न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-यावत् शरीरमें व्यापक तथा स्पर्शका ग्राहक त्वक्इन्द्रिय है. वह रूपादि-
कोंके मध्यमेंसे स्पर्शहीका ग्राहक होनेसे वायवीय है, जैसे व्यजन (पंखे) का
पवन शरीरसम्बन्धि स्वेदरूप जलके केवल शैत्यहीका ग्राहक है तद्वत् ॥ ४३ ॥
विषयं दर्शयति, प्राणादिरिति-
भाषा-‘प्राणादि’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार वायवीय विषयको दिखलाता है-
प्राणादिस्तु महावायुपर्यन्तो विषयो मतः ।
भाषा-प्राणादिवायुसे लेकर महावायुपर्यन्त वायवीय विषय है.
यद्यप्यनित्यो वायुश्चतुर्विधस्तस्य चतुर्थी विधा तु प्राणादिरि-
त्युक्तमाकरे । तथापि संक्षेपादत्र त्रैविध्यमुक्तम् । प्राणस्त्वेक एव
हृदादिनानास्थानवशान्मुखनिर्गमादिनानाक्रियावशाच्च नाना-
संज्ञां लभत इति ।
भाषा-यद्यपि अनित्य वायु चार प्रकारका है. उसका चौथा भेद प्राणादिवायु है;
यह वार्ता प्रशस्तपादभाष्यमें लिखी है, तथापि इस ग्रन्थमें संक्षेपसे अनित्य वायुके
तीन भेदही कहे हैं. प्राणवायु एकभी हृदयादि नानास्थानभेदसे तथा मुखनिर्गमनादि
नानाक्रियाके भेदसे ‘प्राण अपान आदि’ नाना संज्ञाको लाभ करता है.
आकाशं निरूपयति, आकाशस्येति-
भाषा-‘आकाशस्य’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आकाशका निरूपण करे है-
आकाशस्य तु विज्ञेयः शब्दो वैशेषिको गुणः ॥ ४४॥
भाषा-शब्दात्मक विशेष गुणवाला आकाश जानना योग्य है ॥ ४४ ॥
आकाशकालदिशामेकैकव्यक्तित्वादाकाशत्वादिकं न जातिः
किंवाकाशत्वं शब्दाश्रयत्वम् । वैशेषिक इति कथनं तु विशेष-
गुणान्तरव्यवच्छेदाय । एतेन प्रमाणमपि दर्शितम् ।
भाषा-आकाश काल तथा दिशाको एक एक व्यक्ति होनेसे आकाशत्वादिधर्म
जातिरूप नहीं है, किंतु समवायसम्बन्धसे शब्दका आश्रयही आकाश है. मूल
कारिकामें ‘वैशेषिक’ यह कथन तो विशेष गुणान्तर व्यवच्छेदके वास्ते है; अ-
र्थात् आकाशमें शब्दके सिवाय विशेष गुणान्तर नहीं है; इतने कथनसे आकाशमें
प्रमाणभी दिखलाया है; वह प्रमाण अनुमान है.