद्-भूतोत्सारणं कार्यमिति तदाह
अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः।
ये भूता विघ्नकर्त्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया।
८० परशुरामकल्पसूत्रम्
इति वामपादपार्ष्णिघातकरास्फोटसमुदञ्चितवक्त्रस्तालत्रयं दत्त्वा
देव्यहंभावयुक्तः स्वशरीरे वज्रकवचन्यासजालं विदधीत ।। ९४ ।।
'अपसर्पन्तु' इति मन्त्रेण पार्ष्ण्या पादपृष्ठभागेन भुवो घातः ताडनं,
करयोः आस्फोटः संघर्षः। समुदञ्चितं तिर्यक्कृतं वक्त्रं मुखम्, एभिः सहेति
शेषः। तालत्रयमधोमुखाभ्यां दक्षमध्यमातर्जनीभ्यां वामकरतले सशब्दं
त्रिराघातः, तं दत्त्वा उत्पाद्य। अहम् उपास्यदेव्यभिन्न इति भावयित्वा। वज्र-
कवचम् अभेद्यकवचरूपं न्यासजालं न्याससमूहं विदधीत ।। ९४ ।।
सूत्र में पूरे श्लोक का पाठ कर दिया गया है। सूत्र की दृष्टि से यह
विलक्षण अन्विति है। इस श्लोक के उच्चारण और पदाघात साथ ही कराघात
से पृथ्वी के उस याग परिवेश के सभी विघ्नकर्त्ता भूत भाग जाते हैं। यह विधि-
सम्मत उपदेश है। ऐसा भगवान् शंकर के आदेशानुसार होता है। विना उनकी
आज्ञा के ये उनके गण हट भी कैसे सकते हैं?
यह श्लोक बोलकर भूतों का अपसारण करने की प्रथा वैदिक तथा
तान्त्रिक दोनों पद्धतियों में अपनायी जाती है। इसके बाद बायें पैर की एड़ी
से आघात करना चाहिये। इसी तरह दाहिने हाथ की मध्यमा और तर्जनी से
वामकरतल पर तीन आघात करने से तीन-तीन अव्यक्त ध्वनि उत्पन्न करनी
चाहिये। इस तरह शब्द का उत्पादन करते समय अपने मुख को पार्श्व की ओर
वक्र कर फेर लेना चाहिये।
इसके बाद यह भावन करना चाहिये कि, मैं अपनी आराध्या माँ से
तादात्म्य भाव से अवस्थित हूँ। उसके अतिरिक्त मेरा कोई अस्तित्व नहीं वरन्
नितान्त अभिन्न हूँ। इस भावना में आविष्ट के सदृश कुछ समय ध्यानावस्थित
हो जाय। इसके बाद इस स्वात्मशरीर में वज्रकवचरूप अभेद्यकवचरूप न्यास
करना चाहिये। न्यास के सम्बन्ध में पुनः आगे चर्चा की जायेगी।। ९४ ।।
किं तन्न्यासजालम् इत्याकाङ्क्षायाम् आदौ करशुद्धिन्यासमाह
बिन्दुयुक् श्रीकण्ठानन्तार्त्तीर्यैर्मध्यमादितलपर्यन्तं कृत-
करशुद्धिः ।। ९५ ।।
श्रीक्रमः ८१
श्रीकण्ठः शिवोऽकारो योगिनीतन्त्रे पञ्चदश्यां श्रीकण्ठदशकमित्यवर्ण-
गणनात्। अनन्तो दीर्घकारस्तन्त्रसारे 'आं ह्रीं क्रों' इति मन्त्रस्य 'अनन्तो
बिन्दुसंयुक्तो मायाब्रह्माग्नितारवान्' इत्युद्धारात्। बिन्दुयुजौ च तौ श्रीकण्ठानन्तौ
तार्तीयो बालातृतीयः 'सौः' इति। एवञ्च 'अं आं सौः' अनेन मन्त्रेण
मध्यमामारभ्य तलपर्यन्तं कृता करशुद्धिर्येन। मध्यमानामाकनिष्ठा-
ङ्गुष्ठतर्जनीकरतलकरपृष्ठेषु न्यसेदित्यर्थः। अयं करशुद्धिन्यासः ।।१५।।
इस सूत्र में कूट शब्दों के माध्यम से बीज-वर्णों का वर्णन किया गया
है। जैसे— बिन्दुयुक्तश्रीकण्ठ 'अं' बिन्दुयुक् अनन्त....................दीर्घ 'आं'
तार्तीय— बाला का तीसरा बीज— 'सौः'।
योगिनीतन्त्र में पञ्चदशी में श्रीकण्ठ शब्द से अवर्ण का ही ग्रहण किया
गया है। इसी तरह श्रीतन्त्रसार नामक ग्रन्थ में 'अनन्त' शब्द से 'आं' यह
बीज-मन्त्र गृहीत किया गया है। ये दोनों इस तरह प्रामाणिक प्रयोग रूप में
मान्य हैं। बाला बीज मन्त्रों का तीसरा बीज 'सौः' स्वीकृत है। इस तरह पूरा
न्यासमन्त्र 'अं आं सौः' बनता है। इस मन्त्र से मध्यमा से आरम्भ कर करतल-
