न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ८१
ईश्वरका जीवोंसे भेद स्वयं सिद्ध हुआ; (अन्यथा) यदि ईश्वरको जीवात्मास्वरूप
माने तो बन्धमोक्षकी व्यवस्था नहीं होगी अर्थात् सब जीवोंका आत्मा ईश्वर स्वरूप
माननेसे कोई संसारी बद्ध है और कोई ज्ञानी मुक्त है यह व्यवस्था नहीं बनेगी और
जो जीव ईश्वरके अभेद कहनेवाले “तत्त्वमसि-तुम ब्रह्मस्वरूपहो"इत्याद्यर्थक उपनिष-
द्वाक्य हैं;वेभी अभेदरूपसे स्वामि सेवकभाव सम्बन्धको बोधन करते हुए जीवकी
प्रशंसाकरतेहैं ‘अभेदभावनासे परमात्मामें प्रेमाभक्ति करनी चाहिये' ऐसी शिक्षादेतेहैं.
अर्थात् जैसे अपना आप हरएकको प्रिय है वैसाही प्रेम ईश्वरसेभी करना उचित है.
इसी तात्पर्यसे “विद्वान् अपने पुत्ररूप आत्माकी तथा शरीररूप आत्माको तथा
मुख्य आत्माको ईश्वरमें समर्पण करता है” ऐसा उपनिषदमें श्रवण होताहै.
मोक्षदशायामज्ञाननिवृत्तावभेदो जायत इत्यपि न । भेदस्य
नित्यत्वेन नाशायोगात् । भेदनाशेऽपि व्यक्तिद्वयं स्थास्यत्येव ।
न च द्वित्वमपि नश्यतामिति वाच्यम् । तव निर्धर्मके ब्रह्मणि
सत्यत्वाभावेऽपि सत्यस्वरूपं तदितिवद्वित्वाभावेऽपि व्यक्तिद्व-
यात्मकौ ताविति सुवचत्वात् ।
वेदान्ती-भेद अज्ञानकृत है, मोक्षअवस्थामें अज्ञान निवृत्त होनेसे अभेद
उत्पन्न होताहै. नैयायिक-भेद केवलान्वयी होनेसे नित्य है. इसका नाश होना
असम्भव है. वेदान्ती-औपाधिक भेदका नाशही मान लिया जाय तो क्या
दोष है? नैयायिक-मोक्षकालमें औपाधिक भेद नाश हुएभी व्यक्तिद्वय भिन्न२
रहती हैं. वेदांती-व्यक्तिद्वयमें द्वित्वकाभी नाश माने तो क्या दोष है? नैया-
यिक-जैसे तुमारे मतमें यावत् धर्मशून्य ब्रह्ममें सत्यत्वधर्म नहींभी है परंतु तो.
भी ब्रह्म सद्रूप है वैसे हमारे मतमेंभी मोक्षकालमें जीव ईश्वरनिष्ठ द्वित्वरूप धर्मके
नाश हुएभी वह परस्पर द्वयात्मक हैं; यह कहना सुवच है.
मिथ्यात्वाभावोऽधिकरणात्मकस्तत्र सत्यत्वमिति चेत् । एक-
त्वाभावो व्यक्तिद्वयात्मको द्वित्वमप्युच्यताम् । प्रत्येकमेकत्वे-
ऽपि पृथिवीजलयोर्न गन्ध इतिवदुभयं नैकमित्यस्य सर्वजन-
सिद्धत्वात् । योऽपि तदानीमभेदप्रतिपादक आगमः सोऽपि
निर्दुःखत्वादिना साम्यं प्रतिपादयति, संपदाधिक्ये पुरोहितोऽयं
राजा संवृत्त इतिवत् । अत एव “निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति”
इति श्रूयते ।
६