न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
६६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-यावत् शरीरमें व्यापक तथा स्पर्शका ग्राहक त्वक्इन्द्रिय है. वह रूपादि-
कोंके मध्यमेंसे स्पर्शहीका ग्राहक होनेसे वायवीय है, जैसे व्यजन (पंखे) का
पवन शरीरसम्बन्धि स्वेदरूप जलके केवल शैत्यहीका ग्राहक है तद्वत् ॥ ४३ ॥
विषयं दर्शयति, प्राणादिरिति-
भाषा-‘प्राणादि’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार वायवीय विषयको दिखलाता है-
प्राणादिस्तु महावायुपर्यन्तो विषयो मतः ।
भाषा-प्राणादिवायुसे लेकर महावायुपर्यन्त वायवीय विषय है.
यद्यप्यनित्यो वायुश्चतुर्विधस्तस्य चतुर्थी विधा तु प्राणादिरि-
त्युक्तमाकरे । तथापि संक्षेपादत्र त्रैविध्यमुक्तम् । प्राणस्त्वेक एव
हृदादिनानास्थानवशान्मुखनिर्गमादिनानाक्रियावशाच्च नाना-
संज्ञां लभत इति ।
भाषा-यद्यपि अनित्य वायु चार प्रकारका है. उसका चौथा भेद प्राणादिवायु है;
यह वार्ता प्रशस्तपादभाष्यमें लिखी है, तथापि इस ग्रन्थमें संक्षेपसे अनित्य वायुके
तीन भेदही कहे हैं. प्राणवायु एकभी हृदयादि नानास्थानभेदसे तथा मुखनिर्गमनादि
नानाक्रियाके भेदसे ‘प्राण अपान आदि’ नाना संज्ञाको लाभ करता है.
आकाशं निरूपयति, आकाशस्येति-
भाषा-‘आकाशस्य’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आकाशका निरूपण करे है-
आकाशस्य तु विज्ञेयः शब्दो वैशेषिको गुणः ॥ ४४॥
भाषा-शब्दात्मक विशेष गुणवाला आकाश जानना योग्य है ॥ ४४ ॥
आकाशकालदिशामेकैकव्यक्तित्वादाकाशत्वादिकं न जातिः
किंवाकाशत्वं शब्दाश्रयत्वम् । वैशेषिक इति कथनं तु विशेष-
गुणान्तरव्यवच्छेदाय । एतेन प्रमाणमपि दर्शितम् ।
भाषा-आकाश काल तथा दिशाको एक एक व्यक्ति होनेसे आकाशत्वादिधर्म
जातिरूप नहीं है, किंतु समवायसम्बन्धसे शब्दका आश्रयही आकाश है. मूल
कारिकामें ‘वैशेषिक’ यह कथन तो विशेष गुणान्तर व्यवच्छेदके वास्ते है; अ-
र्थात् आकाशमें शब्दके सिवाय विशेष गुणान्तर नहीं है; इतने कथनसे आकाशमें
प्रमाणभी दिखलाया है; वह प्रमाण अनुमान है.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६७
तथाहि । शब्दो विशेषगुणश्चक्षुर्ग्रहणायोग्यबहिरिन्द्रियग्राह्यजा-
तिमत्त्वात् स्पर्शवत्, शब्दो द्रव्यसमवेतो गुणत्वात् संयोगवत्
इत्यनुमानेन शब्दस्य द्रव्यसमवेतत्वे सिद्धे, शब्दो न स्प-
र्शवद्विशेषगुणोऽग्निसंयोगासमवायिकारणकत्वाभावे सत्यकारण-
गुणपूर्वकप्रत्यक्षत्वात् सुखवत् । पाकजरूपादौ व्यभिचारवार-
णाय सत्यन्तम् । पटरूपादौ व्यभिचारवारणायाकारणगुणपूर्व-
केति । जलपरमाणुरूपादौ व्यभिचारवारणाय प्रत्यक्षति ।
भाषा—उसका प्रकार यह है कि-शब्दभी स्पर्शकी तरह गुणहै. नेत्रसे ग्रहणके अ-
योग्य होकर बाह्य इन्द्रियसे ग्रहण योग्य'शब्दत्व'जातिवाला होनेसे-इति. इस अनुमान
से शब्दको गुण न माननेवाले वैयाकरण तथा मीमांसकके मतका खण्डन किया
और अग्रिम अनुमानमें स्वरूपासिद्धिका परिहारभी किया है. दूसरा अनुमान यह
है कि-शब्द संयोगकी तरह गुण होनेसे किसी एक द्रव्यमें समवायसम्बन्धसे रहता
है, इस अनुमानसे 'शब्द ' को द्रव्यसमवेतत्वसिद्धिके पश्चात् ' शब्द ' स्पर्शवाले
द्रव्योंका विशेष गुण नहीं है, सुखकी तरह अग्निसंयोगरूप असमवायिकारणत्व अ-
भावविशिष्ट अकारणगुणपूर्वक प्रत्यक्ष होनेसे; इस अनुमानसे यह सिद्ध हुआ कि
'शब्द' पृथिवी आदि चतुष्टयका विशेष गुण नहीं है, पृथिवीनिष्ठ पाकजरूपका प्रत्यक्ष
अकारण गुणपूर्वकहै उससे प्रकृत हेतुका व्यभिचार वारणार्थ"अग्निसंयोगासमवायिकारण
कत्वाभावेसति"यह सप्तमीअन्त हेतुका विशेषण कहा. पार्थिवरूपका असमवायिकारण
अग्निसंयोग है, याते व्यभिचार नहीं है. एवं यदि सप्तमीअन्तमात्र हेतु रक्खें तो
पटादिके रूपमें हेतु व्यभिचारी होगा,क्योंकि पटके रूपमें अग्निसंयोगासमवायिकारण-
कत्वाभाव सिद्ध है, इसलिये 'अकारण गुणपूर्वक प्रत्यक्षत्व' कहा. पटके रूपका प्रत्यक्ष
अकारण गुणपूर्वक नहीं है;किन्तु पटका कारणीभूत जो तन्तु उनके रूपग्रहणपूर्वक
पटके रूपका प्रत्यक्ष है, याते व्यभिचार नहीं है. एवं यदि हेतुमें 'प्रत्यक्ष' पद नहीं
देवें तो समग्र हेतुका व्यभिचार जलीय परमाणुओंके रूपमें होगा; क्योंकि जलीय
परमाणुभी अग्निसंयोगासमवायिकारणकत्वाभावविशिष्ट अकारणगुणपूर्वक है; परन्तु
प्रत्यक्ष नहीं है याते व्यभिचार नहीं है-इति ॥
शब्दो न दिक्कालमनोगुणो विशेषगुणत्वात् । नात्मविशेषगुणो
१ जो लौकिक सम्बन्धसे इन्द्रियग्राह्य हो और लौकिक सम्बन्धहीसे द्विइन्द्रियसे ग्रहणकी
योग्यता न रखता हो तथा गुणत्वव्याप्य जातिवाला हो वह ' विशेषगुण ' कहाताहै. इस
लक्षणके लक्ष जो विशेषगुण हैं उनका निरूपण ' बुद्ध्यादिषट्कं ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार
स्वयं करेगा.
६८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
बहिरिन्द्रियग्राह्यत्वादूपवत् । इत्थं च शब्दाधिकरणं नवमद्रव्यं
गगननामकं सिद्ध्यतीति । न च वायववयवेषु सूक्ष्मशब्दक्रमेण
वायौ कारणगुणपूर्वकः शब्द उत्पद्यतामिति वाच्यम् । अया-
वद्द्रव्यभावित्वेन वायुविशेषगुणत्वाभावात् ॥ ४४ ॥
भाषा-तत्पश्चात् 'शब्द' दिशाका तथा कालका तथा मनकाभी गुण नहीं है;
रूपकी तरह विशेष गुण होनेसे-इति. ऐसा अनुमान करना उचित है. एवं शब्द
आत्माका विशेष गुणभी नहीं है, रूपकी तरह बाह्य इन्द्रियसे ग्रहणकी योग्यतावाला
होनेसे-इति. इसीरीतिसे शब्दका अधिकरण नवम द्रव्य 'गगन' नामकासिद्ध होता है.