पृष्ठों तक न्यास करने से करशुद्धि हो जाती है। इससे साधक द्वारा हस्त से
सम्पन्न सारी प्रक्रिया दिव्य हो जाती है।।१५।।
आत्मरक्षान्यासमाह
कुमारीमुच्चार्य महात्रिपुरसुन्दरीपदमात्मानं रक्ष रक्षेति हृदये
अञ्जलिं दत्त्वा।।१६।।
कुमारीं बालामुच्चार्य पदमिति वर्णद्वयमपहाय रक्ष रक्षेत्यन्तं पठन् हृदये
अञ्जलिं दत्त्वा। अयमात्मरक्षान्यासः।।१६।।
कुमारी बाला विद्या को कहते हैं। इसमें तीन बीज होते हैं। आगे के
सूत्र में इसका उल्लेख है। माँ (महात्रिपुरसुन्दरि मां रक्ष रक्ष) मेरी रक्षा करो,
मेरी रक्षा करो; यह कहकर हृदय में ही अञ्जलि प्रदान करें। इसे आत्मरक्षा-
न्यास कहते हैं। सूत्र में प्रयुक्त 'पद' का प्रयोग मन्त्र में नहीं करना
चाहिये।।१६।।
मायाकामशक्तीरुच्चार्य देव्यात्मासनाय नम इति स्वस्यासनं
दत्त्वा ।।१७।।
८२ परशुरामकल्पसूत्रम्
माया ह्रीं, कामः क्लीं (देवीभागवते सुदर्शनकथा) अयमेव कामराजः।
शक्तिः सौः (शक्तिः परा तृतीया वा) उच्चार्य उत्त्वा (नमोऽन्तो मनुः)। इत्थं
च 'ह्रीं क्लीं सौः देव्यात्मासनाय नमः' इति मन्त्रेण स्वस्यासनं दत्त्वा (आसने
पुष्पांक्षतान् क्षिपेत्) इत्यात्मरक्षा-दिव्यासनविधिः ।।१७।।
मायाबीज के रूप में 'ह्रीं', कामबीज के रूप में 'क्लीं' और शक्तिबीज
के रूप में 'सौः' शास्त्र में वर्णित बीज-मन्त्र हैं। कामराज बीज के रूप में भी
'क्लीं' को स्वीकार किया गया है। देवीभागवत नामक महापुराण में सुदर्शन-
कथा के प्रसङ्ग में 'क्लीं' को कामबीज के रूप में उद्धृत किया गया है। 'शक्तिः
परा तृतीया वा' इस कोश के द्वारा शक्ति से 'सौः' बीज का ही ग्रहण किया
जाता है।
'योगिनीतन्त्र' द्वारा भी उक्त तथ्य का समर्थन होता है। इस प्रकार 'ह्रीं
क्लीं सौः देव्यात्मासनाय नमः' इस मन्त्र से आसन पर पुष्प और अक्षत का
छिड़काव करना भी आवश्यक माना जाता है। यह आत्मरक्षा और दिव्यासन
विधि की प्रक्रिया साधक उपासक द्वारा अवश्य अपनायी जानी चाहिये।।१७।।
ततः सूत्रद्वयेन चक्रासनादिमन्त्रानुद्धरति
शिवयुग्बालामुच्चार्य श्रीचक्रासनाय नमः, शिवभृगुयुग्बाला-
मुच्चार्य सर्वमन्त्रासनाय नमो भुवनामदनौ ब्लेमुच्चार्य साध्यसिद्धा-
सनाय नम इति चक्रमन्त्रदेवताऽऽसनं त्रिभिर्मन्त्रैश्चक्रे कृत्वा ।।१८।।
शिवो हकारः, तेन युक्ता बाला। बालावर्णाङ्गं हकारः। प्रतिप्रधान-
मङ्गावृत्तिरिति न्यायाद् बाला-वर्णत्रयेऽपि हकारयोगः। इत्थं 'हैं ह्क्लीं ह्सौः
श्रीचक्रासनाय नमः' इत्येको मन्त्रः। शिवो हकारः, भृगुः सकारः, एतदुभय-
युक्ता बाला, 'हसैं, हस्क्लीं हसौः सर्वमन्त्रासनाय नमः' इति द्वितीयो मन्त्रः।
भुवना भुवनेश्वरी (तस्या मन्त्रो मायाबीजरूप एव) तद्यथा— शिवो
हकारः, माया ईकारः, अग्नी रेफः, बिन्दुः प्रसिद्धः ह्रीमिति। 'भुवनेशी च
लज्जा च हृल्लेखा कुलदेवता' इति कोशात्। तथा च 'ह्रीं क्लीं ब्लें साध्य-
सिद्धासनाय नमः' इति तृतीयो मन्त्रः। एवं त्रिभिर्मन्त्रैः क्रमेण चक्रमन्त्रदेवता-
सनानि चक्रे कृत्वा कल्पयित्वेत्यर्थः। अयं चतुरासनन्यास इति कथ्यते ।।१८।।
श्रीक्रमः ८३
शिव 'ह'कार कहलाता है। इससे युक्त बाला मूलमन्त्र के प्रयोग में हकार
बाला बीजाक्षरों का आदि अङ्ग बन जाता है। एक नियम है कि प्रति प्रधान
में अङ्ग का वर्त्तन होना चाहिये। इस न्याय के अनुसार ही यह प्रयोग प्रवर्तित
और प्रचलित है। इस तरह ह + ऐं 'हैं' ह् + क्लीं = ह्क्लीं और
