परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीक्रमः ७७
सूक्ष्मपक्षाः। महोपधानं कौस्तुभास्तरणं रक्तवर्णं तल्पोपरि तन्मालिन्याभावार्थं
सूक्ष्मं वस्त्रं पात्यते। वितानम् ऊर्ध्वदेशान्मृत्तिकादिपात-प्रतिबन्धकमुपरि
बध्यमानं वस्त्रम्। एवं चतुर्थ्यन्तैः सर्वैर्नमोयोगः। एतैश्चतुश्चत्वारिंशन्मन्त्रै-
र्मन्त्रवाच्यानर्थान् आदौ श्रीचक्रे परिभाव्य तेषां पूजनं कुर्यात्। एकस्य ध्यानं
ततोऽर्चनं ततोऽपरस्य ध्यानं, ततस्तस्यार्चनम् इति क्रमः। तत्तदिति
पदस्वारस्यात् लब्धः ॥१०॥
तत्र अव्यय का प्रयोग यहाँ यागमन्दिर अर्थ में हुआ है। उसमें ही यह
महाचक्र प्रतिष्ठापित है। उसमें ४४ चतुर्थ्यन्त तत्त्व पदार्थ विद्यमान हैं। उन सबके
साथ नमः अव्यय का योग आवश्यक है। इसके योग से सभी मन्त्रवत् हो जाते
हैं। इन ४४ मन्त्रों से चौवालिस तत्त्व पदार्थों और उनके अस्तित्व का भावन
करते हुए श्रीललिताम्बा के अङ्गभूत होने के कारण इनकी पूजा भी करनी
चाहिये। इन चौवालिस के स्वरूपों का क्रमशः अर्थसहित भावन अनिवार्यतः
आवश्यक है। जैसे अमृताम्भोनिधि से अमृत समुद्र का भावन वहाँ होता है,
उसी तरह रत्नद्वीप से रत्नों का भी भावन होता है, अर्थात् अत्यन्त रमणीय
वह वासभूमि है। आकर्षक तरुवरों से सुशोभित है। कल्पवृक्ष, सन्तान, हरिचन्दन
और मन्दार चारों कल्पवृक्ष के विविध नाम हैं। वहाँ सभी हैं। उनकी पूजा की
आवश्यकता है। पुष्पराग से लेकर विद्रुम तक रत्नों के भेद हैं। मण्डप तो
माणिक्य का ही बना है। उसमें एकसहस्र स्तम्भ हैं। अमृत की उसमें वापी
की भी प्रतिष्ठा है। इसके अतिरिक्त आनन्द और विमर्श की बावलियाँ भी उसमें
लहराती हैं। बालातप, चन्द्रिका आदि के उद्गार रूप लालवर्ण के आह्लादक पदार्थ
भी नमस्कार के योग्य हैं। महाशृङ्गार-परिघा, महापद्माटवी चिन्तामणिमन्दिर
पूर्वाम्नायरूप-पूर्वद्वार, दक्षिणाम्नायमय दक्षिण-द्वार, पश्चिमाम्नायमय पश्चिमद्वार
और उत्तराम्नायमय उत्तर-द्वार इसमें उल्लिखित हैं। चारों ओर रत्न-प्रदीपों के
वलय हैं। मणिमंय सिंहासन हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिवमयं
मञ्चफलक हैं। हंस की पाँखों के भीतरी रोमजाल से निर्मित रूई की उपधान
है। हंसतूल का ही मसनद विद्यमान है। कौस्तुभ के समान पाटलिमा-मण्डित
आस्तरणरूप चादर है। महावितान तना हुआ है। सुन्दर-सा पर्दा है। ये सभी
पदार्थ आराधक और आराध्य के तादात्म्य के साधक हैं। अतः समान रूप से