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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 350 में से

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पृष्ठ 97

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७३
द्रव्यत्वापत्तिः । ज्ञानवत्त्वेन विभजनादिति वदन्ति इन्द्रिया-
दीति । इन्द्रियाणां शरीरस्य च परम्परया चैतन्यसम्पादकः ।
भाषा--कई नैयायिक कहते हैं कि-ईश्वरमें ‘आत्मत्व’ जातिके माननेमें प्रमा-
णका अभाव होनेसे ईश्वरमें ‘आत्मत्व’ जाति नहींहै. शंका-उनके मतमें ईश्वरको
दशम द्रव्य मानना होगा. समाधान-वे आचार्य आत्माका और द्रव्योंसे विभाग
(समवायेन) ज्ञानवत्त्वरूपसे करते हैं; याते दशम द्रव्यत्वकी आपत्तिरूप दोष
नहीं.(इन्द्रियादीति) इन्द्रियोंमें तथा शरीरमें परंपरा अर्थात् अवच्छेदकतासम्बन्धसे
ज्ञानका सम्पादक है. यहां शरीर इन्द्रिय ‘अवच्छेदक’ हैं और आत्मा‘अवच्छेद्य’ है.
यद्यप्यात्मन्यहं जानेऽहं सुखीत्यादिप्रत्यक्षविषयत्वमस्त्येव,तथा-
पि विप्रतिपन्नं प्रति प्रथमत एव शरीरादिभिन्नस्तत्प्रतीतिगोचर
इति प्रतिपादयितुं न शक्यत इत्यतः प्रमाणं दर्शयति,
करणमिति-
भाषा--यद्यपि आत्मामें 'मैं जानता हूं, मैं सुखी हूं' इत्यादि प्रतीति होनेसे
प्रत्यक्ष विषयताभी है तथापि विवाद करनेवाले पुरुषके प्रति प्रथमही यह नहीं कह
सकते कि शरीरादिसे भि 'मैं सुखी' इत्यादि प्रतीतिका विषयही आत्मा है इसलिये
मूलकार उसमें प्रमाण दिखलाताहै-
-करणं हि सकर्तृकम् ॥ ४७ ॥
भाषा-यह नियम है कि जो करण होताहै वह कार्यसम्पादनमें कर्त्ताकी अपेक्षा
रखता है ॥ ४७ ॥
कुठारादीनां छिदादिकरणानां कर्तारमन्तरेण फलानुपधानं
दृष्टम् । एवं चक्षुरादीनां ज्ञानकरणानां फलोपधानमपि कर्तार-
मन्तरेण नोपपद्यत इत्यतिरिक्तः कर्ता कल्प्यते ॥ ४७ ॥
भाषा-छेदनादि क्रियाके करण जो कुठारादि,उनको कर्तातक्षादिसे बिनाफल छिदि
क्रियाके अनुत्पादक देखा है. ऐसेही नेत्रादि इन्द्रियभी प्रत्यक्षज्ञानके करण हैं. इन-
कोभी प्रत्यक्षज्ञानरूप फलजनकता विनाकर्त्तासे नहीं बनसकती;इससे इन्द्रियोंसे जुदा
कर्त्ताकी कल्पना हो सकतीहै ॥ ४७ ॥
ननु शरीरस्यैव कर्तृत्वमस्त्वत आह, शरीरस्येति-
शंका-शरीरहीको कर्ता मानलें तो कुछ दोष नहीं.