ह् + सौः = ह्सौः ये बीजाक्षर बनते हैं। इन तीनों का उच्चारण कर चक्रासनाय
नमः यह एक मन्त्र बनता है। यह पहला मन्त्र है। दूसरा मन्त्र इस प्रकार बनता
है—शिव अर्थात् 'ह'कार, भृगु अर्थात् 'स'कार और बाला मन्त्र सब मिलाकर
ह्सैं, ह्स्क्लीं और हस्स्रौः बोलें। साथ ही सर्वमन्त्रासनाय नमः कहने से यह
द्वितीय मन्त्र बनता है।
तीसरे मन्त्र का प्रयोग इस प्रकार करते हैं—भुवना भुवनेश्वरी देवी को
कहते हैं। भुवनेश्वरी बीज माया बीज को ही कहते हैं। कोश में भी लिखा है
कि, भुवनेशी, लज्जा, हल्लेखा और कुलदेवता भी शिवमायाग्नि बिन्दुमान् मन्त्र
ही होता है। उसका उद्धार करने पर 'ह्रीं' यही बीज बनता है। यही भुवनेश्वरी
बीज भी कहलाता है। इसके साथ मदन बीज क्लीं और इन दोनों के साथ
'ब्लें' यह बीज लगाकर तीसरा मन्त्र 'ह्रीं क्लीं ब्लें साध्यसिद्धासनाय नमः' इस
रूप में उद्धृत होता है। इन तीनों से क्रमशः चक्रमन्त्र के देवताओं के आसन
का प्रकल्पन किया जाता है। इस प्रकार पहले चक्रासन पुनः मन्त्रासन, इसके
बाद साध्यासन और सिद्धासन मन्त्रों के चार न्यास से इसे चतुरासन न्यास भी
कहते हैं।।१८।।
ततः बालाषडङ्गमाह
बालाद्विरावृत्त्या त्रिद्व्येकदशत्रिद्विसङ्ख्याऽङ्गुलिविन्यासैः
क्लृप्तषडङ्गः ।।१९।।
बालाद्विरावृत्त्या षड्वर्णैर्हृदयादि षडङ्गानि क्रमेण त्र्याद्यङ्गुलिभिः
क्लृप्तानि विन्यस्तानि षडङ्गानि येन ईदृशः। अयमेवार्थः स्पष्टमुक्तो
दक्षिणामूर्तिसंहितायाम्—
'कनिष्ठाङ्गुष्ठरहितैस्त्रिभिस्तु हृदि विन्यसेत्।
मध्यमानामिकाभ्यां तु न्यसेच्छिरसि मन्त्रवित्।।
शिखाङ्गुष्ठेन विन्यस्य दशभिः कवचं न्यसेत्।
हृदुक्तैर्नेत्रविन्यासं विन्यसेत् परमेश्वरि।।
चतुर्थ एवं पञ्चम खण्ड: वाराही एवं श्रीविद्या ललिता त्रिपुरसुन्दरी पूजा-पद्धति
८४ परशुरामकल्पसूत्रम्
तर्जनीमध्यमाभ्यां तु ततोऽस्त्रं विन्यसेत्प्रिये'। इति बालषडङ्ग-
न्यासः ।।१९।।
बाला बीज मन्त्रों को दो बार कहने पर छः बीजाक्षर बनते हैं। इनसे अर्थात्
छः अक्षरों को एक साथ बोलकर हृदय से लेकर अस्त्र पर्यन्त छः अङ्गों पर क्रमशः
तीन, दो, एक, दश, तीन और दो सङ्ख्या की अंगुलियों से न्यास करना चाहिये।
यही तथ्य दक्षिणामूर्तिसंहिता में स्पष्ट रूप से लिखा गया है। मानो इस सूत्र का
भाष्य पहले ही किया गया हो, वह इस प्रकार है—
'कनिष्ठा और अङ्गुष्ठ को छोड़कर तीन अङ्गुलियों से हृदयाय नमः
बोलकर हृदय पर न्यस्त करना चाहिये। शिर पर छः बाला बीज, मध्यमा और
अनामिका दो अङ्गुलियों से न्यास करना चाहिये। मन्त्रवित् पुरुष की यही पद्धति
है। शिखा में केवल अङ्गुष्ठ से न्यास करने के बाद दशों अङ्गुलियों से कवच
न्यास करना चाहिये। भगवान् दक्षिणामूर्त्ति कह रहे हैं कि, परमेश्वरि शिवे! हृदय
न्यास के अनुसार तीनों नेत्रों का न्यास किया जाता है। तर्जनी और मध्यमा
से अस्त्राय फट् मन्त्र न्यास होता है।'
इस प्रकार बालाषडङ्ग न्यास पूरा होता है।।१९।।
अथ वशिन्यादियोगिनीन्यासमाह
सबिन्दूनचो ब्लूमुच्चार्य वशिनीवाग्देवतायै नम इति शिरसि।
सर्वत्र वर्गाणां बिन्दुयोगः। कवर्गं 'कलह्रीं' च निगद्य कामेश्वरी-
वाग्देवतायै नम इति ललाटे। चुं गदित्वा 'न्क्लीं' वाग्देवतायै नम
इति भ्रूमध्ये। टुं भणित्वा 'ब्लूं' विमला-वाग्देवतायै नम इति
कण्ठे। तुं च प्रोच्य 'ज्रीं' अरुणावाग्देवतायै नम इति हृदि। 'पुं'
