सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 107

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ८३
ब्रह्मशब्दका विशेषण साधुरीतिसे होसकता है; ( अन्यथा ) यदि पूर्वोक्त रीतिसे 'आ-
नन्द' शब्दकी सिद्धि नहीं माने किन्तु “भावे ३।३।१८” इस सूत्रसे 'घञ्' प्रत्ययान्त
माने तो नियत पुँल्लिङ्ग होना चाहिये; क्योंकि घञ्प्रत्ययान्त शब्दोंको “घञबन्तः ३५”
यह लिङ्गानुशासनका सूत्र नियमसे पुलिङ्गता बोधन करता है. आनन्दशब्दभी
लक्षणावृत्तिसे दुःखाभावहीका बोधक है. जैसे, भारवाही पुरुष भार त्यागनेसे
अपनेको सुखी मानताहै वैसेही दुःखाभाव होनेसे सुख प्रत्यय होता है.
अस्तु वा तस्मिन्नानन्दो नत्वसावानन्दोऽसुखमिति श्रुतेः । न
विद्यते सुखं यस्येति कुतो नार्थ इति चेत् । न । क्लिष्टकल्पनापत्तेः,
प्रकरणविरोधादानन्दमित्यत्र मत्वर्थीयप्रत्ययविरोधाच्च । “आन-
न्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कदाचन” इत्यत्र भेदस्य स्पष्टत्वाच्च
इति संक्षेपः ।
भाषा-अथवा वह ईश्वर आनन्दका अधिकरणभी रहो तो हमारे मतकी हानि नहीं
तथापि वह आनन्दस्वरूप नहीं; क्योंकि श्रुतिमें उसकी “असुखम्” ऐसा सुना है. यहां 'नञ्'
ब्रह्मसे सुखका भेद बोधन करता है और अपनेमें अपना भेद असम्भव है याते ब्रह्म
आनन्दस्वरूप नहीं किन्तु आनन्दका अधिकरण है. वेदान्ती शंका-विद्यमान नहींहै
सुख जिसमें किसी सम्बन्धसे वही 'असुख' अर्थात् 'सुखस्वरूप' यह अर्थ बहुव्रीहि
समाससे लाभ होता है; इसके माननेमें क्या दोष है ? नैयायिक-बहुव्रीहिसमास-
में अन्य पदार्थ प्रधान होताहै, प्रकृतमें अन्यपदार्थमें 'नञ्'की लक्षणा माननी क्लिष्ट
कल्पना है; ( प्रकरणविरोधात् ) अर्थात् “अस्थूलमनणु अदीर्घमह्रस्वम्--ब्रह्म स्थूल
पदार्थोंसे तथा अणुदीर्घ ह्रस्व पदार्थोंसे भिन्न है” इत्याद्यर्थक एक बृहदारण्यक उप-
निषद्का वाक्य है, इसके प्रत्येक पदमें 'नञ्तत्पुरुष' समास स्पष्टरूपसे प्रतीत होता
है और इसी श्रुतिके मध्यमें 'असुखम्' इस पदका पाठभी है. यदि इस पदमें बहुव्रीहि
मानेंगे तो प्रकरणविरोध अवश्य होगा और यदि यहां बहुव्रीहि मानके 'सुखस्वरूप'
ऐसा अर्थ करभी लें तो 'आनन्दम्' इस शब्दमें 'मत्वर्थ'अर्थक 'अच्'प्रत्ययके साथ विरोध
तो अवश्य होगा; क्योंकि यह प्रत्यय सुखके अधिकरणका बोधक है और बहुव्रीहिसे
सुखस्वरूपका बोधन हुआ याते परस्पर विरोध स्पष्ट है, और जो पुरुष ब्रह्मके आ-
नन्दको जानता है वह कदापि किसीसे भयको प्राप्त नहीं होता. इस वाक्यमें
आनन्दका तथा उसके अधिकरणका भेद षष्ठी विभक्तिसे स्पष्टही प्रतीत होता है.
यह वेदान्तीके प्रति संक्षेपसे कहा है-इति ॥