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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 350 में से

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पृष्ठ 103

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७९
में संचार होता है और माता अपने पुत्रका निमित्त कारण है याते दोष नहीं है.
नैयायिक-वासनाका संचार होना असम्भव है. बौद्ध-पूर्व २ विज्ञानवासनाकी
उत्तर २ विज्ञानमें उत्पत्ति होनी इसीका नाम संचार है. नैयायिक-उत्पन्न करनेवाले कर्त्ता
के अभाव होनेसे वासनाकी उत्तर२ उत्पत्ति नहीं हो सकती.
उत्तरविज्ञानस्यैवोत्पादकत्वे तदानन्त्यप्रसङ्गः । क्षणिकविज्ञाने-
ऽतिशयविशेषः कल्प्यत इति चेत् । न । मानाभावात्कल्पना-
गौरवाच्च ।
बौद्ध-उत्तर २ विज्ञानही पूर्व२ विज्ञानवासनाका उत्पादक होसकता है. नैया-
यिक-यदि विज्ञानोंहीको वासना उत्पादक मानो तो विज्ञानोंके असंख्यात होनेसे
वासनाओंकोभी असंख्यातही मानना होगा याते अत्यन्त गौरव होगा. बौद्ध-हम
लोग उत्तर २ क्षणिक विज्ञानमें वासनासंचारार्थ ( अतिशय ) शक्ति विशेषकी
कल्पना करते हैं. नैयायिक-ऐसी निर्मूल कल्पनामें कोई प्रमाण नहीं है और क्ष-
णिक अनन्तशक्ति तथा उसके अनेक प्रागभाव और ध्वंस कल्पनेमें कल्पना
गौरवभी है.
एतेन क्षणिकशरीरेष्वेव चैतन्यमपि प्रत्युक्तम् । गौरवादतिशये
मानाभावाच्च । बीजादावपि सहकारिसमवधानासमवधानाभ्यामे-
वोपपत्तेः कुर्वद्रूपत्वाकल्पनाच्च ।
भाषा-कई एक वादी क्षणिक शरीरोंहीको चेतन मानते हैं. सो इस पूर्व कथनसे उन
का कथनभी खण्डन किया पूर्वोक्त रीतिसे वासनासंचार नहीं होसकेगा; गौरव होगा
और संचारक (अतिशय) शक्ति विशेष माननेमें कोई प्रमाण नहीं है. बौद्ध-लोक
में ऐसा देखनेमें आताहै कि-क्षेत्रमें बोएहुये बीजहीसे अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है.
कसूलमें पड़ेहुए बीजसे नहीं होती याते अंकुररूप कार्यके प्रति “कुर्वद्रूपता”
अर्थात् अंकुरजननयोग्य जाति विशेषको हम कारणता मानते हैं. वह फलोत्पादक
क्षणिक समर्थ बीजमात्रमें रहती है. ऐसेही प्रकृतमेंभी क्षणिक शरीरोंमें ‘कुर्वद्रूप’
उत्तर२ वासना जनक जाति विशेषहीको कारण माननेसे निर्वाह होसकता है. वह कुर्वद्-
रूप जातिविशेष दृष्टान्तमें तो बीजत्वके साथ समव्याप्त है और दार्ष्टान्तमें विज्ञानत्वके
साथ समव्याप्त है; याते वासनासंचार होसकता है. नैयायिक-दृष्टान्तरूप बीजहीमें
‘कुर्वद्रूप’ अंकुर जनन योग्य जाति विशेषकी कल्पना करनी अनुचित है. अंकुरादि
की उत्पत्ति तो (सहकारी) भूमिजलादिके संयोगसेभी बनसकती है.