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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 350 में से

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पृष्ठ 92

६८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
बहिरिन्द्रियग्राह्यत्वादूपवत् । इत्थं च शब्दाधिकरणं नवमद्रव्यं
गगननामकं सिद्ध्यतीति । न च वायववयवेषु सूक्ष्मशब्दक्रमेण
वायौ कारणगुणपूर्वकः शब्द उत्पद्यतामिति वाच्यम् । अया-
वद्द्रव्यभावित्वेन वायुविशेषगुणत्वाभावात् ॥ ४४ ॥
भाषा-तत्पश्चात् 'शब्द' दिशाका तथा कालका तथा मनकाभी गुण नहीं है;
रूपकी तरह विशेष गुण होनेसे-इति. ऐसा अनुमान करना उचित है. एवं शब्द
आत्माका विशेष गुणभी नहीं है, रूपकी तरह बाह्य इन्द्रियसे ग्रहणकी योग्यतावाला
होनेसे-इति. इसीरीतिसे शब्दका अधिकरण नवम द्रव्य 'गगन' नामकासिद्ध होता है.
शंका-यदि ऐसा मानलें कि, वायुके अवयवोंमें प्रथम सूक्ष्मशब्द उत्पन्न होता है,
पश्चात् क्रमसे स्थूलवायुमें कारणगुणपूर्वक स्थूल शब्द उत्पन्न होता है तो क्या दोषहै?
समाधान-पृथ्वीआदि चतुष्टयमें जो गुण रहता है वह सभी अपने आश्रयके नाश
होनेसे नाश होता है और शब्द अयावत् द्रव्यभावीहै अर्थात् शब्द के आश्रय द्रव्यके
नाशसे जन्य जो नाश उस नाशका प्रतियोगी शब्द नहीं है; याते शब्दवायुका विशेष
गुणभी नहीं है-
तत्र शरीरस्य विषयस्य चाभावादिन्द्रियं दर्शयति,इन्द्रियमिति-
भाषा-आकाशीय शरीर तथा विषयका अभाव होने से. 'इन्द्रियं' इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार इन्द्रियको दिखलाता है ।
इन्द्रियं तु भवेच्छ्रोत्रं -
भाषा-श्रवण इन्द्रिय आकाशसे उद्बुद्ध हुआ है.
नन्वाकाशं लाघवादेकं सिद्धम्,श्रोत्रं तु पुरुषभेदेन भिन्नं तत्कथ-
माकाशं स्यादत आह, एकः सन्नपीत्यादि-
शंका-आकाश लाघवसे एक सिद्धहै और श्रोत्र तो पुरुषभेदसे भिन्नरहै वहकैसे
आकाश हो सकताहै?समाधान-'एकइत्यादि'ग्रन्थसे मूलकार समाधान लिखताहै-

  • एकः सन्नप्युपाधितः ।
    भाषा-आकाश एकभी उपाधि भेदसे भिन्न २ है.
    आकाश एक एव सन्नप्युपाधेः कर्णशष्कुल्यादेर्भेदाद्भिन्नं श्रोत्रा-
    त्मकं भवतीत्यर्थः ।