परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० परशुरामकल्पसूत्रम्
इति वामपादपार्ष्णिघातकरास्फोटसमुदञ्चितवक्त्रस्तालत्रयं दत्त्वा
देव्यहंभावयुक्तः स्वशरीरे वज्रकवचन्यासजालं विदधीत ।। ९४ ।।
'अपसर्पन्तु' इति मन्त्रेण पार्ष्ण्या पादपृष्ठभागेन भुवो घातः ताडनं,
करयोः आस्फोटः संघर्षः। समुदञ्चितं तिर्यक्कृतं वक्त्रं मुखम्, एभिः सहेति
शेषः। तालत्रयमधोमुखाभ्यां दक्षमध्यमातर्जनीभ्यां वामकरतले सशब्दं
त्रिराघातः, तं दत्त्वा उत्पाद्य। अहम् उपास्यदेव्यभिन्न इति भावयित्वा। वज्र-
कवचम् अभेद्यकवचरूपं न्यासजालं न्याससमूहं विदधीत ।। ९४ ।।
सूत्र में पूरे श्लोक का पाठ कर दिया गया है। सूत्र की दृष्टि से यह
विलक्षण अन्विति है। इस श्लोक के उच्चारण और पदाघात साथ ही कराघात
से पृथ्वी के उस याग परिवेश के सभी विघ्नकर्त्ता भूत भाग जाते हैं। यह विधि-
सम्मत उपदेश है। ऐसा भगवान् शंकर के आदेशानुसार होता है। विना उनकी
आज्ञा के ये उनके गण हट भी कैसे सकते हैं?
यह श्लोक बोलकर भूतों का अपसारण करने की प्रथा वैदिक तथा
तान्त्रिक दोनों पद्धतियों में अपनायी जाती है। इसके बाद बायें पैर की एड़ी
से आघात करना चाहिये। इसी तरह दाहिने हाथ की मध्यमा और तर्जनी से
वामकरतल पर तीन आघात करने से तीन-तीन अव्यक्त ध्वनि उत्पन्न करनी
चाहिये। इस तरह शब्द का उत्पादन करते समय अपने मुख को पार्श्व की ओर
वक्र कर फेर लेना चाहिये।
इसके बाद यह भावन करना चाहिये कि, मैं अपनी आराध्या माँ से
तादात्म्य भाव से अवस्थित हूँ। उसके अतिरिक्त मेरा कोई अस्तित्व नहीं वरन्
नितान्त अभिन्न हूँ। इस भावना में आविष्ट के सदृश कुछ समय ध्यानावस्थित
हो जाय। इसके बाद इस स्वात्मशरीर में वज्रकवचरूप अभेद्यकवचरूप न्यास
करना चाहिये। न्यास के सम्बन्ध में पुनः आगे चर्चा की जायेगी।। ९४ ।।
किं तन्न्यासजालम् इत्याकाङ्क्षायाम् आदौ करशुद्धिन्यासमाह
बिन्दुयुक् श्रीकण्ठानन्तार्त्तीर्यैर्मध्यमादितलपर्यन्तं कृत-
करशुद्धिः ।। ९५ ।।