च 'हस्लव्यूं' उच्चार्य जयिनी-वाग्देवतायै नम इति नाभौ।
यादिचतुष्कं 'झ्म्र्यूं' उच्चार्य सर्वेश्वरीवाग्देवतायै नम इति लिङ्गे।
शादिषट्कं 'क्ष्प्रीं' आख्याय कौलिनीवाग्देवतायै नम इति
मूले ।।२०।।
सबिन्दूनचो बिन्दुयुक्ता अकारादि-विसर्गान्तास्तानुच्चार्य 'नमः' इत्यन्तो
वशिनीमन्त्रः। तथा च 'अं आं...........अं अः ब्लूं वशिनी-वाग्देवतायै नमः'
श्रीक्रमः ८५
इति शिरसि न्यसेत्। कवर्गः सबिन्दुः 'कलहीं' इत्यत्र केवलं व्यञ्जनमात्र-
ग्रहणम्। तथा च 'कं खं गं घं ङं क्ल्हीं कामेश्वरी-वाग्देवतायै नमः' इति
ललाटे न्यसेत्। चुं चवर्गं नम इत्यन्तं मन्त्रं पठित्वा भ्रूमध्ये न्यसेत्। टुं टवर्गं
पूर्ववत्। हसलवर्णे तु व्यञ्जनमात्रग्रहणम्। शेषं स्पष्टम्॥२०॥
यहाँ वशिनी आदि योगिनियों के न्यास का वर्णन किया गया है। ये सभी
वाग्देवता मानी जाती हैं। इनकी संख्या और नाम इस प्रकार हैं—
१. वशिनी, २. कामेश्वरी, ३. मोदिनी, ४. विमला, ५. अरुणा,
६. जयिनी, ७. सर्वेश्वरी, ८. कौलिनी। इनके न्यास के समय सर्वप्रथम अकारादि
सबिन्दु आठों वर्ग, निर्धारित बीजमन्त्र, इनके नाम और नमः लगाकर आठ अङ्गों
का स्पर्श करते हैं। इसका क्रम इस प्रकार समझना चाहिये—
क्र. वर्ग निर्धारित विशेष विशेषण नमः स्थान
सं. बीज नाम
१. अवर्ग (सबिन्दु) ब्लूं वशिनी वाग्देवतायै नमः शिरसि
२. सबिन्दु कवर्ग क्ल्हीं कामेश्वरी वाग्देवतायै नमः ललाटे
३. सबिन्दु चवर्ग न्क्लीं मोदिनी वाग्देवतायै नमः भ्रूमध्ये
४. टुं टवर्ग य्लूं विमला वाग्देवतायै नमः कण्ठे
५. तुं तवर्ग ज्म्रीं अरुणा वाग्देवतायै नमः हृदि
६. पुं पवर्ग हस्ल्व्यूं जयिनी वाग्देवतायै नमः नाभौ
७. यादिचतुष्क झ्म्र्यूं सर्वेश्वरी वाग्देवतायै नमः लिङ्गे
(यं रं लं वं)
८. शादिशट्क क्ष्मीं कौलिनी वाग्देवतायै नमः मूलाधारे
(शं षं सं हं कं क्षं)
इस तरह ये आठ मन्त्र बनते हैं। इन मन्त्रों से योगिनी वाग्देवताओं का
शरीर के आठ मुख्य अङ्गों पर न्यास करना चाहिये। श्रीचक्र-साधना में इस
न्यास का बड़ा महत्त्व है। वाग्देवता ही विश्व-सृष्टि भी मूलाधार है। इसीलिये
इसमें १६ स्वरों २५ स्पर्शवर्णों ४ अन्तःस्थों और ४ ऊष्म वर्णों के साथ
८६ परशुरामकल्पसूत्रम्
२ चक्रेश्वर वर्णों का योग करते हैं। यह पूर्ण वाङ्मय योग है। आठों वाग्देवताओं
के साथ जब ये स्वर और व्यञ्जन शरीर के निर्धारित अवयवों पर न्यस्त होते
हैं, तो उनसे अदृश्य वाग्विद्युत् की रश्मियाँ फूट पड़ती हैं। इस न्यासानुभव
से साधक धन्य हो जाता है॥२०॥
मूलमन्त्रन्यासः
मूलविद्यापञ्चदशवर्णान् मूर्ध्नि मूले हृदि चक्षुस्त्रितये
श्रुतिद्वयमुख-भुजयुगलपृष्ठजानुयुगल-नाभिषु विन्यस्य षोढा चक्रे
न्यस्यान्यस्य वा ।।२१।।
चक्षुस्त्रितयं भ्रूमध्येन सह ज्ञेयम्। श्रुतिद्वयं श्रोत्रद्वयम्। शेषस्थानानि
स्पष्टानि। मूलपञ्चदशवर्णैर्बिन्दुसहितैर्नमोऽन्तैः क्रमेणोक्तपञ्चदशस्थानेषु न्यसेत्।
षोढा षट्प्रकारः। गणेश-ग्रह-नक्षत्र-योगिनी-राशि-पीठभेदेन चक्रन्यासस्तन्त्रा-
न्तरोक्तः। न्यस्यान्यस्य इत्यनेन कृताकृतत्वं सूचितम् ।।२१।।
मूल कादिविद्या के पन्द्रह वर्ण प्रसिद्ध हैं। इसी आधार पर उसे पञ्चदशी
विद्या कहते हैं। इनका न्यास पन्द्रह अङ्गों पर सूत्र के निर्देशानुसार करना चाहिये।
वे पन्द्रह अङ्ग इस प्रकार हैं—
१. मूर्धा (शिर), २. मूल (मूलाधार), ३. हृदय, ४. दक्षनेत्र, ५.
