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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 350 में से

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पृष्ठ 93

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६९
भाषा-एकही आकाश ( कर्णशष्कुली ) श्रोत्रछिद्ररूप उपाधिके भेदसे भिन्न २
श्रोत्रात्मक होता है-इति ।
कालं निरूपयति, जन्यानामिति-
भाषा-‘जन्यानां’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कालका निरूपण करे है-
जन्यानां जनकः कालः-
भाषा-जन्य पदार्थोंका ( जनक) साधारण निमित्त कारण काल है,
तत्र प्रमाणं दर्शयितुमाह, जगतामिति-
भाषा-जगतां ‘इत्यादि’ ग्रन्थसे मूलकार कालमें प्रमाण दिखलाता है-
-जगतामाश्रयो मतः ॥ ४५ ॥
भाषा-वह काल सर्व जगत्का आधार है ॥ ४५ ॥
तथाहि । इदानीं घट इत्यादिप्रतीतिः सूर्यपरिस्पन्दादिकं
विषयीकरोति तदा सूर्यपरिस्पन्दादिना घटादेः सम्बन्धो
वाच्यः । स च संयोगादिर्न सम्भवतीति काल एव तत्सम्बन्ध-
घटकः कल्प्यते । इत्थं च तस्याश्रयत्वमपि सम्यक् ॥ ४५ ॥
भाषा-उसका प्रकार यह है कि “इदानींघटः-अर्थात् इसकालमें घटहै” इत्याकारक
(प्रतीति) ज्ञान यदि सूर्यकी क्रियाको विषय करता है तो सूर्यकी क्रियाके साथ
घटादिकोंका कोई सम्बन्ध कहना चाहिये; वह सम्बन्ध संयोगसमवाय तो नहीं है.
किन्तु ‘स्वाश्रयतपनसंयोगि संयोग’ रूपसम्बन्ध है. ‘स्व’ पदसे सूर्यकी क्रियाका
ग्रहण है, उसका आश्रय सूर्य है, उसका संयोगि काल है, उसका संयोग घटादिके
साथ है. इत्याकारक सम्बन्धका (घटक) मध्यपातिरचक कालही कल्पना किया जाताहै.
इस रीतिसे उक्त पदार्थोंसे भिन्न काल सिद्ध हुआ तो उसको पूर्वोक्त जगत्का आधार
भी कहना उचित है ॥ ४५ ॥
प्रमाणान्तरं दर्शयति, परापरत्वेति-
भाषा-‘परापरत्व’इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कालमें प्रमाणान्तर दिखलाता है,
परापरत्वधीहेतुः-
भाषा-परत्व तथा अपरत्व बुद्धिका हेतुभी कालही है.
परत्वापरत्वबुद्धेर साधारणं निमित्तं काल एव । परत्वापरत्वयो-