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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 350 में से

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पृष्ठ 99

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७५
साधनताका अनुभावक वा स्मारक कोई आपके मतमें है नहीं याते प्रवृत्ति बन
नहीं सकती और मेरे मतमें तो पूर्वजन्ममें अनुभवकिये इष्टसाधनत्वका ( तदानीं )
प्रथम उत्पन्न स्तनपानप्रवृत्तिके पूर्वकालमें स्मरण होनेसे स्तनपानमें बालककी
प्रवृत्ति बन सकती है.
न च जन्मान्तरानुभूतमन्यदपि स्मर्यतामिति वाच्यम् । उद्बो-
धकाभावात् । अत्र त्वनायत्या जीवनादृष्टमेवोद्बोधकं कल्प्यते ।
इत्थं च संसारस्यानादितयाऽऽत्मनोऽप्यनादित्वसिद्धावनादि भा-
वस्य नाशासम्भवान्नित्यत्वं सिद्ध्यतीति बोध्यम् ।
शंका-यदि जन्मान्तरानुभूत इष्टसाधनताका ज्ञानही संस्कारद्वारा प्रवृत्तिमें कारण
है तो जन्मान्तरानुभूत और पदार्थोंका स्मरणभी होना चाहिये. समाधान-यदि
कोई उद्बोधक हो तो ज्ञानजनित संस्कार उद्बुद्ध होकर स्मृतिके जनक होते हैं प्रकृत-
में पदार्थान्तरोंके संस्कारोंका कोई उद्बोधक नहीं है और स्तनपान प्रवृत्तिमें तो
( अनायत्या ) गति अन्तराभावसे बालकके जीवनके अदृष्टही उद्बोधक कल्पना
कर सकते हैं. इस रीतिसे संसारको अनादि होनेसे जीवात्माभी अनादि सिद्धहुआ
तो अनादिभावपदार्थको विनाशी न होनेसे आत्मा नित्य सिद्ध होसकताहै.
ननु चक्षुरादीनां ज्ञानादौ करणत्वं कर्तृत्वं चास्तु विरोधे साधका-
भावादत आह, तथात्वमिति-
शंका-ज्ञानादि कार्योंके प्रति नेत्रादि इन्द्रियही यदि करण तथा कर्ता मानलिये
जायं तो क्या विरोध है? तथा विरोधका साधक युक्ति प्रमाण कौन है ?
तथात्वं चेदिन्द्रियाणामुपघाते कथं स्मृतिः ॥ ४८ ॥
चैतन्यमित्यर्थः ।
समा०-यदि नेत्रादि इन्द्रियही ( तथात्वं ) चेतनकर्ता स्वरूप हों तो 'तत्तत्'
इन्द्रियके विनाशसे तत्तत्अनुभूत पदार्थका स्मरण कैसे होवे? ॥ ४८ ॥
उपघाते नाशे सति अर्थाच्चक्षुरादीनामेव । कथमिति । पूर्वं
चक्षुषा साक्षात्कृतानां चक्षुषोऽभावे स्मरणं न स्यात् । अनुभवि-
तुरभावात् । अन्यदृष्टस्यान्येन स्मरणासंभवात् । अनुभवस्म-
रणयोः समानाधिकरण्येन कार्यकारणभावादिति भावः ॥ ४९ ॥