शंका-यदि ऐसा मानलें कि, वायुके अवयवोंमें प्रथम सूक्ष्मशब्द उत्पन्न होता है,
पश्चात् क्रमसे स्थूलवायुमें कारणगुणपूर्वक स्थूल शब्द उत्पन्न होता है तो क्या दोषहै?
समाधान-पृथ्वीआदि चतुष्टयमें जो गुण रहता है वह सभी अपने आश्रयके नाश
होनेसे नाश होता है और शब्द अयावत् द्रव्यभावीहै अर्थात् शब्द के आश्रय द्रव्यके
नाशसे जन्य जो नाश उस नाशका प्रतियोगी शब्द नहीं है; याते शब्दवायुका विशेष
गुणभी नहीं है-
तत्र शरीरस्य विषयस्य चाभावादिन्द्रियं दर्शयति,इन्द्रियमिति-
भाषा-आकाशीय शरीर तथा विषयका अभाव होने से. 'इन्द्रियं' इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार इन्द्रियको दिखलाता है ।
इन्द्रियं तु भवेच्छ्रोत्रं -
भाषा-श्रवण इन्द्रिय आकाशसे उद्बुद्ध हुआ है.
नन्वाकाशं लाघवादेकं सिद्धम्,श्रोत्रं तु पुरुषभेदेन भिन्नं तत्कथ-
माकाशं स्यादत आह, एकः सन्नपीत्यादि-
शंका-आकाश लाघवसे एक सिद्धहै और श्रोत्र तो पुरुषभेदसे भिन्नरहै वहकैसे
आकाश हो सकताहै?समाधान-'एकइत्यादि'ग्रन्थसे मूलकार समाधान लिखताहै-
- एकः सन्नप्युपाधितः ।
भाषा-आकाश एकभी उपाधि भेदसे भिन्न २ है.
आकाश एक एव सन्नप्युपाधेः कर्णशष्कुल्यादेर्भेदाद्भिन्नं श्रोत्रा-
त्मकं भवतीत्यर्थः ।
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६९
भाषा-एकही आकाश ( कर्णशष्कुली ) श्रोत्रछिद्ररूप उपाधिके भेदसे भिन्न २
श्रोत्रात्मक होता है-इति ।
कालं निरूपयति, जन्यानामिति-
भाषा-‘जन्यानां’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कालका निरूपण करे है-
जन्यानां जनकः कालः-
भाषा-जन्य पदार्थोंका ( जनक) साधारण निमित्त कारण काल है,
तत्र प्रमाणं दर्शयितुमाह, जगतामिति-
भाषा-जगतां ‘इत्यादि’ ग्रन्थसे मूलकार कालमें प्रमाण दिखलाता है-
-जगतामाश्रयो मतः ॥ ४५ ॥
भाषा-वह काल सर्व जगत्का आधार है ॥ ४५ ॥
तथाहि । इदानीं घट इत्यादिप्रतीतिः सूर्यपरिस्पन्दादिकं
विषयीकरोति तदा सूर्यपरिस्पन्दादिना घटादेः सम्बन्धो
वाच्यः । स च संयोगादिर्न सम्भवतीति काल एव तत्सम्बन्ध-
घटकः कल्प्यते । इत्थं च तस्याश्रयत्वमपि सम्यक् ॥ ४५ ॥
भाषा-उसका प्रकार यह है कि “इदानींघटः-अर्थात् इसकालमें घटहै” इत्याकारक
(प्रतीति) ज्ञान यदि सूर्यकी क्रियाको विषय करता है तो सूर्यकी क्रियाके साथ
घटादिकोंका कोई सम्बन्ध कहना चाहिये; वह सम्बन्ध संयोगसमवाय तो नहीं है.
किन्तु ‘स्वाश्रयतपनसंयोगि संयोग’ रूपसम्बन्ध है. ‘स्व’ पदसे सूर्यकी क्रियाका
ग्रहण है, उसका आश्रय सूर्य है, उसका संयोगि काल है, उसका संयोग घटादिके
साथ है. इत्याकारक सम्बन्धका (घटक) मध्यपातिरचक कालही कल्पना किया जाताहै.
इस रीतिसे उक्त पदार्थोंसे भिन्न काल सिद्ध हुआ तो उसको पूर्वोक्त जगत्का आधार
भी कहना उचित है ॥ ४५ ॥
प्रमाणान्तरं दर्शयति, परापरत्वेति-
भाषा-‘परापरत्व’इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कालमें प्रमाणान्तर दिखलाता है,
परापरत्वधीहेतुः-
भाषा-परत्व तथा अपरत्व बुद्धिका हेतुभी कालही है.
परत्वापरत्वबुद्धेर साधारणं निमित्तं काल एव । परत्वापरत्वयो-
७० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
रसमवायिकारणसंयोगाश्रयो लाघवादतिरिक्तः कल्प्यत
इति भावः ।
शंका-ज्येष्ठभ्रातामें 'परत्व' ज्ञान होता है, तथा कनिष्ठ भ्रातामें 'अपरत्व' ज्ञान
होता है. ऐसे परत्व अपरत्वके ज्ञानका असाधारण निमित्त कारण केवल ' काल '
है. कालिक परत्व अपरत्वका असमवायिकारण जो काल पिण्डका संयोग उसका (अनु-
योगिता सम्बन्धसे ) आश्रय लाघवसे एक पृथक् काल कल्पना हो सकता है.
नन्वेकस्य कालस्य सिद्धौ क्षणदिनमासवर्षादिसमयभेदो न
स्यादत आह, क्षणादिरिति-
शंका-कालके एकसिद्ध होनेसेभी क्षण दिवस मास वर्ष तथा युग इत्यादि भेदरूप
व्यवहार नहीं होसकेगा.
- क्षणादिः स्यादुपाधितः ।
समाधान-कालमें क्षणादिव्यवहार उपाधि प्रयुक्त है.
कालस्त्वेकोऽप्युपाधिभेदात्क्षणादिव्यवहारविषयः । उपाधि-
स्तु स्वजन्यविभागप्रागभावावच्छिन्नं कर्म । पूर्वसंयोगावच्छिन्न
विभागो वा । पूर्वसंयोगनाशावच्छिन्न उत्तरसंयोगप्राग्भावो
वा । उत्तरसंयोगावच्छिन्नं कर्म वा ।
भाषा--काल एकही उपाधिके भेदसे क्षणादिव्यवहारका विषय होसकताहै. उपा-
धि तो यहां 'स्व'शब्दसे क्रियाका ग्रहण है. सूर्यनिष्ठा किंवा मूर्तमात्रनिष्ठा जो क्रिया
उस क्रियासे जन्य जो विभाग उस विभागका जो प्रागभाव उस प्रागभावावच्छिन्न
कर्मरूपहै १। अथवा पूर्वसंयोगावच्छिन्न विभागरूप है २। अथवा पूर्वसंयोगनाशावच्छिन्न
उत्तरसंयोगप्रागभावरूप है ३ । किंवा उत्तरसंयोगावच्छिन्नकर्मरूप है ४ ।
न चोत्तरसंयोगानन्तरं क्षणव्यवहारो न स्यादिति वाच्यम् । क-
र्मान्तरसत्त्वादिति । महाप्रलयक्षणादिव्यवहारो यद्यस्ति त-
दाऽनायत्या ध्वंसेनोपपादनीयः । दिनादिव्यवहारस्तु तत्तत्क्षण-
कूटैरेवेति ।
शंका-एक क्रियासे पूर्वोक्त उपाधि उपहित चारक्षणोंमें उत्तरसंयोग हुआ. पुनः उसके
पश्चात् क्रियाकी समाप्ति होनेसे क्षणादिव्यवहार नहीं होना चाहिये. समाधान-एक
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७१
क्रियाकी समाप्तिके पश्चात् उसी मूर्त्तद्रव्यमें क्षणादिव्यवहारकी नियामिका क्रियान्तर
उत्पन्न होतीहै. सिद्धान्त तो यह है कि महाप्रलयमें क्षणादिव्यवहार नहीं होता, परन्तु
यदि कोई महाप्रलयमेंभी क्षणादिव्यवहार किया चाहे तो वहां सिवाय 'तत् तत्'
पदार्थ ध्वंसके और कोई उपाधि नहीं बनसकती अर्थात् ( अनायत्या ) उपायान्तरके
अभाव होनेसे महाप्रलयकालमें क्षणव्यवहारका नियामक 'तत् तत्' पदार्थका ध्वंसही
है. दिवस मासादि व्यवहार उन क्षणोंके समुदायविशेषोंसे होताहै-इति.
