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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 320 में से

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पृष्ठ 116

७४ परशुरामकल्पसूत्रम्
३. कमला— प्रथम ऊष्मवर्ण (श्) + द्वितीय अन्तःस्थ (र्) + तुरीय स्वर
(ई) + बिन्दु इन संकेतों से निष्पन्न बीज मन्त्रों १. ऐं, २. ह्रीं और ३. श्रीं
मन्त्रों को त्रितारी कहते हैं। तार ओङ्कार होता है। शाक्त सम्प्रदाय के ये
तीनों तार अर्थात् ओङ्कार ही माने जाते हैं। पहला वाग्भव बीज, दूसरा माया
बीज और तीसरा लक्ष्मी बीज माना जाता है।।८।।
इतः परं श्रीचक्रस्वरूपं तत्साधनद्रव्यं चाह
पुरतः पञ्चशक्तिचतुःश्रीकण्ठमेलनरूपं भूसदनत्रयवलित्रय-
भूपपत्रदिक्पत्रभुवन- भुवनारद्रुहिणारविधिकोणदिक्कोण-त्रिकोण-
बिन्दुचक्रमयं महाचक्रराजं सिन्दूरकुङ्कुमलिखितं चामीकर-कलधौत-
पञ्चलोहरत्नस्फटिकाद्युत्कीर्णं वा निवेश्य ।।९।।
पुरत इत्यस्य निवेश्येत्यन्तेन साकमन्वयः पञ्चशक्तयः शक्तिचक्राणि।
चतुः श्रीकण्ठाः चत्वारि शिवचक्राणि। एषां मेलनम् अभिन्नस्वरूपम्।
भूसदनत्रयं परितश्चतुरस्ररेखात्रयम्। वलित्रयं वृत्तत्रयम्। भूपपत्रं भूपा इति
षोडशसङ्ख्यायाः सङ्केतः। षोडशपत्राणि यस्मिंस्तत्। दिक्पत्रं दिगित्यष्ट-
सङ्ख्या तावन्ति पत्राणि यस्मिंस्तत्। भुवनारं भुवनमिति चतुर्दशसङ्ख्या।
तावदरं तावत्कोणम्। द्रुहिणारं दशकोणम्। विधिकोणम् इति विख्यातप्रायम्।
दिक्कोणं त्रिकोणं, बिन्दुचक्रमयम्। मयमित्यनेन समष्ट्येकरूपत्वं ज्ञापितम्।
महाचक्रराजं श्रीचक्रस्य नाम सिन्दूरं कुङ्कुमं लिखितम्। चामीकरं सुवर्णं,
कलधौतं रौप्यम्, पञ्चलोहं रौप्यं, सुवर्णं, ताम्रम्, लौहम्, पित्तलम्) रत्नानि
मरकतादीनि स्फटिकाद्युत्कीर्णं पूर्वोक्तानुसारं निर्मितम् ईदृशं चक्रराजं पुरतो
निवेश्य ।।९।।
महाचक्रराज श्रीचक्र को कहते हैं। श्रीचक्र में ही शक्तिचक्रैकनायिका
श्रीललिताम्बा की उपासना की जाती है। शक्तिचक्र और शिवचक्र दोनों श्रीचक्र
में शाश्वत उल्लसित हैं। सूत्रकार ने सरलरूप से सबके स्वरूप का निर्देश दिया
है। इसे पूजा-क्रम में नित्य सूत्रानुसार निर्माण करने का भी संकेत है और
पञ्चलौह या स्फटिकादि पर बने सिद्ध यन्त्रों पर भी पूजा का आदेश यह सूत्र
देता है। उसके स्वरूप की रचना की सूचना श्रीचक्रस्थित निम्न बिन्दुओं के
अनुसार समझी जा सकती है—