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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 350 में से

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पृष्ठ 96

७२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
दिगुदीची। तद्व्यवहिता त्ववाची। सर्वेषामेव वर्षाणां मेरुरुत्तरतः
स्थित इति नियमात् ।
भाषा-१जिस पुरुषसे जो देश उदयाचलके समीप है वह देश उस पुरुषकी अपे-
क्षासे 'प्राची' दिशा है. २ इस प्रकरणमें 'पुरुष'पद वस्तुमात्रका बोधक है. एवं जिस
पुरुषसे जो देश अस्ताचलके समीप है वह देश उस पुरुषकी अपेक्षासे 'प्रतीची'
दिशा है. ३ एवं जिस पुरुषसे जो देश सुमेरुपर्वतके समीप है वह देश उस पुरुषकी
अपेक्षासे 'उदीची' दिशा है. ४ एवं (तद्व्यवहिता) सुमेरुपर्वतसे व्यवधानवाला जो
देश है अर्थात् पूर्वमुख स्थित पुरुषके दाहिने हाथका जो देश है वह उस पुरुषकी
अपेक्षासे 'अवाची' दिशा है. जम्बुद्वीपके जो भारतादि ९ वर्ष (खण्ड) उन सबके उत्तर
भागमें सुमेरुकी स्थिति नियमसे रहती है याते पूर्वोक्तग्रन्थ सम्यक् है-इति ।
आत्मानं निरूपयति, आत्मेन्द्रियेति !
भाषा-'आत्मेन्द्रिय' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आत्माका निरूपण करे हैं--
आत्मेन्द्रियाद्यधिष्ठाता-
भाषा-इन्द्रिय तथा शरीरादिके धारण करनेहारा आत्मा है.
आत्मत्वजातिस्तु सुखदुःखादिसमवायिकारणतावच्छेदकतया
सिद्ध्यति । ईश्वरेऽपि सा जातिरस्त्येव, अदृष्टादिरूपकार-
णाभावान्न तु सुखदुःखाद्युत्पत्तिः, नित्यस्य स्वरूपयोग्यत्वे
फलावश्यम्भाव इति नियमस्याप्रयोजकत्वात् ।
भाषा-सुख दुःख ज्ञान इच्छादि कार्योंकी समवायिकारणताका अवच्छेदक जो
आत्मत्वरूप धर्म तद्रूपसे आत्मत्वजातिकी सिद्धि होती है. वह आत्मत्वजाति ईश्वरमें
भी रहती है. अदृष्ट तथा शरीररूप कारणके अभावसे ईश्वर आत्मामें सुख दुःखादिकी
उत्पत्ति नहीं है. यदि कहो कि, नित्यआत्मामें स्वरूप योग्यतारूप कारणता सदा
रहती है याते कदाचित् सुखाद्युत्पत्तिरूप फलभी अवश्य होना चाहिये. तो यह कथन
युक्त नहीं, क्योंकि यह नियम जलके परमाणुओंमें व्यभिचारी होनेसे दूषित है, अर्थात्
जलीयपरमाणुओंमें स्वरूपयोग्यतारूप कारणतः होनेसेभी स्नेहकी उत्पत्ति नहीं होती
किन्तु नित्य है, याते "नित्यस्य०" इत्यादि नियम अप्रयोजक अर्थात् कारणताका
संपादक नहीं है.
परेत्वीश्वरे सा जातिर्नास्त्येव, प्रमाणाभावात् । नच दशम-