दिशं निरूपयति, दूरान्तिकेति-
भाषा-'दूरान्तिक' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दिशाका निरूपण करताहै-
दूरान्तिकादिधीहेतुरेका नित्या दिगुच्यते ॥ ४६ ॥
भाषा-पदार्थोंमें दूर तथा समीप बुद्धिका नियामक एक तथा नित्य 'दिशा'
पदार्थ है ॥ ४६ ॥
दूरत्वमन्तिकत्वं च दैशिकं परत्वमपरत्वं बोध्यम् । तद्बुद्धेर-
साधारणं बीजं दिगेव। दैशिकपरत्वापरत्वयोरसमवायिकारणसं-
योगाश्रयतया दिक् सिद्ध्यतीति भावः ॥ ४६ ॥
भाषा-दूरता तथा समीपता दैशिक परत्व अपरत्वरूपा जाननी चाहिये ।
( तद्बुद्धेः ) दैशिकपरत्व अपरत्वबुद्धिका असाधारणरूपसे प्रयोजक 'दिशा'
है. दैशिकपरत्व अपरत्वका असमवायिकारण जो दिशाका तथा वस्तुका संयोग उसका
( अनुयोगितासम्बन्धसे ) आश्रयलाघवसे एक पृथक् दिशा पदार्थ सिद्ध होताहै॥४६॥
नन्वेकैव दिग् यदि तदा प्राचीप्रतीच्यादिव्यवहारः कथमुप-
पद्यतामित्यत आह, उपाधीति-
शंका-दिशा पदार्थ यदि एक है तो उसमें 'प्राची' तथा 'मतीची' इत्यादि व्यवहार
कैसे होगा?
उपाधिभेदादेकाऽपि प्राच्यादिव्यपदेशभाक् ।
समाधान-वह दिशा एकही उपाधियोंके भेदसे 'प्राची प्रतीची' इत्यादि संज्ञाको
लाभ करतीहै.
यत्पुरुषस्योदयगिरिसन्निहिता या दिक् सा तस्य प्राची । उ-
दयगिरिव्यवहिता च प्रतीची । एवं तत्पुरुषीयसुमेरुसन्निहिता
७२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
दिगुदीची। तद्व्यवहिता त्ववाची। सर्वेषामेव वर्षाणां मेरुरुत्तरतः
स्थित इति नियमात् ।
भाषा-१जिस पुरुषसे जो देश उदयाचलके समीप है वह देश उस पुरुषकी अपे-
क्षासे 'प्राची' दिशा है. २ इस प्रकरणमें 'पुरुष'पद वस्तुमात्रका बोधक है. एवं जिस
पुरुषसे जो देश अस्ताचलके समीप है वह देश उस पुरुषकी अपेक्षासे 'प्रतीची'
दिशा है. ३ एवं जिस पुरुषसे जो देश सुमेरुपर्वतके समीप है वह देश उस पुरुषकी
अपेक्षासे 'उदीची' दिशा है. ४ एवं (तद्व्यवहिता) सुमेरुपर्वतसे व्यवधानवाला जो
देश है अर्थात् पूर्वमुख स्थित पुरुषके दाहिने हाथका जो देश है वह उस पुरुषकी
अपेक्षासे 'अवाची' दिशा है. जम्बुद्वीपके जो भारतादि ९ वर्ष (खण्ड) उन सबके उत्तर
भागमें सुमेरुकी स्थिति नियमसे रहती है याते पूर्वोक्तग्रन्थ सम्यक् है-इति ।
आत्मानं निरूपयति, आत्मेन्द्रियेति !
भाषा-'आत्मेन्द्रिय' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आत्माका निरूपण करे हैं--
आत्मेन्द्रियाद्यधिष्ठाता-
भाषा-इन्द्रिय तथा शरीरादिके धारण करनेहारा आत्मा है.
आत्मत्वजातिस्तु सुखदुःखादिसमवायिकारणतावच्छेदकतया
सिद्ध्यति । ईश्वरेऽपि सा जातिरस्त्येव, अदृष्टादिरूपकार-
णाभावान्न तु सुखदुःखाद्युत्पत्तिः, नित्यस्य स्वरूपयोग्यत्वे
फलावश्यम्भाव इति नियमस्याप्रयोजकत्वात् ।
भाषा-सुख दुःख ज्ञान इच्छादि कार्योंकी समवायिकारणताका अवच्छेदक जो
आत्मत्वरूप धर्म तद्रूपसे आत्मत्वजातिकी सिद्धि होती है. वह आत्मत्वजाति ईश्वरमें
भी रहती है. अदृष्ट तथा शरीररूप कारणके अभावसे ईश्वर आत्मामें सुख दुःखादिकी
उत्पत्ति नहीं है. यदि कहो कि, नित्यआत्मामें स्वरूप योग्यतारूप कारणता सदा
रहती है याते कदाचित् सुखाद्युत्पत्तिरूप फलभी अवश्य होना चाहिये. तो यह कथन
युक्त नहीं, क्योंकि यह नियम जलके परमाणुओंमें व्यभिचारी होनेसे दूषित है, अर्थात्
जलीयपरमाणुओंमें स्वरूपयोग्यतारूप कारणतः होनेसेभी स्नेहकी उत्पत्ति नहीं होती
किन्तु नित्य है, याते "नित्यस्य०" इत्यादि नियम अप्रयोजक अर्थात् कारणताका
संपादक नहीं है.
परेत्वीश्वरे सा जातिर्नास्त्येव, प्रमाणाभावात् । नच दशम-
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७३
द्रव्यत्वापत्तिः । ज्ञानवत्त्वेन विभजनादिति वदन्ति इन्द्रिया-
दीति । इन्द्रियाणां शरीरस्य च परम्परया चैतन्यसम्पादकः ।
भाषा--कई नैयायिक कहते हैं कि-ईश्वरमें ‘आत्मत्व’ जातिके माननेमें प्रमा-
णका अभाव होनेसे ईश्वरमें ‘आत्मत्व’ जाति नहींहै. शंका-उनके मतमें ईश्वरको
दशम द्रव्य मानना होगा. समाधान-वे आचार्य आत्माका और द्रव्योंसे विभाग
(समवायेन) ज्ञानवत्त्वरूपसे करते हैं; याते दशम द्रव्यत्वकी आपत्तिरूप दोष
नहीं.(इन्द्रियादीति) इन्द्रियोंमें तथा शरीरमें परंपरा अर्थात् अवच्छेदकतासम्बन्धसे
ज्ञानका सम्पादक है. यहां शरीर इन्द्रिय ‘अवच्छेदक’ हैं और आत्मा‘अवच्छेद्य’ है.
यद्यप्यात्मन्यहं जानेऽहं सुखीत्यादिप्रत्यक्षविषयत्वमस्त्येव,तथा-
पि विप्रतिपन्नं प्रति प्रथमत एव शरीरादिभिन्नस्तत्प्रतीतिगोचर
इति प्रतिपादयितुं न शक्यत इत्यतः प्रमाणं दर्शयति,
करणमिति-
भाषा--यद्यपि आत्मामें 'मैं जानता हूं, मैं सुखी हूं' इत्यादि प्रतीति होनेसे
प्रत्यक्ष विषयताभी है तथापि विवाद करनेवाले पुरुषके प्रति प्रथमही यह नहीं कह
सकते कि शरीरादिसे भि 'मैं सुखी' इत्यादि प्रतीतिका विषयही आत्मा है इसलिये
मूलकार उसमें प्रमाण दिखलाताहै-
-करणं हि सकर्तृकम् ॥ ४७ ॥
भाषा-यह नियम है कि जो करण होताहै वह कार्यसम्पादनमें कर्त्ताकी अपेक्षा
रखता है ॥ ४७ ॥
कुठारादीनां छिदादिकरणानां कर्तारमन्तरेण फलानुपधानं
दृष्टम् । एवं चक्षुरादीनां ज्ञानकरणानां फलोपधानमपि कर्तार-
मन्तरेण नोपपद्यत इत्यतिरिक्तः कर्ता कल्प्यते ॥ ४७ ॥
भाषा-छेदनादि क्रियाके करण जो कुठारादि,उनको कर्तातक्षादिसे बिनाफल छिदि
क्रियाके अनुत्पादक देखा है. ऐसेही नेत्रादि इन्द्रियभी प्रत्यक्षज्ञानके करण हैं. इन-
कोभी प्रत्यक्षज्ञानरूप फलजनकता विनाकर्त्तासे नहीं बनसकती;इससे इन्द्रियोंसे जुदा
कर्त्ताकी कल्पना हो सकतीहै ॥ ४७ ॥
ननु शरीरस्यैव कर्तृत्वमस्त्वत आह, शरीरस्येति-
शंका-शरीरहीको कर्ता मानलें तो कुछ दोष नहीं.
