परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीक्रमः ८१
श्रीकण्ठः शिवोऽकारो योगिनीतन्त्रे पञ्चदश्यां श्रीकण्ठदशकमित्यवर्ण-
गणनात्। अनन्तो दीर्घकारस्तन्त्रसारे 'आं ह्रीं क्रों' इति मन्त्रस्य 'अनन्तो
बिन्दुसंयुक्तो मायाब्रह्माग्नितारवान्' इत्युद्धारात्। बिन्दुयुजौ च तौ श्रीकण्ठानन्तौ
तार्तीयो बालातृतीयः 'सौः' इति। एवञ्च 'अं आं सौः' अनेन मन्त्रेण
मध्यमामारभ्य तलपर्यन्तं कृता करशुद्धिर्येन। मध्यमानामाकनिष्ठा-
ङ्गुष्ठतर्जनीकरतलकरपृष्ठेषु न्यसेदित्यर्थः। अयं करशुद्धिन्यासः ।।१५।।
इस सूत्र में कूट शब्दों के माध्यम से बीज-वर्णों का वर्णन किया गया
है। जैसे— बिन्दुयुक्तश्रीकण्ठ 'अं' बिन्दुयुक् अनन्त....................दीर्घ 'आं'
तार्तीय— बाला का तीसरा बीज— 'सौः'।
योगिनीतन्त्र में पञ्चदशी में श्रीकण्ठ शब्द से अवर्ण का ही ग्रहण किया
गया है। इसी तरह श्रीतन्त्रसार नामक ग्रन्थ में 'अनन्त' शब्द से 'आं' यह
बीज-मन्त्र गृहीत किया गया है। ये दोनों इस तरह प्रामाणिक प्रयोग रूप में
मान्य हैं। बाला बीज मन्त्रों का तीसरा बीज 'सौः' स्वीकृत है। इस तरह पूरा
न्यासमन्त्र 'अं आं सौः' बनता है। इस मन्त्र से मध्यमा से आरम्भ कर करतल-
पृष्ठों तक न्यास करने से करशुद्धि हो जाती है। इससे साधक द्वारा हस्त से
सम्पन्न सारी प्रक्रिया दिव्य हो जाती है।।१५।।
आत्मरक्षान्यासमाह
कुमारीमुच्चार्य महात्रिपुरसुन्दरीपदमात्मानं रक्ष रक्षेति हृदये
अञ्जलिं दत्त्वा।।१६।।
कुमारीं बालामुच्चार्य पदमिति वर्णद्वयमपहाय रक्ष रक्षेत्यन्तं पठन् हृदये
अञ्जलिं दत्त्वा। अयमात्मरक्षान्यासः।।१६।।
कुमारी बाला विद्या को कहते हैं। इसमें तीन बीज होते हैं। आगे के
सूत्र में इसका उल्लेख है। माँ (महात्रिपुरसुन्दरि मां रक्ष रक्ष) मेरी रक्षा करो,
मेरी रक्षा करो; यह कहकर हृदय में ही अञ्जलि प्रदान करें। इसे आत्मरक्षा-
न्यास कहते हैं। सूत्र में प्रयुक्त 'पद' का प्रयोग मन्त्र में नहीं करना
चाहिये।।१६।।
मायाकामशक्तीरुच्चार्य देव्यात्मासनाय नम इति स्वस्यासनं
दत्त्वा ।।१७।।