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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 350 में से

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पृष्ठ 104

८० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
अस्तु तर्हि क्षणिकविज्ञाने गौरवान्नित्यविज्ञानमेवात्मा “अवि-
नाशी वा अरे अयमात्मा” “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यादि
श्रुतेश्च, इति चेत्। न। तस्य सविषयत्वासम्भवस्य दर्शितत्वात्।
निर्विषयस्य ज्ञानत्वे मानाभावात्, सविषयत्वस्याप्यननुभवात् ।
अतो विज्ञानादिभिन्नो नित्य आत्मेति सिद्धम् ।
वेदान्ती शंका-यदि आत्माके क्षणिक विज्ञानस्वरूप माननेमें गौरव है तो नित्य
विज्ञान स्वरूपही मानना उचित है और इसम “अरे मैत्रेयी यह आत्मा
अविनाशी है” “सत्यस्वरूप है ज्ञानस्वरूप है, तथा आनन्दस्वरूप है” इत्याद्या-
र्थक उपनिषद्वाक्य भी प्रमाण हैं. नैयायिक-वह नित्य विज्ञानभी
सविषयक है कि निर्विषयक है? यदि सविषयक कहो तो यावत्
प्रपंचविषयक है कि, यत्किंचित् वस्तुविषयक है? प्रथम पक्षमें सर्वज्ञत्वा-
पत्ति और द्वितीय पक्षमें विनिगमनाविरहा पूर्वोक्त रीतिसे जान लेना. और यदि
कहो कि नित्यविज्ञान निर्विषयक है तो निर्विषयक विज्ञानमें कोई प्रमाण नहीं,
अर्थात् ऐसा कोईभी प्रत्यय नहीं जो कि किसी एक वस्तुको विषय न करे [और
यदि कहो कि जिस जिस वस्तुको जो जो आत्मा ग्रहण करताहै उस २ विज्ञान
स्वरूप आत्माको तत्तद्विषयकत्व है तो यहभी युक्त नहीं] क्योंकि ‘नित्य विज्ञान
स्वरूप आत्मा सविषयक है’ इत्याकारक अनुभव होनाभी दुर्घट है इसलिये विज्ञा-
नादिकोंसे भिन्न नित्य आत्मा स्वयं सिद्ध होताहै.
सत्यं ज्ञानमिति हि ब्रह्मपरं जीवेषु नोपयुज्यते। ज्ञानाज्ञानसुखि-
त्वदुःखित्वादिभिर्जीवानां भेदसिद्धौ सुतरामीश्वरभेदोऽन्यथा
बन्धमोक्षव्यवस्थानुपपत्तिः। योऽपीश्वराभेदबोधको वेदः सोऽपि
तदभेदेन तदीयत्वं प्रतिपादयन् स्तौति । अभेदभावनयैव च
यतितव्यमिति वदति। अत एव ‘सर्व एवात्मनि समर्पिताः’ इति
श्रूयते ।
भाषा-और पूर्व कहे श्रुतिवाक्योंमें प्रथम वाक्य जीवको अविनाशी कहता है सो
हमको इष्टहै. द्वितीय वाक्य परमात्माको सत्यस्वरूप तथा ज्ञानस्वरूप कहता है उसका
जीवोंमें कुछ उपयोगही नहीं. हरएक जीवके ज्ञान अज्ञान सुख दुःख इच्छा आदिके
भिन्न २ होनेसे जीवोंका परस्पर भेद सिद्ध होता है. एवं जीव परस्पर भिन्न सिद्ध हुए तो