७४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- प्रत्यक्ष-
शरीरस्य न चैतन्यं मृतेषु व्यभिचारतः ।
समाधान--कर्ता चेतन होताहै और शरीर चेतन नहींहै; क्योंकि मृतशरीरोंमें
चेतनताका अभाव देखाजाताहै.
ननु चैतन्यं ज्ञानादिकमेव मुक्तात्मनां त्वन्मत इव मृतशरीराणा-
मपि तदभावे का क्षतिः प्राणाभावेन ज्ञानाभावस्य सिद्धेरिति
चेत् । न । शरीरस्य चैतन्ये बाल्ये विलोकितस्य स्थविरे स्मर-
णानुपपत्तेः । शरीराणामवयवोपचयापचयैरूत्पादविनाशशालि-
त्वात् ।
चार्वाक शंका-चैतन्य नाम ज्ञान इच्छादिका है; सो वह जैसे तुम्हारे
मतमें मुक्त आत्मामें नहीं रहते वैसेही हमारे मतमें शरीररूप आत्मामें मृतअवस्थामें
न रहें तो दोष नहीं क्योंकि हमारे मतमें मृत शरीरमुक्त आत्मा है और आपको
शरीरमें ज्ञानाभाव प्राण तथा आत्मा उभयके अभाव प्रयुक्त मानना पड़ता है. हमा-
रेको केवल प्राणके अभावसे शरीरमें ज्ञानाभाव माननेमें लाघव है. समाधान-यदि
शरीर चेतन हो तो बालपनमें देखे पदार्थोंका वृद्ध अवस्थामें स्मरण न होना चाहिये
शरीर पुष्टिक्षीणताकारक अवयवोंके बढ़ने घटनेसे शररिसे उत्पत्ति विनाश स्वभाववाले
अनुभव सिद्ध हैं.
न च पूर्वशरीरोत्पन्नसंस्कारेण द्वितीयशरीरे संस्कार उत्पद्यत
इति वाच्यम् । अनन्तसंस्कारकल्पने गौरवात् । एवं शरीरस्य
चैतन्ये बालकस्य स्तनपानादौ प्रवृत्तिर्न स्यात् । इष्टसाधनता-
ज्ञानस्य तद्धेतुत्वात्तदानीमिष्टसाधनतास्मारकाभावात् । मन्मते
जन्मान्तरानुभूतेष्टसाधनत्वस्य तदानीं स्मरणादेव प्रवृत्तिः ।
शंका-प्रथम शरीरके संस्कार दूसरे शरीरके संस्कारोंके जनकहैं,याते पूर्व देखे पदार्थके
स्मरणकी अनुपपत्ति नहीं है. समाधान-अवयव वृद्धिक्षीणतामयुक्त यावत् शरीर
क्षणक्षणमें बदलते हैं; उनमें यदि पूर्व २ शरीरमें उत्पन्न संस्कारोंसे उत्तर २ शरीरमें
संस्कारोंकी उत्पत्ति माने तो अनेकसंस्कार कल्पनाओंसे अति गौरव होगा. ऐसेही
यदि शरीरही चेतन हो तो प्रथम उत्पन्न हुये बालककी अपनी माताके स्तनसे दूध
पीनेमें प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये;क्योंकि प्रवृत्तिका कारण इष्ट साधनताका "इदं मदि-
ष्टसाधन" इत्याकारक ज्ञान है और प्रथम उत्पन्न स्तनपानप्रवृत्तिके पूर्वकालमें इष्ट-
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७५
साधनताका अनुभावक वा स्मारक कोई आपके मतमें है नहीं याते प्रवृत्ति बन
नहीं सकती और मेरे मतमें तो पूर्वजन्ममें अनुभवकिये इष्टसाधनत्वका ( तदानीं )
प्रथम उत्पन्न स्तनपानप्रवृत्तिके पूर्वकालमें स्मरण होनेसे स्तनपानमें बालककी
प्रवृत्ति बन सकती है.
न च जन्मान्तरानुभूतमन्यदपि स्मर्यतामिति वाच्यम् । उद्बो-
धकाभावात् । अत्र त्वनायत्या जीवनादृष्टमेवोद्बोधकं कल्प्यते ।
इत्थं च संसारस्यानादितयाऽऽत्मनोऽप्यनादित्वसिद्धावनादि भा-
वस्य नाशासम्भवान्नित्यत्वं सिद्ध्यतीति बोध्यम् ।
शंका-यदि जन्मान्तरानुभूत इष्टसाधनताका ज्ञानही संस्कारद्वारा प्रवृत्तिमें कारण
है तो जन्मान्तरानुभूत और पदार्थोंका स्मरणभी होना चाहिये. समाधान-यदि
कोई उद्बोधक हो तो ज्ञानजनित संस्कार उद्बुद्ध होकर स्मृतिके जनक होते हैं प्रकृत-
में पदार्थान्तरोंके संस्कारोंका कोई उद्बोधक नहीं है और स्तनपान प्रवृत्तिमें तो
( अनायत्या ) गति अन्तराभावसे बालकके जीवनके अदृष्टही उद्बोधक कल्पना
कर सकते हैं. इस रीतिसे संसारको अनादि होनेसे जीवात्माभी अनादि सिद्धहुआ
तो अनादिभावपदार्थको विनाशी न होनेसे आत्मा नित्य सिद्ध होसकताहै.
ननु चक्षुरादीनां ज्ञानादौ करणत्वं कर्तृत्वं चास्तु विरोधे साधका-
भावादत आह, तथात्वमिति-
शंका-ज्ञानादि कार्योंके प्रति नेत्रादि इन्द्रियही यदि करण तथा कर्ता मानलिये
जायं तो क्या विरोध है? तथा विरोधका साधक युक्ति प्रमाण कौन है ?
तथात्वं चेदिन्द्रियाणामुपघाते कथं स्मृतिः ॥ ४८ ॥
चैतन्यमित्यर्थः ।
समा०-यदि नेत्रादि इन्द्रियही ( तथात्वं ) चेतनकर्ता स्वरूप हों तो 'तत्तत्'
इन्द्रियके विनाशसे तत्तत्अनुभूत पदार्थका स्मरण कैसे होवे? ॥ ४८ ॥
उपघाते नाशे सति अर्थाच्चक्षुरादीनामेव । कथमिति । पूर्वं
चक्षुषा साक्षात्कृतानां चक्षुषोऽभावे स्मरणं न स्यात् । अनुभवि-
तुरभावात् । अन्यदृष्टस्यान्येन स्मरणासंभवात् । अनुभवस्म-
रणयोः समानाधिकरण्येन कार्यकारणभावादिति भावः ॥ ४९ ॥
७६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-अर्थात् नेत्रादि इन्द्रियोंके विनाश होनेसे प्रथम नेत्रादिद्वारा साक्षात्कृत
पदार्थका स्मरण नेत्रादि विनाशसे पश्चात् नहीं होना चाहिये; क्योंकि उसकालमें
अनुभव करताका अभाव है और दूसरेके देखे पदार्थको दूसरा स्मरण करही नहीं सकता
क्योंकि अनुभवका तथा स्मरणका ( समानाधिकरण ) एक आत्मरूप अधिकरणमें
कार्यकारणभावका नियम है,अर्थात् जैसे-चैत्रके अनुभूत पदार्थको चैत्रही स्मरण कर
सकता है,मैत्र नहीं करसकता; वैसेही नेत्रानुभूत पदार्थका श्रोत्र स्मरण नहीं करसकता.
