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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 350 में से

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पृष्ठ 102

७८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
न चेष्टापत्तिः, विज्ञानव्यतिरिक्तवस्तुनोऽभावादिति वाच्यम् ।
घटादेरनुभूयमानस्यापल्पितुमशक्यत्वात् । आकारविशेष एवा-
यं विज्ञानस्येति चेत् । किमयमकारोऽतिरिच्यते विज्ञानात्, तर्हि
समायातं विज्ञानव्यतिरिक्तेन । नातिरिच्यते चेत्तर्हि समूहालम्बने
नीलाकारोऽपि पीताकारः स्यात्, स्वरूपतो विज्ञानस्यावि-
शेषात् ।
बौद्ध-घटादि यावत् पदार्थोंमें विज्ञानस्वरूपता हमको अभिमत है; क्योंकि
हमारे मतमें वस्तुमात्र विज्ञानस्वरूपही है; पृथक् नहीं. नैयायिक-बाह्य विषयरू-
पेण अनुभव किये घटादि पदार्थोंका केवल विज्ञानरूप मानके निराकरण करना अयोग्य
है. बौद्ध-यह घटपटादि पदार्थजात विज्ञानहीके आकारविशेष हैं, याते विज्ञानस्वरू-
पही हैं. नैयायिक-क्या वह विज्ञानका आकारविशेष विज्ञानके स्वरूपसे जुदा है
कि विज्ञानस्वरूपही है. यदि जुदा कहो तो घटपटादि पदार्थ जातविज्ञानसे भिन्न
स्वयंसिद्ध हुए. यदि कहो कि जुदा नहीं है तो "नीलपीते" इत्याकारक समूहालं
म्बन ज्ञानमें नीलाकारभी पीताकारही प्रतीत होना चाहिये अथवा पीताकारभी
नीलाकारही प्रतीत होना चाहिये; क्योंकि स्वरूपसे विज्ञानमें कुछ भेद नहीं है किन्तु
एकही है.
अपोहरूपो नीलत्वादिर्विज्ञानधर्म इति चेत् । नीलत्वादीनां विरु-
द्धानामेकस्मिन्नसमावेशात् । इतरथा विरोधस्यैव दुरुपपन्नत्वात्।
नवा वासनासंक्रमः संभवति । मातृपुत्रयोरपि वासनासंक्रमप्रस-
ङ्गात् । न चोपादानोपादेयभावो नियामक इति वाच्यम्, वास-
नायाः संक्रमासंभवात् । उत्तरस्मिन्नुत्पत्तिरेव संक्रम इति चेत्।
न । तदुत्पादकाभावात् ।
बौद्ध-नीलत्वपीतत्वादि उसी विज्ञानके धर्म विशेष (अपोहरूप) अनीलव्या-
वृत्चित्वादिरूपसे प्रतीत होते हैं. नैयायिक-नीलत्वादि विरुद्धधर्मोका एक विज्ञान
रूप धर्मीमें समावेश अयुक्त है. (इतरथा) परस्पर विरुद्ध धर्मोको एकधर्मनिष्ठ मान
लेनेसे संसारके पदार्थोंमें विरोधका निश्चयही नहीं होगा और पूर्व कहा जो वासना
संचार वहभी नहीं होसकता; यदि हो तो माताके देखे पदार्थका गर्भनिष्ठ बालकको
भी स्मरण होनाचाहिये. बौद्ध-उपादानरूप कारणकी वासनाका उपादेयरूप कार्य-