परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ परशुरामकल्पसूत्रम्
तर्जनीमध्यमाभ्यां तु ततोऽस्त्रं विन्यसेत्प्रिये'। इति बालषडङ्ग-
न्यासः ।।१९।।
बाला बीज मन्त्रों को दो बार कहने पर छः बीजाक्षर बनते हैं। इनसे अर्थात्
छः अक्षरों को एक साथ बोलकर हृदय से लेकर अस्त्र पर्यन्त छः अङ्गों पर क्रमशः
तीन, दो, एक, दश, तीन और दो सङ्ख्या की अंगुलियों से न्यास करना चाहिये।
यही तथ्य दक्षिणामूर्तिसंहिता में स्पष्ट रूप से लिखा गया है। मानो इस सूत्र का
भाष्य पहले ही किया गया हो, वह इस प्रकार है—
'कनिष्ठा और अङ्गुष्ठ को छोड़कर तीन अङ्गुलियों से हृदयाय नमः
बोलकर हृदय पर न्यस्त करना चाहिये। शिर पर छः बाला बीज, मध्यमा और
अनामिका दो अङ्गुलियों से न्यास करना चाहिये। मन्त्रवित् पुरुष की यही पद्धति
है। शिखा में केवल अङ्गुष्ठ से न्यास करने के बाद दशों अङ्गुलियों से कवच
न्यास करना चाहिये। भगवान् दक्षिणामूर्त्ति कह रहे हैं कि, परमेश्वरि शिवे! हृदय
न्यास के अनुसार तीनों नेत्रों का न्यास किया जाता है। तर्जनी और मध्यमा
से अस्त्राय फट् मन्त्र न्यास होता है।'
इस प्रकार बालाषडङ्ग न्यास पूरा होता है।।१९।।
अथ वशिन्यादियोगिनीन्यासमाह
सबिन्दूनचो ब्लूमुच्चार्य वशिनीवाग्देवतायै नम इति शिरसि।
सर्वत्र वर्गाणां बिन्दुयोगः। कवर्गं 'कलह्रीं' च निगद्य कामेश्वरी-
वाग्देवतायै नम इति ललाटे। चुं गदित्वा 'न्क्लीं' वाग्देवतायै नम
इति भ्रूमध्ये। टुं भणित्वा 'ब्लूं' विमला-वाग्देवतायै नम इति
कण्ठे। तुं च प्रोच्य 'ज्रीं' अरुणावाग्देवतायै नम इति हृदि। 'पुं'
च 'हस्लव्यूं' उच्चार्य जयिनी-वाग्देवतायै नम इति नाभौ।
यादिचतुष्कं 'झ्म्र्यूं' उच्चार्य सर्वेश्वरीवाग्देवतायै नम इति लिङ्गे।
शादिषट्कं 'क्ष्प्रीं' आख्याय कौलिनीवाग्देवतायै नम इति
मूले ।।२०।।
सबिन्दूनचो बिन्दुयुक्ता अकारादि-विसर्गान्तास्तानुच्चार्य 'नमः' इत्यन्तो
वशिनीमन्त्रः। तथा च 'अं आं...........अं अः ब्लूं वशिनी-वाग्देवतायै नमः'