न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वेदांती-हमारे मतमें मिथ्या प्रपंचके अभावका अधिकरण जो ब्रह्म तत्स्वरूप
ही सत्यत्व है, पृथक् नहीं. नैयायिक-हमारे मतमेंभी एकत्व संख्याका अभाव
स्वरूप व्यक्तिद्वयात्मक द्वित्व मोक्षकालमें जानो. जैसे, लोकमें यह प्रत्यय होता है
कि--पृथ्वी तथा जल दोनों गन्धवाले नहीं हैं किन्तु एक पृथ्वी है, वैसेही हरएक व्यक्तिमें
एकत्व हैभी परन्तु दोनों एक नहीं यह प्रत्यय सर्वजन सिद्ध है और जो मोक्षदशामें
अभेद कहनेवाला "ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति--अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मस्वरूप होता है"
इत्यादि शास्त्र है, वहभी मोक्षकालमें दुःखादिकोंके अभावको बोधन करताहुआ जीव-
को ईश्वर सदृशता कहताहै. जैसे, धनादिसंपदाके अधिक होनेसे परोहित आदिकोंमें
लोग राजा व्यवहार करने लगजाते हैं वैसेही मोक्षकालमें यावत् दुःखाभाव प्रयुक्त
जीवमें ईश्वरतुल्यताका व्यवहार है. (अतएव) "ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति" इस श्रुतिको
मोक्षकालमें साम्य प्रतिपादक होनेहीसे यह जीव ( निरंजन ) निर्दुःखित हुआ ईश्वर
की परमतुल्यताको प्राप्त होता है; इत्याद्यर्थ बोधक श्रुतिवाक्यभी एकवाक्यता-
पन्न होसकता है.
ईश्वरोऽपि न ज्ञानसुखात्मा, किंतु ज्ञानाद्याश्रयः । “नित्यं वि-
ज्ञानमानन्दं ब्रह्म” इत्यादौ विज्ञानपदेन ज्ञानाश्रय एवोक्तः,“यः
सर्वज्ञः स सर्ववित्” इत्याद्यनुरोधात्।आनन्दमित्यस्याप्यानन्द-
वदित्यर्थः ।
भाषा-ईश्वरभी ज्ञानसुखादिस्वरूप नहीं किन्तु ज्ञानसुखादिका आश्रय है.
"नित्य विज्ञान तथा आनन्दस्वरूप ब्रह्म है" इत्याद्यर्थक 'श्रुतिवाक्योंमें' विज्ञान पद
अधिकरणार्थक 'ल्युट्' प्रत्ययान्त है; यांतें 'विज्ञान' पदसे ज्ञानके आश्रयहीका बोध
होता है "जो सर्व पदार्थोंके सामान्यरूपसे ज्ञानवाला है, वही विशेषरूपसे ज्ञान-
वाला है" एतदर्थक श्रुतिसेभी ज्ञानवाला प्रतीत होता है; ज्ञानस्वरूप नहीं. इसीके
अनुकूल 'विज्ञान'पदका अर्थभी विज्ञानवालाही करना उचित है श्रुतिनिष्ठ 'आनन्द'पद
काभी आनन्दवाला यही अर्थ करना उचित है.
अर्शआदित्वान्मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययात् । अन्यथा पुंलिङ्गत्वापत्तिः।
आनन्दोऽपि दुःखाभाव उपचर्यते, भाराद्यपगमे सुखी संवृत्तो
ऽहमितिवद्दुःखाभावेन सुखित्वप्रत्ययात् ।
भाषा-“अर्शआदिभ्योऽच् । ५ । २ । १२७ ।” इस सूत्रसे मतुप् अर्थक 'अच्'
प्रत्यय करनेसे “आनन्दोऽ स्यास्मिन् वाऽस्तीति आनन्दम्” ऐसी व्यु-
त्पत्ति हुई तो 'आनन्द' शब्द समवायेन आनन्दाश्रयका बोधक नपुंसकलङ्ग तथा