यही दशा सभी इन्द्रियोंमें जाननी चाहिये; परन्तु स्मरणइन्द्रिय विनाशसे पश्चात्भी
होता है, याते इन्द्रियोंसे पृथक्चेतन कर्ताकी कल्पना होसकती है.
ननु चक्षुरादीनां चैतन्यं मास्तु मनसस्तु नित्यस्य चैतन्यं स्या-
दत आह, मनोऽपीति-
शंका-मत हो नेत्रादिकोंमें चेतनता; परन्तु मनको चेतन तथा कर्ता मानले तो
क्या दोष है ?
मनोऽपि न तथा ज्ञानाद्यनध्यक्षं तदा भवेत् ।
न तथा न चेतनमित्यर्थः ।
समाधान-मनभी चेतन नहींहै यदि मनचेतन हो तो ज्ञानादिकोंका साक्षात्कार
नहीं हुआ चाहिये.
ज्ञानादीति । मनसोऽणुत्वात्प्रत्यक्षे च महत्त्वस्य हेतुत्वान्म-
नसि ज्ञानसुखादिसत्त्वे तत्प्रत्यक्षानुपपत्तिरित्यर्थः।यथा मनसो-
ऽणुत्वं तथा वक्ष्यते ।
भाषा-अर्थात् मुनियोंने मनको अणुपरिमाणवाला माना है और प्रत्यक्षमें
महत्त्व परिमाणको कारणता है. एवं ज्ञानसुखदुःखादि गुण यदि मनहीमें मान लिये
जायँ तो उनका प्रत्यक्ष नहीं होगा.जिस युक्तिसे मन अणुपरिमाणवाला है वह युक्ति
मूलकार स्वयं ८५ की कारिकामें कहेगा.
नन्वस्तु विज्ञानमेवात्मा, तस्य स्वतः प्रकाशरूपत्वाच्चेतनत्वम्।
ज्ञानसुखादिकं तु तस्यैवाकारविशेषः, तस्यापि भावत्वादेव क्ष-
णिकत्वम्, पूर्वपूर्वविज्ञानस्योत्तरोत्तरविज्ञाने हेतुत्वात् सुषुप्ता-
वप्यालयविज्ञानधारा निराबाधैव, मृगमदवासनावासितवसन इव
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७७
पूर्वपूर्वविज्ञानजनितसंस्काराणामुत्तरोत्तरविज्ञाने संक्रान्तत्वा-
न्नानुपपत्तिः स्मरणादेरिति चेत् । न ।
विज्ञानवादी बौद्ध-शंका-बुद्धिहीको आत्मा मानना उचित है. वह स्वयं
प्रकाशरूपा होनेसे चेतनाभी है. बुद्धिहीके स्वरूपविशेष ज्ञानसुखदुःखादिभी हैं. वह बुद्धि
भी भावपदार्थ है याते बाह्य 'दीपशिखादि पदार्थोंवत्' क्षण२परिणामवाली है. प्रथम२
क्षणमें उत्पन्न हुआ विज्ञान पीछेपीछे उत्पन्न होनेवाले विज्ञानमें यथाक्रम कारणीभूत
है. वही विज्ञान 'प्रवृत्तिविज्ञान १ आलयविज्ञान २' भेदसे दोप्रकारका है. उनमें “अर्थ
घटः” इत्यादि प्रवृत्तिविज्ञान है और “अहमहम्” इत्याकारक आलयविज्ञान है. उस
आलयविज्ञानकी क्षण २ परिणामिनी धारा (सुषुप्ति) गाढ निद्रावस्थामेंभी विद्यमान
है. जैसे वस्त्रकी कईएक तहमें लपेटी (मृगमद) कस्तूरीकी वासना वस्त्रोंमें एकसे
दूसरेमें दूसरेसे तीसरेमें यथाक्रम जातीहै, वैसेही पूर्व २ विज्ञानके अनुभवजन्य संस्का-
रोंका उत्तर २ विज्ञानोंमें संचार होताहै याते पूर्वविज्ञानसे अनुभूत पदार्थका उत्तर
विज्ञानसे स्मरणभी बन सकताहै.
तस्य जगद्विषयकत्वे सर्वज्ञत्वापत्तेः । यत्किञ्चिद्विषयत्वे
विनिगमनाभावात् । सुषुप्तावपि विषयावभासप्रसङ्गाच्च ज्ञानस्य
सविषयत्वात् । तदानीं निराकारा चित्सन्ततिरनुवर्तत इति
चेत् । न । तस्याः स्वप्रकाशत्वे प्रमाणाभावात्। अन्यथा घटादी-
नामपि ज्ञानत्वापत्तिः ।
समाधान-वह तवाभिमतविज्ञान यावत् जगत्को विषय करता है कि ( यत्किं-
चित् ) किसीएक पदार्थको विषय करता है यदि यावत् जगत्को विषय करता है
तो पुरुषको सर्वज्ञ होना चाहिये; यदि किसी एक पदार्थको कहो तो (विनिगमनाविरह)
एक पक्ष प्रतिपादकयुक्तिका अभाव है अर्थात् तुम 'यत्किंचित्'पदसे घट ग्रहण करो
तो हम उसीसे पट या मठ ग्रहण करें तो आपके पास घटग्रहण पक्षमात्रको कहने-
वाली कोई प्रबल युक्ति नहीं है और तुम्हारे मतमें गाढ निद्राकालमेंभी विषयोंकी
प्रतीति होनी चाहिये; क्योंकि विज्ञानस्वरूपसे सविषयकही होताहै वह आलयविज्ञान
धारारूपेण सुषुप्तिमेंभी विद्यमान है. बौद्ध-हमलोग सुषुप्तिकालमें निर्विषयाही
विज्ञानसंतति मानतेहैं. नैयायिक-निर्विषय विज्ञानसंततिके प्रकाशरूप होनेमें कोई
प्रमाण नहींहै; ( अन्यथा ) प्रमाणसे विनाही यदि सुषुप्तिकालमें ज्ञानस्वरूपता
स्वीकृत हो तो घटपटादि पदार्थोंकोभी विज्ञानस्वरूप मान लेनेमें कोई बाधक नहींहै.
७८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
न चेष्टापत्तिः, विज्ञानव्यतिरिक्तवस्तुनोऽभावादिति वाच्यम् ।
घटादेरनुभूयमानस्यापल्पितुमशक्यत्वात् । आकारविशेष एवा-
यं विज्ञानस्येति चेत् । किमयमकारोऽतिरिच्यते विज्ञानात्, तर्हि
समायातं विज्ञानव्यतिरिक्तेन । नातिरिच्यते चेत्तर्हि समूहालम्बने
नीलाकारोऽपि पीताकारः स्यात्, स्वरूपतो विज्ञानस्यावि-
शेषात् ।
बौद्ध-घटादि यावत् पदार्थोंमें विज्ञानस्वरूपता हमको अभिमत है; क्योंकि
हमारे मतमें वस्तुमात्र विज्ञानस्वरूपही है; पृथक् नहीं. नैयायिक-बाह्य विषयरू-
पेण अनुभव किये घटादि पदार्थोंका केवल विज्ञानरूप मानके निराकरण करना अयोग्य
है. बौद्ध-यह घटपटादि पदार्थजात विज्ञानहीके आकारविशेष हैं, याते विज्ञानस्वरू-
पही हैं. नैयायिक-क्या वह विज्ञानका आकारविशेष विज्ञानके स्वरूपसे जुदा है
कि विज्ञानस्वरूपही है. यदि जुदा कहो तो घटपटादि पदार्थ जातविज्ञानसे भिन्न
स्वयंसिद्ध हुए. यदि कहो कि जुदा नहीं है तो "नीलपीते" इत्याकारक समूहालं
म्बन ज्ञानमें नीलाकारभी पीताकारही प्रतीत होना चाहिये अथवा पीताकारभी
नीलाकारही प्रतीत होना चाहिये; क्योंकि स्वरूपसे विज्ञानमें कुछ भेद नहीं है किन्तु
एकही है.