वामनेत्र, ६. भ्रूमध्य, ७, दक्षकर्ण, ८. वामकर्ण, ९. मुख, १०. दाहिना बाहु,
११. वामबाहु, १२. पीठ, १३. दाहिना घुटना, १४. बाँयाँ घुटना, १५. नाभि।
ये १५ अङ्गस्थान माने जाते हैं। इन्हीं पर क्रमशः पञ्चदशी विद्या के बिन्दुसहित
वर्ण न्यस्त करने चाहिये।
यह न्यास छः प्रकार से करने का विधान अन्यान्य तन्त्रों में है। इन
प्रकारों का उद्देश्य उन मुख्य देवों के आनुकूल्य की सिद्धि है। गणपति, ग्रह,
नक्षत्र, योगिनियों, राशियों और पीठों की दृष्टि से ऐसी प्रक्रिया अन्यान्य तन्त्र
स्वीकार करते हैं। सूत्र में वैकल्पिकत्ता की ओर भी सङ्केत है। करें तो श्रेष्ठ,
नहीं करें तो षोढा न्यास न कर केवल चक्रार्चा की दृष्टि से ही न्यास करना
उचित है ।।२१।।
श्रीक्रमः ८७
देवीरूपत्वसिद्धये न्यासानुक्त्वा ततोऽर्चनाङ्गभूतपात्रस्थापनविधिमुपदिशति
शुद्धाम्भसा वामभागे त्रिकोणषट्कोणवृत्तचतुरस्रमण्डलं कृत्वा
पुष्पैैरभ्यर्च्य साधारं शङ्खं प्रतिष्ठाप्य शुद्धजलमापूर्य आदिम-बिन्दुं
दत्त्वा षडङ्गेनाभ्यर्च्य विद्यया अभिमन्त्र्य तज्जलविप्रुड्भिरात्मानं
पूजोपकरणानि च सम्प्रोक्ष्य ।।२२।।
शुद्धाम्भसा इत्यनेन गणपतिपद्धतौ कथितगन्धाक्षतकुसुमसमर्चितत्वं
ज्ञापितम्। शुद्धेन पटपूतेनाम्भसा स्ववामभागे त्रिकोणादिचतुरस्रान्तं
नियमविधिरूपत्वाद् आकाङ्क्षावत्वात् श्यामाक्रमोक्तमत्स्यमुद्रया निर्गमनरीत्या
कृत्वा पुष्पैैरभ्यर्च्य।
आधारशङ्खयोः प्रतिष्ठापने शुद्धजलपूरणे च सन्निहितत्वाविशेषाद्
गणपतिप्रकरणस्थं श्यामाप्रकरणस्थं वा स्वेच्छया कुर्यात्। आदिमबिन्दुसंयोगः
शङ्खजलसंस्कारः। षडङ्गेन षडङ्गमन्त्रैः अग्नीशासुर-वायुकोणेषु षडङ्गदेवता
अभ्यर्च्य। विद्यया पञ्चदश्या। अभिमन्त्र्य अभिमन्त्रणेन संस्कृत्य तज्जलं
संस्कृतजलं तस्य ये विप्रुषो बिन्दवस्तैरात्मानं स्वशरीरं पूजोपकरणानि
गन्धपुष्पप्रथमादीनि च सम्प्रोक्ष्य।।२२।।
शुद्धेन पटरूप शुद्ध जल से ही पूजा का विधान है। यहाँ स्पष्ट उल्लेख
करने का विशिष्ट तात्पर्य गन्धाक्षत-कुसुमांचित वस्त्र से छने हुए जल से है।
वामभाग में अर्थात् श्रीविद्योपासक के अपने ही वामभाग का अर्थ लेना चाहिये।
विधि के अनुसार त्रिकोण, षट्कोण, वृत्त और चतुरस्र मण्डल का श्यामाक्रम
में कहे गये मत्स्यमुद्रा के प्रयोग द्वारा निर्गमन रीति के अनुसार करे और पुष्पों
से उनका पूजन करे।
शङ्ख की प्रतिष्ठा आधार पर करते हैं। ऐसे आधारसहित प्रतिष्ठा करने
के उपरान्त उसे शुद्ध जल से भर देना चाहिये। आदिम बिन्दु के संयोग से
जल का संस्कार हो जाता है। इसके बाद षडङ्गपूजन आवश्यक होता है। यह
पूजन क्रमशः अग्नि, कुबेर, वायु कोणों में षडङ्गमन्त्रों से सम्पन्न किया जाता
है। इन कार्यों के अनन्तर पञ्चदशी विद्या से अभिमन्त्रण कर उसी जल के लघु-
८८ परशुरामकल्पसूत्रम्
लघु विप्रुट्बिन्दुओँ से अपना प्रोक्षण करे। साथ ही साथ पूजा के उपकरणों को
भी प्रोञ्छित करना चाहिये।।२२।।
एवं सामान्यार्घ्यैस्तृप्तिं विधाय विशेषार्घ्यतृप्तिमाह
तज्जलेन त्रिकोणषट्कोणवृत्तचतुरस्रमण्डलं कृत्वा मध्यं
विद्यया विद्याखण्डैस्त्रिकोणं बीजावृत्त्या षडस्रं सम्पूज्य वाचमुच्चार्य
अग्निमण्डलाय दशकलात्मने अर्घ्यपात्राधाराय नम इति प्रतिष्ठाप्य
आधारं प्रपूज्य पावकीः कलाः ।।२३।।
तज्जलेन सामान्यार्घ्योदकेन। मध्यं त्रिकोणमध्यम्। विद्यया समष्टि-
विद्यया। सम्पूज्य इति सर्वत्रानुषज्यते। विद्याखण्डैः कूटत्रयेण त्रिकोणं त्रिकोणं
कोणत्रयम् बीजावृत्त्या कूटत्रयद्विरावृत्त्या। षडस्रं सम्पूज्य। वाचं 'ऐं' इति
(सबिन्दुः ऐकारो वाग्भव इति सिध्यति) रविश्वरो बिन्दुयुक्तो वाग्भवं बीज-
मीरितम् इति बीजकोशः। मन्त्रः 'ऐं अग्निमण्डलाय दशकलात्मने
अर्घ्यपात्राधाराय नमः।' इति नमोऽन्तो मन्त्रः। पावकीः वह्निसम्बन्धिनीः।
कलाः चतुर्थ्यन्तनमोऽन्तैस्तत्तन्नामभिः प्रागादिवृत्तरूपं यजेत् ।।२३।।
