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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 100

७६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-अर्थात् नेत्रादि इन्द्रियोंके विनाश होनेसे प्रथम नेत्रादिद्वारा साक्षात्कृत
पदार्थका स्मरण नेत्रादि विनाशसे पश्चात् नहीं होना चाहिये; क्योंकि उसकालमें
अनुभव करताका अभाव है और दूसरेके देखे पदार्थको दूसरा स्मरण करही नहीं सकता
क्योंकि अनुभवका तथा स्मरणका ( समानाधिकरण ) एक आत्मरूप अधिकरणमें
कार्यकारणभावका नियम है,अर्थात् जैसे-चैत्रके अनुभूत पदार्थको चैत्रही स्मरण कर
सकता है,मैत्र नहीं करसकता; वैसेही नेत्रानुभूत पदार्थका श्रोत्र स्मरण नहीं करसकता.
यही दशा सभी इन्द्रियोंमें जाननी चाहिये; परन्तु स्मरणइन्द्रिय विनाशसे पश्चात्भी
होता है, याते इन्द्रियोंसे पृथक्चेतन कर्ताकी कल्पना होसकती है.
ननु चक्षुरादीनां चैतन्यं मास्तु मनसस्तु नित्यस्य चैतन्यं स्या-
दत आह, मनोऽपीति-
शंका-मत हो नेत्रादिकोंमें चेतनता; परन्तु मनको चेतन तथा कर्ता मानले तो
क्या दोष है ?
मनोऽपि न तथा ज्ञानाद्यनध्यक्षं तदा भवेत् ।
न तथा न चेतनमित्यर्थः ।
समाधान-मनभी चेतन नहींहै यदि मनचेतन हो तो ज्ञानादिकोंका साक्षात्कार
नहीं हुआ चाहिये.
ज्ञानादीति । मनसोऽणुत्वात्प्रत्यक्षे च महत्त्वस्य हेतुत्वान्म-
नसि ज्ञानसुखादिसत्त्वे तत्प्रत्यक्षानुपपत्तिरित्यर्थः।यथा मनसो-
ऽणुत्वं तथा वक्ष्यते ।
भाषा-अर्थात् मुनियोंने मनको अणुपरिमाणवाला माना है और प्रत्यक्षमें
महत्त्व परिमाणको कारणता है. एवं ज्ञानसुखदुःखादि गुण यदि मनहीमें मान लिये
जायँ तो उनका प्रत्यक्ष नहीं होगा.जिस युक्तिसे मन अणुपरिमाणवाला है वह युक्ति
मूलकार स्वयं ८५ की कारिकामें कहेगा.
नन्वस्तु विज्ञानमेवात्मा, तस्य स्वतः प्रकाशरूपत्वाच्चेतनत्वम्।
ज्ञानसुखादिकं तु तस्यैवाकारविशेषः, तस्यापि भावत्वादेव क्ष-
णिकत्वम्, पूर्वपूर्वविज्ञानस्योत्तरोत्तरविज्ञाने हेतुत्वात् सुषुप्ता-
वप्यालयविज्ञानधारा निराबाधैव, मृगमदवासनावासितवसन इव