अपोहरूपो नीलत्वादिर्विज्ञानधर्म इति चेत् । नीलत्वादीनां विरु-
द्धानामेकस्मिन्नसमावेशात् । इतरथा विरोधस्यैव दुरुपपन्नत्वात्।
नवा वासनासंक्रमः संभवति । मातृपुत्रयोरपि वासनासंक्रमप्रस-
ङ्गात् । न चोपादानोपादेयभावो नियामक इति वाच्यम्, वास-
नायाः संक्रमासंभवात् । उत्तरस्मिन्नुत्पत्तिरेव संक्रम इति चेत्।
न । तदुत्पादकाभावात् ।
बौद्ध-नीलत्वपीतत्वादि उसी विज्ञानके धर्म विशेष (अपोहरूप) अनीलव्या-
वृत्चित्वादिरूपसे प्रतीत होते हैं. नैयायिक-नीलत्वादि विरुद्धधर्मोका एक विज्ञान
रूप धर्मीमें समावेश अयुक्त है. (इतरथा) परस्पर विरुद्ध धर्मोको एकधर्मनिष्ठ मान
लेनेसे संसारके पदार्थोंमें विरोधका निश्चयही नहीं होगा और पूर्व कहा जो वासना
संचार वहभी नहीं होसकता; यदि हो तो माताके देखे पदार्थका गर्भनिष्ठ बालकको
भी स्मरण होनाचाहिये. बौद्ध-उपादानरूप कारणकी वासनाका उपादेयरूप कार्य-
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७९
में संचार होता है और माता अपने पुत्रका निमित्त कारण है याते दोष नहीं है.
नैयायिक-वासनाका संचार होना असम्भव है. बौद्ध-पूर्व २ विज्ञानवासनाकी
उत्तर २ विज्ञानमें उत्पत्ति होनी इसीका नाम संचार है. नैयायिक-उत्पन्न करनेवाले कर्त्ता
के अभाव होनेसे वासनाकी उत्तर२ उत्पत्ति नहीं हो सकती.
उत्तरविज्ञानस्यैवोत्पादकत्वे तदानन्त्यप्रसङ्गः । क्षणिकविज्ञाने-
ऽतिशयविशेषः कल्प्यत इति चेत् । न । मानाभावात्कल्पना-
गौरवाच्च ।
बौद्ध-उत्तर २ विज्ञानही पूर्व२ विज्ञानवासनाका उत्पादक होसकता है. नैया-
यिक-यदि विज्ञानोंहीको वासना उत्पादक मानो तो विज्ञानोंके असंख्यात होनेसे
वासनाओंकोभी असंख्यातही मानना होगा याते अत्यन्त गौरव होगा. बौद्ध-हम
लोग उत्तर २ क्षणिक विज्ञानमें वासनासंचारार्थ ( अतिशय ) शक्ति विशेषकी
कल्पना करते हैं. नैयायिक-ऐसी निर्मूल कल्पनामें कोई प्रमाण नहीं है और क्ष-
णिक अनन्तशक्ति तथा उसके अनेक प्रागभाव और ध्वंस कल्पनेमें कल्पना
गौरवभी है.
एतेन क्षणिकशरीरेष्वेव चैतन्यमपि प्रत्युक्तम् । गौरवादतिशये
मानाभावाच्च । बीजादावपि सहकारिसमवधानासमवधानाभ्यामे-
वोपपत्तेः कुर्वद्रूपत्वाकल्पनाच्च ।
भाषा-कई एक वादी क्षणिक शरीरोंहीको चेतन मानते हैं. सो इस पूर्व कथनसे उन
का कथनभी खण्डन किया पूर्वोक्त रीतिसे वासनासंचार नहीं होसकेगा; गौरव होगा
और संचारक (अतिशय) शक्ति विशेष माननेमें कोई प्रमाण नहीं है. बौद्ध-लोक
में ऐसा देखनेमें आताहै कि-क्षेत्रमें बोएहुये बीजहीसे अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है.
कसूलमें पड़ेहुए बीजसे नहीं होती याते अंकुररूप कार्यके प्रति “कुर्वद्रूपता”
अर्थात् अंकुरजननयोग्य जाति विशेषको हम कारणता मानते हैं. वह फलोत्पादक
क्षणिक समर्थ बीजमात्रमें रहती है. ऐसेही प्रकृतमेंभी क्षणिक शरीरोंमें ‘कुर्वद्रूप’
उत्तर२ वासना जनक जाति विशेषहीको कारण माननेसे निर्वाह होसकता है. वह कुर्वद्-
रूप जातिविशेष दृष्टान्तमें तो बीजत्वके साथ समव्याप्त है और दार्ष्टान्तमें विज्ञानत्वके
साथ समव्याप्त है; याते वासनासंचार होसकता है. नैयायिक-दृष्टान्तरूप बीजहीमें
‘कुर्वद्रूप’ अंकुर जनन योग्य जाति विशेषकी कल्पना करनी अनुचित है. अंकुरादि
की उत्पत्ति तो (सहकारी) भूमिजलादिके संयोगसेभी बनसकती है.
८० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
अस्तु तर्हि क्षणिकविज्ञाने गौरवान्नित्यविज्ञानमेवात्मा “अवि-
नाशी वा अरे अयमात्मा” “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यादि
श्रुतेश्च, इति चेत्। न। तस्य सविषयत्वासम्भवस्य दर्शितत्वात्।
निर्विषयस्य ज्ञानत्वे मानाभावात्, सविषयत्वस्याप्यननुभवात् ।
अतो विज्ञानादिभिन्नो नित्य आत्मेति सिद्धम् ।
वेदान्ती शंका-यदि आत्माके क्षणिक विज्ञानस्वरूप माननेमें गौरव है तो नित्य
विज्ञान स्वरूपही मानना उचित है और इसम “अरे मैत्रेयी यह आत्मा
अविनाशी है” “सत्यस्वरूप है ज्ञानस्वरूप है, तथा आनन्दस्वरूप है” इत्याद्या-
र्थक उपनिषद्वाक्य भी प्रमाण हैं. नैयायिक-वह नित्य विज्ञानभी
सविषयक है कि निर्विषयक है? यदि सविषयक कहो तो यावत्
प्रपंचविषयक है कि, यत्किंचित् वस्तुविषयक है? प्रथम पक्षमें सर्वज्ञत्वा-
पत्ति और द्वितीय पक्षमें विनिगमनाविरहा पूर्वोक्त रीतिसे जान लेना. और यदि
कहो कि नित्यविज्ञान निर्विषयक है तो निर्विषयक विज्ञानमें कोई प्रमाण नहीं,
अर्थात् ऐसा कोईभी प्रत्यय नहीं जो कि किसी एक वस्तुको विषय न करे [और
यदि कहो कि जिस जिस वस्तुको जो जो आत्मा ग्रहण करताहै उस २ विज्ञान
स्वरूप आत्माको तत्तद्विषयकत्व है तो यहभी युक्त नहीं] क्योंकि ‘नित्य विज्ञान
स्वरूप आत्मा सविषयक है’ इत्याकारक अनुभव होनाभी दुर्घट है इसलिये विज्ञा-
नादिकोंसे भिन्न नित्य आत्मा स्वयं सिद्ध होताहै.
सत्यं ज्ञानमिति हि ब्रह्मपरं जीवेषु नोपयुज्यते। ज्ञानाज्ञानसुखि-
त्वदुःखित्वादिभिर्जीवानां भेदसिद्धौ सुतरामीश्वरभेदोऽन्यथा
बन्धमोक्षव्यवस्थानुपपत्तिः। योऽपीश्वराभेदबोधको वेदः सोऽपि
तदभेदेन तदीयत्वं प्रतिपादयन् स्तौति । अभेदभावनयैव च
यतितव्यमिति वदति। अत एव ‘सर्व एवात्मनि समर्पिताः’ इति
श्रूयते ।
भाषा-और पूर्व कहे श्रुतिवाक्योंमें प्रथम वाक्य जीवको अविनाशी कहता है सो
हमको इष्टहै. द्वितीय वाक्य परमात्माको सत्यस्वरूप तथा ज्ञानस्वरूप कहता है उसका
जीवोंमें कुछ उपयोगही नहीं. हरएक जीवके ज्ञान अज्ञान सुख दुःख इच्छा आदिके
भिन्न २ होनेसे जीवोंका परस्पर भेद सिद्ध होता है. एवं जीव परस्पर भिन्न सिद्ध हुए तो
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ८१
ईश्वरका जीवोंसे भेद स्वयं सिद्ध हुआ; (अन्यथा) यदि ईश्वरको जीवात्मास्वरूप
माने तो बन्धमोक्षकी व्यवस्था नहीं होगी अर्थात् सब जीवोंका आत्मा ईश्वर स्वरूप
माननेसे कोई संसारी बद्ध है और कोई ज्ञानी मुक्त है यह व्यवस्था नहीं बनेगी और
जो जीव ईश्वरके अभेद कहनेवाले “तत्त्वमसि-तुम ब्रह्मस्वरूपहो"इत्याद्यर्थक उपनिष-
द्वाक्य हैं;वेभी अभेदरूपसे स्वामि सेवकभाव सम्बन्धको बोधन करते हुए जीवकी
प्रशंसाकरतेहैं ‘अभेदभावनासे परमात्मामें प्रेमाभक्ति करनी चाहिये' ऐसी शिक्षादेतेहैं.