सामान्य अर्घ्य के जल से त्रिकोण, षट्कोण, वृत्त और चतुरस्र मण्डल
की विधि से मत्स्यमुद्रा द्वारा निर्गमन कर त्रिकोण मध्य को समष्टिविद्या से अर्चित
करना चाहिये। विद्याखण्ड अर्थात् कूटत्रय से त्रिकोणों की पूजा की जानी चाहिये।
बीजों की आवृत्तिपूर्वक कूटत्रय की दो आवृत्ति से षडस्र की अर्चना भी आवश्यक
मानी जाती है। पुनः वाग्भव बीज 'ऐं' का उच्चारण कर 'अग्निमण्डलाय
दशकलात्मने अर्घ्यपात्राधाराय नमः' इस मन्त्र को बोलने से पूरा मन्त्र बनता है।
इस मन्त्र से प्रतिष्ठा कर आधार की पूजा करनी चाहिये। पावक की दश कलाओं
के चतुर्थ्यन्त नाम के साथ नमः लगाकर उनकी पृथक् पृथक् पूजा करनी
चाहिये।।२३।।
मदनादुपरि सूर्यमण्डलाय द्वादशकलात्मने अर्घ्यपात्राय नम इति
संविधाय पात्रं संस्पृश्य कलाः सौरीः, 'सोममण्डलाय
षोडशकलात्मने अर्घ्यामृताय नमः' इति पूरयित्वा आदिमं
दत्वोपादिममध्यमौ पूजयित्वा विधोः कलाषोडशकम् ।।२४।।
श्रीक्रमः ८९
मदनस्तु चतुरासनन्यासे (सूत्रे) प्रपञ्चितः। शेषं स्पष्टम्। पात्रं पात्रे सौरीः
कलास्तापिन्यादीः संस्पृश्य पूजयित्वा। आदिमं प्रथमं पूरयित्वा उपादिमं द्वितीयं
मध्यमं तृतीयं तत्रैव स्थापयित्वा विधोः कलाषोडशकम् अमृतादि-
पूर्णमृतान्तम् ।।२४।।
मदन कामवाचक शब्द है। आगमिक कोश की दृष्टि से यह मायाबीज
का वाचक कूट शब्द माना जाता है। मायाबीज के विषय में देवीभागवत की
उक्ति इस प्रकार है— ‘शिवमायाग्निबिन्दुमान्’। शिव हकार को कहते हैं। माया
ईकार है। अग्नि रेफ है और बिन्दु प्रसिद्ध अनुस्वार है। सबको मिलाकर ‘ह्रीं’
यह बीजमन्त्र बनता है। इसी को भुवना, भुवनेशी, लज्जा, हृल्लेखा और
कुलदेवता भी कहते हैं। वृत्तिकार ने कहा है कि, ‘प्रकृतेऽपि स एव मदनो
व्याख्यातः।’
किन्तु यह मान्यता प्रकृत सूत्र के अनुकूल नहीं है। मदन के पर्याय वर्ण
चार हैं—१. इ, २. क, ३. उ और ४. क्लीं। इस तरह मदन का प्रस्तुत प्रसङ्ग
में ‘क्लीं’ बीज में ही तात्पर्य है। यही बाला का मध्य बीज भी है। इसलिये
इस सूत्र में क्लीं के बाद ही अर्थात् इस बीज का ही पहले उच्चारण कर सूर्य
मन्त्र बनता है। इस मन्त्र से १२ सौरी कलाओं की पूजा होनी चाहिये। इसी
तरह चान्द्रकलाओं की पूजा ‘क्लीं सोममण्डलाय षोडशकलात्मने अर्घ्यामृताय
नमः’ इस मन्त्र से करनी चाहिये। इसमें प्रथम आदिम द्वितीय उपादिम अर्थात्
दूसरी और मध्यम अर्थात् तीसरी कलाओं का क्रम अपनाना चाहिये ।।२४।।
तत्र विलिख्य त्र्यस्रमकथादिमयंरेखं हलक्षयुगान्त-स्थित-
हंसभास्वरं वाक्कामशक्तियुक्तकोणं कृत्वा षडस्रं षडङ्गेन
पुरोभागाद्यभ्यर्च्य मूलेन सप्तधा अभिमन्त्र्य दत्तगन्धाक्षतपुष्पधूपदीपः
तद्विप्रुड्भिः प्रोक्षितपूजाद्रव्यः सर्वं विद्यामयं कृत्वा तत्स्पृष्ट्वा
चतुर्नवतिमन्त्रान् जपेत् ।।२५।।
तत्र प्रथमद्रव्ये पूर्वोक्तक्रमेण पूजयित्वा अकारादिविसर्गान्तषोडशस्वरैः
पश्चिमादीशानान्ताम् एकां रेखां कुर्यात्। तत ईशानाद्याग्नेयान्तां कवर्गमारभ्य
तान्तैः षोडशवर्णैः अपरां रेखां सम्पादयेत्। तद् आग्नेयादिपश्चिमान्तं
यादिसान्तैः षोडशभिस्तृतीयारेखां सम्पादयेत्। एवं सति अश्च कश्च थश्च
९० परशुरामकल्पसूत्रम्
आदियेषां वर्णानां दीर्घकारखकारदकारप्रभृतीनां तन्मयास्तदभिन्ना रेखा यस्मिन्
त्रिकोणे तद् अकथादिमयरेखम्। इदं त्र्यस्रविशेषणम्। हश्च लक्षयुगं च तयोः
अन्तः मध्ये स्थितो यो हंस इति वर्णसमुदायस्तेन भास्वरं, द्रव्ये स्वदक्षभागे
‘हम्’ इति विलिख्य, तदुत्तरतो हं स इति वर्णौ विलिख्य तदुत्तरतो लक्षेति
विलिखेत्, एवं चोक्तरूपं भवति। एवं वाक्कामाशक्तयः, तद्युक्तं त्रिकोणं
विलिख्य हंसेन हंस इति मन्त्रेण आराध्य पुष्पादिभिः पूजयित्वा
बहिस्त्रिकोणानि मूलषडङ्गमन्त्रैः पुरोभागादि-स्वाभिमुखाग्रादिप्रादक्षिण्येन
अभ्यर्च्य मूलेन सप्तधा सप्तवारमावृत्तेन। तस्मिन् द्रव्ये दत्ता अर्पिता
