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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 350 में से

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पृष्ठ 95

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७१
क्रियाकी समाप्तिके पश्चात् उसी मूर्त्तद्रव्यमें क्षणादिव्यवहारकी नियामिका क्रियान्तर
उत्पन्न होतीहै. सिद्धान्त तो यह है कि महाप्रलयमें क्षणादिव्यवहार नहीं होता, परन्तु
यदि कोई महाप्रलयमेंभी क्षणादिव्यवहार किया चाहे तो वहां सिवाय 'तत् तत्'
पदार्थ ध्वंसके और कोई उपाधि नहीं बनसकती अर्थात् ( अनायत्या ) उपायान्तरके
अभाव होनेसे महाप्रलयकालमें क्षणव्यवहारका नियामक 'तत् तत्' पदार्थका ध्वंसही
है. दिवस मासादि व्यवहार उन क्षणोंके समुदायविशेषोंसे होताहै-इति.
दिशं निरूपयति, दूरान्तिकेति-
भाषा-'दूरान्तिक' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दिशाका निरूपण करताहै-
दूरान्तिकादिधीहेतुरेका नित्या दिगुच्यते ॥ ४६ ॥
भाषा-पदार्थोंमें दूर तथा समीप बुद्धिका नियामक एक तथा नित्य 'दिशा'
पदार्थ है ॥ ४६ ॥
दूरत्वमन्तिकत्वं च दैशिकं परत्वमपरत्वं बोध्यम् । तद्बुद्धेर-
साधारणं बीजं दिगेव। दैशिकपरत्वापरत्वयोरसमवायिकारणसं-
योगाश्रयतया दिक् सिद्ध्यतीति भावः ॥ ४६ ॥
भाषा-दूरता तथा समीपता दैशिक परत्व अपरत्वरूपा जाननी चाहिये ।
( तद्बुद्धेः ) दैशिकपरत्व अपरत्वबुद्धिका असाधारणरूपसे प्रयोजक 'दिशा'
है. दैशिकपरत्व अपरत्वका असमवायिकारण जो दिशाका तथा वस्तुका संयोग उसका
( अनुयोगितासम्बन्धसे ) आश्रयलाघवसे एक पृथक् दिशा पदार्थ सिद्ध होताहै॥४६॥
नन्वेकैव दिग् यदि तदा प्राचीप्रतीच्यादिव्यवहारः कथमुप-
पद्यतामित्यत आह, उपाधीति-
शंका-दिशा पदार्थ यदि एक है तो उसमें 'प्राची' तथा 'मतीची' इत्यादि व्यवहार
कैसे होगा?
उपाधिभेदादेकाऽपि प्राच्यादिव्यपदेशभाक् ।
समाधान-वह दिशा एकही उपाधियोंके भेदसे 'प्राची प्रतीची' इत्यादि संज्ञाको
लाभ करतीहै.
यत्पुरुषस्योदयगिरिसन्निहिता या दिक् सा तस्य प्राची । उ-
दयगिरिव्यवहिता च प्रतीची । एवं तत्पुरुषीयसुमेरुसन्निहिता