अर्थात् जैसे अपना आप हरएकको प्रिय है वैसाही प्रेम ईश्वरसेभी करना उचित है.
इसी तात्पर्यसे “विद्वान् अपने पुत्ररूप आत्माकी तथा शरीररूप आत्माको तथा
मुख्य आत्माको ईश्वरमें समर्पण करता है” ऐसा उपनिषदमें श्रवण होताहै.
मोक्षदशायामज्ञाननिवृत्तावभेदो जायत इत्यपि न । भेदस्य
नित्यत्वेन नाशायोगात् । भेदनाशेऽपि व्यक्तिद्वयं स्थास्यत्येव ।
न च द्वित्वमपि नश्यतामिति वाच्यम् । तव निर्धर्मके ब्रह्मणि
सत्यत्वाभावेऽपि सत्यस्वरूपं तदितिवद्वित्वाभावेऽपि व्यक्तिद्व-
यात्मकौ ताविति सुवचत्वात् ।
वेदान्ती-भेद अज्ञानकृत है, मोक्षअवस्थामें अज्ञान निवृत्त होनेसे अभेद
उत्पन्न होताहै. नैयायिक-भेद केवलान्वयी होनेसे नित्य है. इसका नाश होना
असम्भव है. वेदान्ती-औपाधिक भेदका नाशही मान लिया जाय तो क्या
दोष है? नैयायिक-मोक्षकालमें औपाधिक भेद नाश हुएभी व्यक्तिद्वय भिन्न२
रहती हैं. वेदांती-व्यक्तिद्वयमें द्वित्वकाभी नाश माने तो क्या दोष है? नैया-
यिक-जैसे तुमारे मतमें यावत् धर्मशून्य ब्रह्ममें सत्यत्वधर्म नहींभी है परंतु तो.
भी ब्रह्म सद्रूप है वैसे हमारे मतमेंभी मोक्षकालमें जीव ईश्वरनिष्ठ द्वित्वरूप धर्मके
नाश हुएभी वह परस्पर द्वयात्मक हैं; यह कहना सुवच है.
मिथ्यात्वाभावोऽधिकरणात्मकस्तत्र सत्यत्वमिति चेत् । एक-
त्वाभावो व्यक्तिद्वयात्मको द्वित्वमप्युच्यताम् । प्रत्येकमेकत्वे-
ऽपि पृथिवीजलयोर्न गन्ध इतिवदुभयं नैकमित्यस्य सर्वजन-
सिद्धत्वात् । योऽपि तदानीमभेदप्रतिपादक आगमः सोऽपि
निर्दुःखत्वादिना साम्यं प्रतिपादयति, संपदाधिक्ये पुरोहितोऽयं
राजा संवृत्त इतिवत् । अत एव “निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति”
इति श्रूयते ।
६
८२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वेदांती-हमारे मतमें मिथ्या प्रपंचके अभावका अधिकरण जो ब्रह्म तत्स्वरूप
ही सत्यत्व है, पृथक् नहीं. नैयायिक-हमारे मतमेंभी एकत्व संख्याका अभाव
स्वरूप व्यक्तिद्वयात्मक द्वित्व मोक्षकालमें जानो. जैसे, लोकमें यह प्रत्यय होता है
कि--पृथ्वी तथा जल दोनों गन्धवाले नहीं हैं किन्तु एक पृथ्वी है, वैसेही हरएक व्यक्तिमें
एकत्व हैभी परन्तु दोनों एक नहीं यह प्रत्यय सर्वजन सिद्ध है और जो मोक्षदशामें
अभेद कहनेवाला "ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति--अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मस्वरूप होता है"
इत्यादि शास्त्र है, वहभी मोक्षकालमें दुःखादिकोंके अभावको बोधन करताहुआ जीव-
को ईश्वर सदृशता कहताहै. जैसे, धनादिसंपदाके अधिक होनेसे परोहित आदिकोंमें
लोग राजा व्यवहार करने लगजाते हैं वैसेही मोक्षकालमें यावत् दुःखाभाव प्रयुक्त
जीवमें ईश्वरतुल्यताका व्यवहार है. (अतएव) "ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति" इस श्रुतिको
मोक्षकालमें साम्य प्रतिपादक होनेहीसे यह जीव ( निरंजन ) निर्दुःखित हुआ ईश्वर
की परमतुल्यताको प्राप्त होता है; इत्याद्यर्थ बोधक श्रुतिवाक्यभी एकवाक्यता-
पन्न होसकता है.
ईश्वरोऽपि न ज्ञानसुखात्मा, किंतु ज्ञानाद्याश्रयः । “नित्यं वि-
ज्ञानमानन्दं ब्रह्म” इत्यादौ विज्ञानपदेन ज्ञानाश्रय एवोक्तः,“यः
सर्वज्ञः स सर्ववित्” इत्याद्यनुरोधात्।आनन्दमित्यस्याप्यानन्द-
वदित्यर्थः ।
भाषा-ईश्वरभी ज्ञानसुखादिस्वरूप नहीं किन्तु ज्ञानसुखादिका आश्रय है.
"नित्य विज्ञान तथा आनन्दस्वरूप ब्रह्म है" इत्याद्यर्थक 'श्रुतिवाक्योंमें' विज्ञान पद
अधिकरणार्थक 'ल्युट्' प्रत्ययान्त है; यांतें 'विज्ञान' पदसे ज्ञानके आश्रयहीका बोध
होता है "जो सर्व पदार्थोंके सामान्यरूपसे ज्ञानवाला है, वही विशेषरूपसे ज्ञान-
वाला है" एतदर्थक श्रुतिसेभी ज्ञानवाला प्रतीत होता है; ज्ञानस्वरूप नहीं. इसीके
अनुकूल 'विज्ञान'पदका अर्थभी विज्ञानवालाही करना उचित है श्रुतिनिष्ठ 'आनन्द'पद
काभी आनन्दवाला यही अर्थ करना उचित है.
अर्शआदित्वान्मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययात् । अन्यथा पुंलिङ्गत्वापत्तिः।
आनन्दोऽपि दुःखाभाव उपचर्यते, भाराद्यपगमे सुखी संवृत्तो
ऽहमितिवद्दुःखाभावेन सुखित्वप्रत्ययात् ।
भाषा-“अर्शआदिभ्योऽच् । ५ । २ । १२७ ।” इस सूत्रसे मतुप् अर्थक 'अच्'
प्रत्यय करनेसे “आनन्दोऽ स्यास्मिन् वाऽस्तीति आनन्दम्” ऐसी व्यु-
त्पत्ति हुई तो 'आनन्द' शब्द समवायेन आनन्दाश्रयका बोधक नपुंसकलङ्ग तथा
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ८३
ब्रह्मशब्दका विशेषण साधुरीतिसे होसकता है; ( अन्यथा ) यदि पूर्वोक्त रीतिसे 'आ-
नन्द' शब्दकी सिद्धि नहीं माने किन्तु “भावे ३।३।१८” इस सूत्रसे 'घञ्' प्रत्ययान्त
माने तो नियत पुँल्लिङ्ग होना चाहिये; क्योंकि घञ्प्रत्ययान्त शब्दोंको “घञबन्तः ३५”
यह लिङ्गानुशासनका सूत्र नियमसे पुलिङ्गता बोधन करता है. आनन्दशब्दभी
लक्षणावृत्तिसे दुःखाभावहीका बोधक है. जैसे, भारवाही पुरुष भार त्यागनेसे
अपनेको सुखी मानताहै वैसेही दुःखाभाव होनेसे सुख प्रत्यय होता है.