गन्धाक्षतपुष्पधूपदीपा येन ईदृशः पूजको भवेत्। सर्वविद्या परसंवित् तन्मयं
तदभिन्नं कृत्वा भावयित्वा चतुर्नवतिमन्त्रान् जपेत् ।।२५।।
सर्वप्रथम पूर्वोक्त प्रकार से द्रव्यादि में पूजन कर सूत्रोक्त निर्देश पालन
करना चाहिये। सूत्रानुसार पूजन के उपरान्त वहाँ एक त्रिकोण की संरचना करनी
है। इस कोण का नाम ‘अकथादिमयरेख’ रखा गया है। इसका कारण है त्रिकोण
में तीन रेखायें होती हैं। ज्यामिति के अनुसार इस कोण को अकथ कोण कह
सकते हैं। तीनों रेखाओं के नाम १. अक, २. कथ और ३. थअ या अ-थ
रेखा कहा जा सकता है। अ-क रेखा पर अ से लेकर विसर्ग पर्यन्त १६ स्वर
लिखे जाते हैं। रेखा पश्चिम से ईशानकोण तक बनायी जाती है। दूसरी रेखा
ईशान से अग्निकोण तक जाती है। इसमें ‘क’ कोण से कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग
के १५ अक्षर और ‘त’ अक्षर मिलाकर १६ वर्ण लिखे जाते हैं। तीसरी रेखा
‘थ’ अक्षर से प्रारम्भ होती है। इसे थ-अ रेखा कह सकते हैं। इस पर ‘थ’
से ‘अ’ तक १६ वर्ण लिखे जाते हैं। इसमें तवर्ग के ४, पवर्ग के ५, यवर्ग
के ४ और ऊष्मा के तीन वर्ण मिलाकर १६ वर्णों की एक रेखा होती है।
ईशानकोण क --------------------------------------------- थ अग्निकोण
कवर्ग ५ | चवर्ग ५ | टवर्ग ५ | त १
१६ स्वर थ दधन ४ वर्ण
पवर्ग ५ वर्ण
हं हंसः क्षं अन्तस्थ ४ वर्ण
ऊष्मा श ष स ३ वर्ण
अ पश्चिम
श्रीक्रमः ९१
इस तरह अ क थ नामक कोणों से अकारादि १६ वर्ण, ककारादि १६
वर्ण और थकारादि १६ वर्ण कुल मिलाकर ४८ वर्ण इस त्रिकोण में आ जाते
हैं। यहाँ अकथादिमय त्रिकोण का वर्णन किया गया है।
जहाँ तक ‘ह’ और ‘क्ष’ युगल अक्षरों के प्रश्न हैं, उनके मध्य में
अवस्थित ‘हंस’ रूप वर्ण समुदाय लिखना चाहिये, अर्थात् अपने दाहिने भाग
में ‘हं’ यह वर्ण लिखना चाहिये। वाम भाग में क्ष लिखकर मध्य में हंसः यह
लिखना चाहिये। इन वर्णों से वह त्रिभुज वर्ण-वैद्युतिक आभा से भर उठता है।
उस त्रिभुज के तीनों कोणों पर बाला के तीनों बीज लिखना चाहिये। इसकी
पूजा हंस मन्त्र से की जाती है।
उसके ऊपर पुष्प आदि का श्रद्धा भाव से अर्पण करना चाहिये। इस
पूजा में त्रिकोण की संरचना और अर्चना की बातें कही गयी हैं॥२५॥
चतुर्नवतिमन्त्रानाह
त्रितारी नमः सम्पुटितातेजस्त्रितयकला अष्टात्रिंशत्। सृष्टि-
ऋद्धि-स्मृति-मेधा-कान्ति-लक्ष्मी-द्युति-स्थिति-सिद्धयो ब्रह्मकला
दश। जरा-पालिनी-शान्तिरीश्वरी-रतिकामिके-वरदा-ह्लादिनी-
प्रीतिर्दीर्घा विष्णुकला दश। तीक्ष्णा-रौद्री-भया-निद्रा-तन्द्री-क्षुधा-
क्रोधिनी-क्रियोद्धारी-मृत्यवो रुद्रकला दश। पीताश्वेताऽरुणाऽ-
सिताश्चतस्र ईश्वरकलाः। निवृत्ति-प्रतिष्ठा-विद्या-शान्तीन्धिका-
दीपिका-रोचिका-मोचिका-परा-सूक्ष्माऽसूक्ष्मामृता-ज्ञानाज्ञानामृता-
प्यायिनी-व्यापिनी-व्योमरूपाः षोडश सदाशिवकलाः। हंसश्शु-
चिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोतां वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसद्दृतस-
द्व्योमसदब्जा-गोजा-ऋतजा-अद्रिजा ऋतं बृहत्। प्रतद्विष्णुस्तवते
वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः। यस्योरुषु त्रिषु विक्रम-
णेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा। त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं
पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यो-र्मुक्षीय मामृतात्। तद्विष्णोः
परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्। तद्विप्रासो
विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते। विष्णोर्यत् परमं पदम्। विष्णुर्र्योनिं
कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु। आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु
९२ परशुरामकल्पसूत्रम्
मे। गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति गर्भं ते अश्विनौ
देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ। इत्येते पञ्चमन्त्राः। मूलविद्या चाहत्य
चतुर्नवति-मन्त्राः।।२६।।
त्रितारी पूर्वोक्ता। त्रितारी नम इत्यनयोर्मध्ये चतुर्नवतिमन्त्रान् पठेत्।
यथा च द्वाभ्यां सम्पुटितो भवति। तेजस्त्रितयं वह्निसूर्यसोमास्तेषां कलाः
(श्यामाक्रमे १८ सूत्रे) अष्टात्रिशंत्। मन्त्रस्वरूपं यथा—'ऐं ह्रीं श्रीं धूम्रार्चिषे
नमः'। एवम् अग्रेऽपि ज्ञेयम्। वह्निकलाः १०। सूर्यकलाः १२। चन्द्रकलाः
१६। ब्रह्मकलाः १०। विष्णुकलाः १०। रुद्रकलाः १०। ईश्वरकलाः ४।
सदाशिवकलाः १६। इत्थं च कलाः सर्वाः ८८। यद्यपि हंसश्शुचिषद्
इत्यारभ्य पुष्करस्रजावित्यन्तं सप्त ऋचः सन्ति, तथापि 'इत्येते पञ्च मन्त्राः'
इत्युक्त्या चतुर्थपञ्चमौ मिलित्वा एको मन्त्रः। षष्ठसप्तमौ मिलित्वा एको मन्त्रः।
मूलविद्या पञ्चदशी। पूर्वकलाः ८८। उक्तमन्त्राः पञ्च। मूलविद्या चाहत्य सर्वं
मिलित्वा चतुर्नवति-मन्त्राः सम्पद्यन्ते। एतैरभिमन्त्रणेन द्रव्यं संस्कुर्याद् इति
फलितार्थः ।।२६।।
त्रितारी प्रसिद्ध प्रयोग है। यह 'ऐं ह्रीं श्रीं' तीन बीज मन्त्रों के और नमः
के बीच में क्रमशः ९४ मन्त्र सम्पुटित होकर बनते हैं। जैसे वह्नि की पहली
कला का नाम 'धूम्रार्चिः' है। इसके पहले त्रितारी का प्रयोग करें। धूम्रार्चिः में
चतुर्थी विभक्ति लगाकर धूम्रार्चिषे कहें। पुनः नमः जोड़ दें। मन्त्र बनेगा 'ऐं ह्रीं
श्रीं धूम्रार्चिषे नमः'। इसी तरह वह्नि १०, सूर्य १२, सोम १६, ब्रह्मा १०,
विष्णु १०, रुद्र १०, ईश्वर ४ और सदाशिव की १६ = ८८ कलायें होती
हैं। इन सभी कलाओं के पहले त्रितारी बोलकर प्रत्येक में नमः लगाकर ८८
मन्त्र बनते हैं।
इसी तरह 'हंसः शुचिषत्' से लेकर 'पुष्करस्रजौ' तक सात ऋचाओं में
चौथी (तद्विष्णोः परमं पदं.....चक्षुराततम्) और पाँचवीं (तद्विप्रासो.....परमं पदम्)
मिलाकर एक मन्त्र बनाते हैं। यह द्विनवतितम मन्त्र होगा। पुनः छठी और सातवीं
मिलाकर त्रितारी और नमः से संपुटित कर ९३ तम बनता है। पुनः
त्रितारी + मूलविद्या + नमः योग से ९४ मन्त्र बनते हैं। इनका जप करने का
निर्देश सूत्र २५ में ही है।।२६।।
श्रीक्रमः ९३
अथ हैके पञ्चभिरखण्डाद्यैरभिमन्त्रणमामनन्ति ।।२७।।
अथेत्यनेन चतुर्नवतिमन्त्रोत्तरमेवेति क्रमः सूचितः। एके इत्यनेन
पाक्षिकत्वं सूचितम्। अखण्ड आद्यो येषामिति तद्गुणसंविज्ञान-
बहुव्रीहिः।।२७।।
सूत्र में सर्वप्रथम अथ शब्द का प्रयोग किया गया है। इससे यह सूचना
हो रही है कि, पहले कहे गये ९४ मन्त्रों के बाद यह क्रम अपनाया जाना
चाहिये। 'ह' आवश्यक अर्थ में अव्यय प्रयुक्त है। एके शब्द यह सूचित करता
है कि, कुछ लोग ही यह नया क्रम अपनाने के पक्षधर हैं। उनके अनुसार
पाँच ऐसे मन्त्रों का उल्लेख किया गया है, जिनसे सुधा देवी का अभिमन्त्रण
करना चाहिये। अखण्डाद्य शब्द में तद्गुण-संविज्ञान बहुव्रीहि समास है।।२७।।
अखण्डाद्याः के ? इत्याकाङ्क्षायामाह
अखण्डैकरसानन्दकरे परसुधात्मनि ।
स्वच्छन्दस्फुरणामत्र निधेह्यकुलनायिके ।।१।।
अकुलस्थाऽमृताकारे शुद्धज्ञानकरे परे ।
अमृतत्वं निधेह्यस्मिन् वस्तुनि क्लिन्नरूपिणि ।।२।।
तद्रूपिण्यैकरस्यत्वं कृत्वा ह्येतत्स्वरूपिणि ।
भूत्वा परामृताकारा मयि चित्स्फुरणं कुरु ।।३।।
इति तिस्रो अनुष्टुभो विद्याः ।।२८।।
सहस्रदलं कमलद्वयम्। सर्वकमलानामाधारभूतं ऊर्ध्वमुखमेकं पद्मं
मूलाधारस्याधस्तिष्ठति। तदेकमकुलपदवाच्यम्। एवं ब्रह्मरन्ध्रस्थिताधो
मुखसहस्रच्छदपद्ममपि अकुलम्। प्रकृते ब्रह्मरन्ध्रस्थितस्यैव ग्रहणम्। तस्यैव
अमृतस्रावित्वात्। अकुलस्य नायिका तदधिष्ठात्री तत्सम्बोधने हे
'अकुलनायिके! अखण्डो अविच्छिन्न एकरसो दुःखासम्भिन्नो य आनन्दस्तं
करोति व्यञ्जयति तादृशे। परा उत्कृष्टा या सुधा ब्रह्मरन्ध्रस्था अमरत्वकारिणी
तदात्मनि तत्स्वरूपे। अत्र स्वच्छन्दा स्वतन्त्रा या चित् तस्याः, स्फुरणां