अस्तु वा तस्मिन्नानन्दो नत्वसावानन्दोऽसुखमिति श्रुतेः । न
विद्यते सुखं यस्येति कुतो नार्थ इति चेत् । न । क्लिष्टकल्पनापत्तेः,
प्रकरणविरोधादानन्दमित्यत्र मत्वर्थीयप्रत्ययविरोधाच्च । “आन-
न्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कदाचन” इत्यत्र भेदस्य स्पष्टत्वाच्च
इति संक्षेपः ।
भाषा-अथवा वह ईश्वर आनन्दका अधिकरणभी रहो तो हमारे मतकी हानि नहीं
तथापि वह आनन्दस्वरूप नहीं; क्योंकि श्रुतिमें उसकी “असुखम्” ऐसा सुना है. यहां 'नञ्'
ब्रह्मसे सुखका भेद बोधन करता है और अपनेमें अपना भेद असम्भव है याते ब्रह्म
आनन्दस्वरूप नहीं किन्तु आनन्दका अधिकरण है. वेदान्ती शंका-विद्यमान नहींहै
सुख जिसमें किसी सम्बन्धसे वही 'असुख' अर्थात् 'सुखस्वरूप' यह अर्थ बहुव्रीहि
समाससे लाभ होता है; इसके माननेमें क्या दोष है ? नैयायिक-बहुव्रीहिसमास-
में अन्य पदार्थ प्रधान होताहै, प्रकृतमें अन्यपदार्थमें 'नञ्'की लक्षणा माननी क्लिष्ट
कल्पना है; ( प्रकरणविरोधात् ) अर्थात् “अस्थूलमनणु अदीर्घमह्रस्वम्--ब्रह्म स्थूल
पदार्थोंसे तथा अणुदीर्घ ह्रस्व पदार्थोंसे भिन्न है” इत्याद्यर्थक एक बृहदारण्यक उप-
निषद्का वाक्य है, इसके प्रत्येक पदमें 'नञ्तत्पुरुष' समास स्पष्टरूपसे प्रतीत होता
है और इसी श्रुतिके मध्यमें 'असुखम्' इस पदका पाठभी है. यदि इस पदमें बहुव्रीहि
मानेंगे तो प्रकरणविरोध अवश्य होगा और यदि यहां बहुव्रीहि मानके 'सुखस्वरूप'
ऐसा अर्थ करभी लें तो 'आनन्दम्' इस शब्दमें 'मत्वर्थ'अर्थक 'अच्'प्रत्ययके साथ विरोध
तो अवश्य होगा; क्योंकि यह प्रत्यय सुखके अधिकरणका बोधक है और बहुव्रीहिसे
सुखस्वरूपका बोधन हुआ याते परस्पर विरोध स्पष्ट है, और जो पुरुष ब्रह्मके आ-
नन्दको जानता है वह कदापि किसीसे भयको प्राप्त नहीं होता. इस वाक्यमें
आनन्दका तथा उसके अधिकरणका भेद षष्ठी विभक्तिसे स्पष्टही प्रतीत होता है.
यह वेदान्तीके प्रति संक्षेपसे कहा है-इति ॥
८४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
एतेन प्रकृतिः कर्त्री, पुरुषस्तु पुष्करपलाशवन्निर्लेपः किंतु चेत-
नः, कार्यकारणयोरभेदात्कार्यनाशे सति कार्यरूपतया नाशः
स्यादित्यकारणत्वं तस्य।
भाषा—'एतेन' इस पदका 'इति मतमपास्तम्' इस अग्रिम पाठके साथ सम्बन्ध
है; अर्थात् 'एतेन' इस पूर्वोक्त युक्तिद्वारा आत्माको ज्ञानाधिकरण सिद्ध करनेसे
तथा आगे कथनीय युक्तिसे (इति मतं) सांख्यशास्त्रमें कहा कपिलमुनिका मतभी
(अपास्तम्) खण्डन किया है. सांख्यीके मतमें मूलप्रकृतिही आद्यकर्तारूप है और
(पुरुष) जीवात्मा जलगत कमलपत्रकी तरह अलिप्त है; परन्तु चेतन है. इस
मतमें कार्यका तथा उपादानकारणका परस्पर अभेद है कार्यके नाश होनेसे कार्य-
रूपहीसे कारणकाभी नाश मानना पड़ता है इसलिये पुरुष किसी कार्यका उपादा-
नकारण नहीं, याते विनाशीभी नहीं.
बुद्धिगतचैतन्याभिमानादन्यथाऽनुपपत्त्या तत्कल्पनम्
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ८५
भाषा-उस बुद्धिका नेत्रादि इंद्रियरूप प्रणालिका द्वारा ज्ञानरूप परिणाम घटादि
पदार्थोंके साथ सम्बंध है. पुरुषमें कर्तृत्व-'मैं कर्ता हूं' यह अभिमान, एवं बुद्धिमें
चैतन्य ' मैं चेतनाहूं ' यह अभिमान बुद्धिका तथा पुरुषका परस्पर भेद न जाननेसे
है. " ममेदं कर्तव्यम्-अर्थात् मेरेको यह कार्य करने योग्य है " इत्याकारका
बुद्धिमें "मम, इदं, कर्तव्यम्" ये तीन अंश हैं. उनमें प्रथम अंश ( पुरुष ) जीवा-
त्माका है; वहभी जैसे ( दर्पण ) शीशेके स्वच्छ होनेसे उसमें मुखकी प्रतीति
मिथ्याही होजाती है, वैसेही बुद्धिके स्वच्छ होनेसे पुरुष प्रतिबिंबद्वारा ( अतात्त्विक )
झूठा ( उपराग ) सम्बंध रूप है. एवं द्वितीय अंश विषयका है. वही बुद्धि ( इंद्रिय )
नेत्रादिद्वारा परिणामको प्राप्त हुई विषयको ग्रहण करती है; जैसे शीशेपर ( निः-
श्वासाभिहत ) फूत्कार मारनेसे ( मलिणिमा ) छाईका सम्बन्ध ( तात्त्विक ) सच्चा
हो जाता है; वैसेही बुद्धिका परिणाम रूपसे विषयके साथ सम्बन्ध वास्तव है. एवं
तृतीय व्यापार अंशका भान है. वह बुद्धिका अपना तथा तात्त्विक है.
तेनांशत्रयवती बुद्धिस्तत्परिणामेन ज्ञानेन पुरुषस्यातात्त्विकः स-
म्वन्धो दर्पणमलिनिमैव मुखस्योपलब्धिरुच्यते। ज्ञानवत् सुखदुः-
खेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मा अपि बुद्धेरेव कृतिसामानाधिकरण्येन
प्रतीतेः ।
भाषा--इस रीतिसे बुद्धि तीन अंशवाली है और बुद्धिके परिणामरूप ज्ञानके साथभी
पुरुषका अतात्त्विक संबंध है. जैसे-शीशेकी छाईके साथ मुखका संबंध वस्तुतः नहीं
किन्तु मिथ्या है; वैसेही बुद्धि परिणाम ज्ञानके साथभी पुरुषका सम्बन्ध वास्तव
नहीं किन्तु अतात्त्विक है. उसी अतात्त्विक सम्बन्धकी सांख्यशास्त्रमें ( उपलब्धि )
संज्ञा कही है. जैसे-परिणामी ज्ञान बुद्धिका धर्म है, वैसेही सुख दुःख इच्छा द्वेष
प्रयत्न, धर्म और अधर्म ये सातभी बुद्धिकीके धर्म हैं; क्योंकि इन सबकी " अहं
कर्त्ता, अहंसुखी" इत्यादि प्रत्ययोंसे ( कृति ) प्रयत्नके साथ एकाधिकरणत
प्रतीत होती है.
न च बुद्धिश्चेतना, परिणामित्वात्, इति मतमपास्तम्। कृत्यदृष्ट-
भोगानामिव चैतन्यस्यापि सामानाधिकरण्यप्रतीतेस्तद्भिन्ने
मानाभावाच्च ।
भाषा -और प्रयत्न बुद्धिका मुख्य धर्म है. वह बुद्धि(परिणामिनी)अनित्य धर्मोंवाली
होनेसे चिद्रूपा नहीं है, यह सब सांख्याचार्यका मत है. पूर्वोक्त तथा अग्रे मयुक्ती